Tuesday, 26 August 2014

हाइकु - मुक्तक








जपानी विधा में लिखी गई 
17 अक्षर और 3 पंक्तियों की 
व्यापक अर्थ लिए कविता को ही 
हम चार पंक्तियों में एक भाव पर 
चार हाइकु लिखें तो बनेगा 
हाइकु - मुक्तक 

एक हाइकु-मुक्तक में 
चार पंक्ति के मुक्तक के 
एक पंक्ति में फिर तीन पंक्ति है 
यानि
 हमें 12 पंक्ति का ख्याल रखना है 

जैसे 

पहला प्रयास 
समीक्षा हेतु

सूखे ना स्वेद / अपहृत बरखा / रोता भदई
देख भू चौंकी / खाली बूँदें-बुगची / नभ मुदई
व्याकुल कंठ / भरे नयन सरि / चिंता में दीन
भादो है छली / घाऊघप बादल / द्वि निरदई
==
अपहृत = अपहरण हो गया 
घाऊघप = गुप्त रूप से किसी का धन हरण करने वाला 


Monday, 25 August 2014

धन



आखिर विवेक की भी मौत हो गई
विवेक विभा जी का बड़ा बेटा
बाप दादा का अर्जित धन हाथ लगा
धन में पटीदार कोई न हो इसलिए 
उसने सगे भाई को शराब में भांग
मिला कर पिला दिया 
बहुत जद्दोजहद से भाई की जान डॉ बचा सके 

शराब में भांग मिल जाए तो 
बहुत जहरीला हो जाता है 
तभी मुझे जानकारी मिली 

भाई घर छोड़ कर ससुराल में रहने लगा 
उसकी पत्नी एकलौती बेटी थी 
उसे भी एक ही बेटी है 

पिता से धरोहर में मिली शराब की दुकान
बेचना कम पीना ज्यादा
सब भाइयों को शराब की लत लगी
लेकिन सबसे ज्यादा विवेक पिता था
अंत समय में शरीर का एक एक शिरा को 
फाड़ कर खून बाहर निकला
बहुत बुरी मौत मरा 

क्या मिला ??
धन तो पड़ा है 
दिल पर जोर चलना चाहिए 
क्यूँ कि
 हम चला सकते हैं विवेक से .

Saturday, 23 August 2014

घाती है भादो






1
बहे मवाद 
वीरुध हीन भूमि 
डाका के बाद ।

2
सूखे ना स्वेद
अपहृत बरखा 
रोता भदई।

3
आँख में आंसू 
रात में ज्यूँ जुगनू
दोनों में ज्योति ।

पल है खग
सुख दुख के डैने
उड़ा के छिपा। 

5
देख भू चौंकी 
खाली बूँदें-बुगची
घाती है भादो। 

6
घाती सावन 
घाऊघप बादल
रोते भू तारे ।

7
दुखी भू अम्ब
हवा लपके मेघ
हो जैसे गेंद । 

8
छोड़ के पर्दा 
नभ को छूने चली
उड़ा के गर्दा।

9
ज्योति की संगी 
लम्बी कभी वो छोटी
तम में गुम।

10
उषा मुस्काई 
ज्योति ले लहराई
भू हरियाई।

11
देती है दंश 
कई चीर लगाती
कील उचकी।



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Sunday, 17 August 2014

असीम शुभ कामनायें


श्यामक श्वेत
मिलन राधे-श्याम
उपजा बोध 

Radha Krishna 3



एक कोशिश … जन्माष्टमी के अवसर पर सोहर गीत, 
जो हमारे यहाँ बच्चे के जन्म लेने पर गाया जाता है ,
चोका के रूप में लिखने की Siddharth Vallabh के लिए ....

मनमोहना
आनंदघन लीला
लल्ला गोपाला
जनम लिहले हो
अंगना मोरी
गाओ रे बधइयां
सोहर उठे
नन्द के दुवरिया
यदु वंशज
घर उजास फैलो
धन्य भइल
शोभित नगरिया
हरखित ही
चंचल चितवन
सब बिसारे
श्याम मुख निहारे 
कहे यशोदा मैया 





Saturday, 16 August 2014

ख़ुशी के पल


https://www.facebook.com/events/303049499868978/311212925719302/?comment_id=311373935703201&notif_t=event_mall_reply


