Monday, 15 June 2020

खरा-खोटा होना

सजी हथेली का रंग फीका पड़ता,सजा देती पोर पे सदा चढ़ा रहता,दृष्टान्त/उद्धरण ताप से गुजरा होता
हबूब श्रीवास्तव :- अक्सर, हम अपने दृष्टिकोण से किसी और के जीवन को समझने की कोशिश करते हैं। इस बात को आसानी से भूल जाते हैं कि हमें उनके दृष्टिकोण से उनके जीवन को समझने की कोशिश करनी थी। एक आत्महत्या एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति जीवन को छोड़ देने के अलावा कोई अन्य विकल्प सोचने और समझने की शक्ति खो चुका होता है। जीवंत रूप में, जीवन से भरपूर और अपने सपनों का पीछा करने में बेहद सफल, सुशांत की मानसिक सेहत एक रसातल में धंस गई होगी। कोई भी इस अवसाद का शिकार हो सकता है - इसका सफलता/असफलता और पैसे का अभाव/प्रचुरता से  कोई संबंध नहीं है।
मुझे बताएं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं, मैं शायद समझूंगा कि आप कैसा महसूस करते हैं। जितना आप सोचते हैं, उससे कहीं अधिक।  #RIPSushantSinghRajput #MentalHealth #AchhaAaadmiTha

विभा :– किसी के आत्महत्या कर लेने के बाद किसी दृष्टिकोण का कोई मतलब नहीं रह जाता है.. जीवन बचा ही नहीं तो जीवनी क्या और क्यों समझना। वैसे जीवित व्यक्ति अपने ही दृष्टिकोण से सोचता-समझता और समझाने की कोशिश करता है..। समय बीतने के पहले याद दिलाते रहने की बात है कि हर वक़्त याद रखना चाहिए कि कोई है जिसे तुम्हारी जरूरत है और जिनसे तुम अपनी सारी बातें साझा कर सकते हो... तथा सबसे बड़ी बात, शरीर पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं जिसे तुम खत्म कर दो.. किसी ने उसे अपने खून से निर्मित किया है..।

abc :– *Copied*

सुशांत,

सिर्फ तुम्हारे पैरों तले स्टूल नहीं खिसकी है, पूरे बिहारियों के पैरों तले जमीन खिसकी है. हमारा सैकड़ों बरसों का गुमान एक झटके में बिखर गया. बिहारी इस तरह मरा नहीं करते. This is not fair, man..!!

जीवनभर सँघर्ष की भट्टी में तपकर बनता है कोई बिहारी. आखिरी सांस तक हार नहीं मानकर बनता है कोई बिहारी. कोई बिहारी इसलिए बिहारी नहीं है कि वो बिहार से है, कोई बिहारी इसलिए बिहारी है कि वो ढीठ है. ऐसा नहीं है "ऐ बिहारी बावले लौंडे, ऐ बिहारी ..." सुनकर उसका खून नहीं खौलता लेकिन वो अनसुना करता है. मुस्कुरा देता है. पैदा होने से लेकर आजतक उसने ऐसी विपरीत परिस्थितियों में खुद को संभाला है कि इन सब बातों को वो दिल से ही नहीं लगाता. ऐसा नहीं है वो कमज़ोर है, कोई बिहारी जब हथौड़ी-छेनी उठा लेता है तो पहाड़ का घमंड तोड़कर ही रुकता है. वह कड़ी धूप में रिक्शा खींच लेता है, ईंटें ढो लेता है, रेहड़ियां लगा लेता है लेकिन हार नहीं मानता. विपरीत परिस्थितियों में भी डटा रहता है.
सरकारें आयी, सरकारी गयी. हमारे संघर्ष कम नहीं हुए. संघर्ष को हमने अपने हाथों की रेखा मान ली. घर, घर से पटना, पटना से दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, बिहारी जहां भी गया उसने अपने को उस माहौल में ढाल लिया. कोरोना जैसी वैश्विक विपरीत परिस्थितियां आयी. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, गुजरात ने पहचानने से इनकार कर दिया. बिहारी ने गहरी सांस ली. झोला समेटा और पैदल निकल पड़ा. 1200-1300 किलोमीटर दूर अपने घर के लिए. आग बरसाता मौसम, डंडे बरसाते पुलिसवाले. सबको झेलकर बिहारी घर आ गया. ऐसे राज्य में जहां की प्रति व्यक्ति आय न्यूनतम है. जहां उसे करने को कोई काम मिलेगा कि नहीं इसका भी कुछ पता नहीं था. लेकिन वह डटा रहा, अड़ा रहा.
सुशांत तुम शायद कोसी क्षेत्र से थे ना.? वहां के बच्चे-बच्चे भी बाढ़ की भयानक त्रासदी को चुल्लू में भरकर पी जाते हैं. इससे भी बड़ी त्रासदी थी क्या तुम्हारे जीवन में कि ऐसा कदम उठाना पड़ा. तुम आदर्श थे यार हमारे. हम बिहारियों के. तुम्हारी लाइफ, तुम्हारा संघर्ष, तुम्हारी सफलता सबको हमने सर-आंखों से लगाया था. सुशांत, अपने जीवन की सुंदर कहानी का तुमने अपने हाथों दुखांत कर लिया है. कुछ नहीं कहूंगा. इरफ़ान साहब की रुखसती का ग़म था, तुम्हारे इस तरह जाने का गुस्सा है. और हो भी क्यों ना,
सिर्फ तुम्हारे पैरों तले स्टूल नहीं खिसकी है, पूरे बिहारियों के पैरों तले जमीन खिसकी है. हमारा सैकड़ों बरसों का गुमान एक झटके में बिखर गया है. बिहारी इस तरह मरा नहीं करते सुशांत. This is not fair, man..!!😢😢

विभा :– 🤔कौन था यह ? पूरे बिहारियों के पैरों तले की जमीन क्यों खिसकी है ?

abc : – पटना निवासी 1986 का बॉर्न

विभा :– पटना में लाखों की संख्या में आबादी है..

abc :– ये मुम्बई में रहता था काकी... : फेमस हीरो था...

 विभा :–  लाखों मजदूर अभी वापसी किये हैं मुंबई से.. पहले भी बहुत बार बिहारी दुत्कारे गए मुंबई के वासियों के कारण.. किनकी–किनकी कहानी लिखी गई ?  किसने फेमस बनाया ?

8 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-6-2020 ) को "साथ नहीं कुछ जाना"(चर्चा अंक-3734) पर भी होगी, आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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    1. लिंक खुलने में समस्या हुई इसकेलिए क्षमा चाहती हूँ ,मैंने अब सुधार कर दिया हैं।

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-6-2020 ) को "साथ नहीं कुछ जाना"(चर्चा अंक-3734) पर भी होगी,

    आप भी सादर आमंत्रित हैं।

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    कामिनी सिन्हा

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  3. मानसिक रोग स्रीजोफीनिया के द्र्ष्टिकोण से कोई सोच कहीं क्यों नजर नहीं आती है पता नहीं।

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  4. बहुत खूब लिखा है आपने ... 💐💐

    एक नई सोच पर आपका स्वागत है

    http://eeknaisoch.blogspot.com

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  5. समझ समझ का फर्क हे
    सोचने योग्य

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  6. संकीर्ण मानसिकता का कोई इलाज़ नहीं
    बड़े छोटे का भाव एक बीमारी है बहुत बड़ी

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