Monday, 7 September 2020

बदलती राहें

कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.  कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.
दादा जी प्रात:काल जैसे ही गाँव से अपने पोते सतेन्द्र के पास पहली बार लखनऊ पहुँचे तो आदर–सम्मान की औपचारिकताओं के पश्चात् उन्होंने स्नानादि करने की इच्छा व्यक्त की।
  सतेन्द्र इस बात से भलीभाँति अवगत था, अतः उसने अपनी पत्नी से कहा, "दादाजी पक्के कर्मकांडी ब्राह्मण हैं, और वो बिना नहाये–धोये, पूजा–पाठ किये जल तक ग्रहण नहीं करते, सो दादा हेतु उनके स्नान, ध्यान की पूरी व्यवस्था कर दो।" इतना कहकर उसने पुनः घर मे बनाये मंदिर की साफ–सफाई करने हेतु कहा और यह भी कहा, "वहाँ ताँबे के लोटे में गंगाजल मिश्रित जल भी रख दे।"
  व्यवस्था पूरी होते ही दादा जी स्नान गृह से राम-राम का उच्चारण करते हुए बाहर निकले और बोले,"बहू! मंदिर में पूजा–पाठ की व्यवस्था कर दी है न?"
 "हाँ दादाजी!"
      दादा जी मंदिर में अपनी पूजा–पाठ से निवृत होकर पोते द्वारा बताए गए कमरे में पहुँचकर नाश्ते की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही क्षणों में उनकी बहू नाश्ता लेकर दादाजी के सामने नष्ट रखकर बोली, "दादा जी! नाश्ता कर लीजिए और किसी चीज की जरूरत हो तो पुकार लीजिएगा।"
  अभी पहला कौर भी मुँह में नहीं जा सका था कि उनकी दृष्टि कमला बाई पर पड़ी... उन्होंने तुरंत बहू को आवाज दी। बहू के आते ही उन्होंने कहा, "ये औरत कौन है?"
    "बाई है।"
    "मतलब?"
    "घर का चौका–बर्तन करती है...।"
    "और तुम?"
   "बाकी काम मैं देख लेती हूँ... मुझे ऑफिस भी तो जाना होता है।"
यह सुनकर दादाजी का मुँह कसैला हो गया... फिर भी उन्होंने पूछा, "बेटा! यह किस जाति की है?"
   "दादा जी शहर में तो आजकल जाति–पाँति का कोई अर्थ नहीं रह गया है..., फिर भी जहाँ तक मैं जानती हूँ यह दुसाध जाति की है।"
  "सत्यानाश! तुम लोगों ने मेरा धर्म भी भ्रष्ट कर दिया...।"
  "वो कैसे...?"
   "नीच जाति से खाना बनवाकर...।"
        "दादा जी! आप बुरा न मानें तो यह बताएँ, मैं नौकरी छोड़ दूँ? क्योंकि बिना दूसरे के सहयोग से तो मुझ अकेली से यह संभव नहीं है। फिर शहर में अब यह सब नहीं चलता। सब लोग मिलजुल कर ऑफिस में साथ–साथ खाते–पीते हैं। चाय कौन बनाता है बाज़ार में... कोई नहीं जान पाता... फिर बहु आप कहें तो मैं नौकरी छोड़कर...।"
    दादा जी काफी देर चुप शांत विचार मगन हो गये... कुछ नहीं बोले और धीरे–धीरे नाश्ते के कौर अपने भीतर डालने लगे।
     दरवाजे की ओट से देखकर बहू ने चैन की साँस लिया और ऑफिस जाने की तैयारी करने लगी।



9 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 07 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (8-9 -2020 ) को "ॐ भूर्भुवः स्वः" (चर्चा अंक 3818) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  3. अत्यंत सुन्दर...लाजवाब सृजन ।

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