जुलाई में आयोजित इवेंट प्रतियोगिता 'सावन का दर्द' का परिणाम......
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आदरणीय मित्रों,
एडमिन पैनल की सहमति से जुलाई में आयोजित इवेंट प्रतियोगिता 'सावन का दर्द' के परिणाम घोषित हो रहे हैं| सभी उत्कृष्ट रचनाओं में विजेता का चयन वाकई बहुत मुश्किल काम है| सभी की रचनाएँ भावपूर्ण , सटीक एवं सार्थकता को दर्शा रहे हैं| जैसा कि सभी को मालूम है कि प्रतियोगिता तीन कैटेगरी में आयोजित की गई थी|
कुछ रचनाएँ श्रेष्ठ रहते हुए भी वर्तनी की अशुद्धि के कारण विजेता होने से चूक गईं इसका बहुत खेद है|
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कैटेगरी ए-डिजिटल हाइगा-----
हाइगा में चित्र पर लिखते हुए शब्दों का रंग चयन , आकार और स्थान जहाँ पर हाइकु रखे जाते हैं, यह बहुत मायने रखता है| हाइकु के साथ विविध पहलू पर भी ध्यान रखा जाए तो हाइगा नयनाभिराम हो जाता है|
विजेता---
विभा रानी श्रीवास्तव जी--
भू है उदास
आस मेघ पालकी
हवा कहार
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विजेता होने की ख़ुशी से ज्यादा ख़ुशी मिली है कि
 मैं लिखना सीख रही हूँ ....
आप सब की आभारी हूँ .... _/\_
समय समय पर आप सब उत्साह बढ़ाते रहते हैं 
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Thursday, 14 August 2014

ताँका





1

भेंट है मिला 
बड़े संघर्षों बाद
स्वतंत्र देश 
प्रजातांत्रिक वेश
विश्व अग्रणी केश

2

गुणन योग्य 
है मधुमय तोष 
देव की आस
माँ के गोद में खेलें
हिन्द देश में होती

3

देव का भेंट 
प्रकृति करे प्यार 
रवि रश्मियाँ
सर्व प्रथम आती 
हिन्द धरा चूमती

4

दुष्टान्न त्यागे 
हिन्द मिट्टी का नशा 
दुश्मनी भूले 
वीर होते हैं यहाँ
बदले विश्व दिशा

5

उत्कर्षों छू ले 
कर्म व धर्म जीते 
भू को माने माँ 
अतुल समन्वय 
ये है हिन्द गौरव

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1
हिम मुकुट
सिंधु-त्रि पाँव धोये
हिन्द है न्यारा।

2
टुकडो में थे 
गुलामी का कारण
टुकड़े होंगे।

3
तूफां को तोडा
वीर को मिले रोड़ा
रुख है मोड़ा ।


श्रद्धा नमन
चहेती दुर्गा भाभी
वीरांगना थी।

5
क्रांति' व्याख्या 
निश्छलता शैतानी
दृढ़ निश्चयी। 

6
आजादी नशा
खून के साथ दौड़े
बचपन से।

7
पाखंड मिटे 
छूत अछूत मिटे
दलित सटे। 

8
स्त्री की अस्मिता 
खद्दर की गरिमा
बोली से नोचें

और 

झेले जो झोके 
नेता बैन नुकीले 
स्वसा रो रही।

9
हाथ बढ़ायें 
गरीबी व अशिक्षा 
मिल मिटायें ।


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Saturday, 9 August 2014

राखी की असीम शुभ कामनायें



रक्षण वादा 
एक दूजे के संग 
बांध के धागा 


बहुत पहले केवल पंडित जी रक्षा सूत्र बांधा करते थे .... 
मैं अपनी माँ को पंडित जी से रक्षा सूत्र लेकर 
सिन्होरा में बांधते देखती थी .... 
लेकिन वो ऐसा क्यूँ करती थी ,
मैं उनसे पूछ नहीं सकी ..... 
किसी को इसके बारे में 
कोई जानकारी है क्या ?

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1

अमोल राखी 
स्नेह-रोली का टीका
आंचल कोर ।

2

जने ना सुता 
सूनी रहे कलाई 
उदास सुत ।

3

आई ना जाई 
राखी ले खिन्न सुत
माँ भर आई ।

4

राखी ले आई
पिता व सखा भाव
एक भाई में।

5

तीज त्यौहार
जीवन है सुंदर 
याद कर लें।

6

स्नेह बंधन 
धर्म वर्ग से परे 
रक्षा बंधन। 

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सावन हमारे शहर में रूठा रहा 
सारे मेघ को हटा दिखा हूठा रहा 
सबका कहना बरस पलटेगा नसीब 
करता रहा कमबख्त वो झूठा रहा 
===
१९७६ में राखी के चार दिन पहले मेरे मझले भैया की मृत्यु हुई ...... 
आज भी वे हर पल मुझे मेरे साथ लगते हैं ..... 
उनके लिए उदास नहीं हो सकती क्यूँ कि 
तीन और भाई हैं जिन के लिए हँसती हूँ ..... 
मैं उनकी ढिबरी हूँ तो रौशनी देना मेरा काम हुआ ना ..... 
रो कैसे सकती हूँ ..... अँधेरा तो चिराग तले होता है ..... 
दिल कुहुकता है …..


Thursday, 7 August 2014

राखी की असीम शुभ कामनायें



1

लाई बहना 
अक्षत वरदान 
राखी गहना। 

2

प्यारा सा आस
सुरक्षा का कवच
धागा से बाँध। 

3

शत्रु भी बंधे 
स्नेह से अलंकृत 
धागे की शक्ति। 

4

धागा भंगुर 
लोहे से मजबूत 
स्नेह में पक।

5

निरर्थक है
रक्त बन्धु की खोज
कच्चे धागे का। 

6

साध मिटाती
बांध कान्हा को राखी 
दूजा ना भाई। 

7

गांठ अजूबा
रिश्ता दृढ करता
कच्चे धागे का। 

8

आस में डोरी 
झांके द्वार देहरी
व्यग्र बहना।

==

Wednesday, 6 August 2014

मुक्तक



1

प्रकृति-ललित-जाल में उलझा लोचन
रिमझिम मेघ बरिसत ऋतु दुखमोचन
सरि-आईने में निहारे सजे चन्द्र मुखरा 
हुआ चकित चकोर देख दृश्य मन रोचन



2

एक औरत दूसरी औरत को समझने में चूक जाती है 
लगता है मुझे हमेशा बीच की कड़ी ही कमजोर होती है
सबकीबात नहीं जहाँ चूक हो जाती है वहाँ की कर रहे हैं
बहुतों सास-बहु बहु-सास ननद-भौजाई में नहीं बनती है

==
बीच की कड़ी = भाई बेटा पति यानि पुरुष



Monday, 4 August 2014

मित्रता दिवस की असीम शुभ कामनायें



नेट और बादल के बीच रगडा होने के कारण थोड़ी सी देर हो गई …
हाई वोल्टेज के कारण wi fi ही जल गया था जो अभी ठीक हुआ.....

मित्रता दिवस की असीम शुभ कामनायें
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मित्र का साथ 
दुःख हो जाता आधा
सुख दोगुणा ।

2

धोखा ना रेंगे 
प्यार शंख-सीपियाँ
दोस्ती दरिया।

3

दोस्ती दरिया
धोखा शंख-सीपियाँ
रिश्ता मलिन ।

4

सब का साथ 
मित्र फिर भी तन्हा 
मित्र के बिना।

5

दोस्ती की हद 
खल की मजबूरी
हद में रहे।

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सभी का शुक्रिया _/\_


Saturday, 2 August 2014

चित्र देख कर हाइकु …… कितना सार्थक नहीं जानती ....





हाइकु लिखने के लिए चित्र ०४ 


1

शिशु तोषित 
मिली त्रासक मुक्ति 
माँ से पोषित। 

2

जी बेखटक 
झूमे नाचे व गाये 
माँ गोद मिले। 

3

जी निष्कंटक
अमृत डोर बँधी 
आँचल तले। 

4

माँ अभिराम 
बनी रहती ढाल
भूमि की ईश। 

5

माँ अंक मिले 
सुरक्षा अहसास 
सृष्टि सिमटी। 

6

जियें निडर
फिरदौस सा समझें
आँचल तले।

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अपनी बोतल से पानी दे रही नन्हीं छात्रा- चित्र ०१




1

प्यास समझे
माया से भरी बच्ची 
जल बाँटती

2

व्याकुल कंठ
भरे नयन सरि
स्नेह नीर से

3

नेह दर्शन
जीवन का स्पंदन
पा रही दुआ

4

स्मित से दीप्त
हर क्षण उद्यत
सेवा में लिप्त

5

कर्म-पुण्य है
श्रमेच्छुक मार्ग है
प्यास बुझाना।



बच्चे को लटकाये ईंटें ढो रही महिला- चित्र ०२

1

माँ करे श्रम
बिना बोझ समझे
लाद ले शिशु

2

श्रम है पूजा 
बदल देती भाग्य 
शोर है गूंजा।

3

माँ करे श्रम 
हरारत हारता
हँसे अभाव।

4

सतत खड़ी
नियति से लड़ती
शक्ति स्तम्भ सी

5

चुनी वेदना
है प्रकृति स्वरुपा
अतुलनीय

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हिरन के ब्च्चे को कुछ खिलाता छोटा बच्चा- चित्र ०३ 

1

प्यार पाया है
हक्का बक्का है छौना
दोस्त मिला है

2

चकित छौना
नन्हा फ़रिश्ता पाया
धूप में छाया

3

मूंढ सा छौना
बच्चे की दुआ पाये
धूप मेँ छाया

4

छल से दूर
मस्ती में डूबे छौने
रिश्ता मधुर

5

शिशु-हिरण
दो पौधे छांह देते
संगी साथी सा

6

मस्ती में डूबे
शिशु मृग दो दोस्त
अभी को जीते

7

शिशु समझे
पशु मन की भाषा
अंश दे खिला।

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तारे जुगनू
छेड़े मधुर तान
जुगलबन्दी
yaa
जीत की होड़
तारे संग जुगनू 
जुगलबन्दी 

==

सूर्य चितेरा 
रश्मियाँ संग फुहि 
रंगे धनक

===

क्रोध दिखाता
सूर्य स्लैब पे बैठा
पूरब चौका

===

संजो रखे हैं
इंच इंच सपने
आस संदूकी।


२६ अगस्त २०२६

आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे...