Saturday, 18 March 2017

यूँ ही


ना लिखने से बेहतर है
थोड़ा थोड़ा लिखना

01.
डूबता सूर्य-
नाक से माँग सजी
सिंदूर लगा।
02.
इंद्रधनुष -
शादी में कुम्हारन
बर्तन लाई।

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वय आहुति पकी वंश फसल गांठ में ज्ञान
जीवन संध्या स्नेह की प्रतिमूर्ति चाहे सम्मान
एक जगह रोपी गई दूजे जगह गई उगाई
बिजड़े जैसी बेटियाँ आई छोड़ पल्लू माई
किसी हिस्से फूल किसी हिस्से मिले शूल
छादन बनती विरोहण झेलती सहती धूल
डरे ना दीप हवा जो चले हथेलियों की छाया
डरे ना धी पिता कर माया जो आतंक साया
ससुरैतिन जलती, धुनी जाती जीना बवाल
दामाद क्यों नहीं जलाया जाता ससुराल
बेटी बॉस रहे बहु दास दुनीति बसे ख्याल


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कर्म
जी डूबे
शिखी नर्म
यादें तवाफ़
नवजात कर
कोंपल छुई-मुई
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क्यूँ !
छली
जी उठे
साँसें सार
मन रेशम
जीवन्तता नार
एहसास कोमल

Monday, 6 March 2017

*गिरगिट*



"हेलो ! भाभी हम दोनों  कुछ दिनों के लिए आपके घर आ रहे हैं । मेरे पति की तबीयत बहुत बिगड़ गई है"। मायना अपनी भाभी से फ़ोन पर बात की

"क्या हुआ आपके पति को दीदी ? आप जीजा जी को वहाँ के डॉक्टर को दिखला ली क्या" ? भाभी के चेहरे पर मनहूसियत छा गई , ननद की आने की खबर सुन कर

"हाँ हाँ ! भाभी वहाँ के डॉक्टर को दिखला चुके हैं । डॉक्टर बड़े शहर में दिखलाने के लिए बोला था तो हम कई दिनों से यहाँ आए हुए हैं । टेस्ट सब हुआ तो पता चला कि इनकी दोनों किडनी फ़ेल है और इलाज के लिए इसी शहर में ज़्यादा दिन रुकना होगा"।

"तो तुम्हारे पति के छः भाई भी तो इसी शहर में रहते हैं ? सुख दुःख अपनों के बीच ही काट ली जाती है"

"हाँ भाभी ! आप सही कह रही हैं ... सबों से बात करने के बाद ही आपको फ़ोन की हूँ ! इस उम्मीद में कि आपके घर में हमारे लिए ज़रूर जगह होगी ! ससुराल के इनके सभी भाई एक एक घर में रहते हैं । लेकिन मेरे भाई का चार मंज़िला हवेली है । कोई बता रहा था कि सभी तीन मंज़िलों के कमरे ख़ाली पड़े हैं" !

"अरे कहाँ से तुम गलत खबरें पा जाती हो ननदी  ? कुछ कमरे के लिए पेशगी ले चुकी हूँ । हमें तो क्षमा ही करो तुम"।

"क्यूँ भाभी कोर्ट में मिले हम क्या"?

"धत्त ! हमलोग घर में आपलोगों का इंतज़ार कर रहे हैं दीदी , जल्द आइयेगा प्यारी ननद रानी"।


Sunday, 19 February 2017

क्रमशः

Live with happiness not for happiness
जो है जितना है
उतना में ख़ुश होना
सीख लेना समझदारी है

रिसेल आज चिंतित हो गया, कई दिनों से एनी दिखलाई नहीं दे रही थी ।
दो सालों से नित प्रतिदिन दिन सुबह की सैर में भेंट होने से एनी और रिसेल में गहरी दोस्ती होने लगी थी । सुबह की सैर में अनमना रिसेल एनी के घर पहुँच call-bell दबाया । थोड़ी देर प्रतीक्षा के बाद दरवाज़ा खुला । दरवाज़ा खोलने वाला १८-१९ साल का ख़ूबसूरत नौजवान एनी का पुत्र था । आदर के साथ रिसेल को ड्राइंगरूम बैठा दिया। थोड़ी ही देर में एनी आ बताई कि वो अस्वस्थ थी , इसलिए सुबह की सैर में नहीं आ पा रही थी
आस पास से ही खाँसने की आवाज़ आई , रिसेल के प्रश्नवाची निगाहों पर ऐनी रिसेल को बग़ल वाले कमरे में ला अपने पति से मिलवा दी । एनी के पति को देख रिसेल स्तब्ध रह गया । एनी ३८-३९ साल की होगी तो उसका पति ७२-७३ साल वृद्ध बिछावन पकड़े।
क्यूँ की फ़ैसला शादी का इनसे जब उम्र का इतना फ़ासला था .. कमरे से बाहर आते हुए सवाल दाग़ ही दिया रिसेल ने ऐनी से
शादी हो रही है तब समझने की ना तो उम्र थी ना आस पास कोई विरोध करने वाला था .... बहुत अच्छे इंसान हैं मेरे पति!
इतने ही अच्छे इंसान हैं तो तुमसे शादी ही क्यूँ की .... पढ़ा लिखा कर तुम्हारे योग्य लड़के से करते शादी .... क्या कारण था कि ये तब तक शादी नहीं किए थे ये ख़ुद ?
अरे इनकी शादी हो चुकी थी ... मुझसे बड़े बड़े इनके बच्चे थे
तो अपने बेटे से ही शादी करवा देते समय आने पर!
समय की प्रतीक्षा करते और बेटा बड़ा हो पिता की बात मान ही लेता इसकी किस आधार पर उम्मीद की जा सकती थी ?
तुम इन्हें मिली कैसे और कहाँ ?
लड़कियों की तस्करी करने वालों के हत्थे से छूट कर इनके पनाह में पहुँची थी .... ये तब S.P. थे ... घर के कामों में सहायता करने लाए थे मुझे । . सारे घर के काम करने के बाद भी किसी न किसी बात पर इनकी पहली पत्नी और बच्चें मेरी धुनाई अच्छे से करते थे !
अभी सब कहाँ हैं और ये केवल यहीं पड़े रहते हैं ?
एक बार ये बहुत बीमार पड़े घर के किसी सदस्य ने इनकी सहायता नहीं की .. मेरी सेवा करने से ये इतने प्रभावित हुए कि मुझे सबसे दूर किराए के मकान में रखने का फ़ैसला कर डाला तब तक मैं माँ बनने की तैयारी में थी। ..  इनके साथ नहीं होती तो कहाँ होती ?


Thursday, 16 February 2017

मोक्ष



ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन
हेलो
कैसी हैं ?
बिलकुल ठीक ! :) आप सुनाएँ कैसी हैं ?
मेरी तो नींद ही उड़ गई ... मन बहुत खराब हो गया ...अब तो रात भर नींद ही नहीं आएगी
ओह्ह ऐसी क्या बात हो गई ....मुझे भी बतायें चिंता होने लगी है ....
 WhatsApp ग्रुप में एक पेपर का कटिंग आया है जिसमें खबर है कि दास जी लापता हैं। .... 
भला वो कौन है जिनको आज दास जी की खोज खबर चाहिए। ... केवल पैसे के लिए जिनकी जरूरत थी। ... वो रहे या ना रहे क्या फर्क पड़ता .... वो भी आज जबकि वे रिटायर्ड हो गये थे ... केवल पेंशन पर हैं ....आधा उन्हें मिल रहा था ...चौथाई मिलेगा ही ...वर्षों से नौकरों के भरोसे थे ....पत्नी साथ क्यूँ नहीं रहती थी ये उनका निजी मामला था ...समाजिक तौर पर उनकी मुक्ति से मैं खुश हूँ 

Wednesday, 15 February 2017

पुस्तक मेला + वेलेंटाइन डे





चित्र में ये शामिल हो सकता है: 6 लोग, लोग बैठ रहे हैं

पटना (बिहार) में पुस्तक मेला (चार फरवरी से चौदह फरवरी) और वेलेंटाइन डे सप्ताह भर संग संग


कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, लोग खड़े हैं

ठिठकी भीड़
कुम्हार चाक देख
पुस्तक मेला
रो रहा प्रकाशक
स्व स्टॉल खाली पाया

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, लोग खड़े हैं 

चहूँ ओर सत राग का शोर बड़ा
बता दो किनके गले में छाला पड़ा
हाँ तो गर्म दूध जिनके मीत ने पीया
कड़ा सवाल सुनते क्यूँ लकवा जड़ा

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दिवस प्यार –
उजड़ा बाग़ देख
रोया पड़ोसी
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पुस्तक मेला-
कुम्हार चाक संग
भीड़ ले सेल्फ़ी



Monday, 13 February 2017

छल में भी होता है छिपा हित




कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.


"बहुत परेशान दिख रहे हैं सर क्या बात है ? किस बात की चिंता है आपको " ? अपने पदाधिकारी को चिंताग्रस्त मुद्रा में देख अधीनस्थ कर्मचारी ने पूछा
.
"कोई विशेष बात नहीं है। बहन की शादी करनी है, तैय नहीं हो पा रही है। ... घर में सबसे बड़े होने की जिम्मेदारी निभा नहीं पा रहा हूँ।
.
"अरे बस इतनी सी बात है सर ! समझ लीजिये आपकी चिंता अब खत्म। मेरा भगिना है। आप अपनी बहन की शादी की बात कर सकते हैं मेरी दीदी के घर चल कर। दीदी बहु की खोज में ही है। उनलोगों को , बी.एड की पढ़ाई की हुई लड़की चाहिए।
.
बी.एड. मेरी बहन तो स्नातक भी नहीं है। ... मैं तो उसके पढ़ाई पूरी करवाना ही नहीं चाहता था। .. जल्दी से जल्दी केवल शादी कर जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहता था .... 
.
समय गुजरता गया ! चाह कर भी लगातार प्रयास करने के बाद भी भाई अपनी बहन की शादी तैय नहीं कर पाया दो सालों में .. और बहन जब स्नातक कर गई तो बी.एड. में नामांकन करवाने के बाद उसी अधीनस्थ कर्मचारी के भगिने से शादी तैय कर दिया
.
"आपको पता है न ? मैं नौकरी नहीं करूँगा! लड़की का बी.एड. होना इसलिए अनिवार्य था ताकि वो अपने निजी खर्चों के लिए किसी की मोहताज़ ना हो। सौ रूपये में अच्छे सहयोगी मिल जाएंगे, उन्हें घर के कामों के लिए। इतने रुपयों के लिए कोई केवल घर सम्भाले ,ये तो उचित तो नहीं ? अपने घर पर आये अपने होने वाले साले से सवाल किया 
.
"हाँ ! हाँ ! आप निश्चिन्त रहें ! मेरी बहन के लिए भी ख़ुशी की बात होगी कि वो अपने पैरों पर खड़ी होगी। ... उड़ेगी खुला आकाश पा कर
.
बहन के शादी के कुछ सालों के बाद बहन की शिक्षिका की नौकरी की बात जब भाई ने चलाई तो बहन के ससुराल वालों साफ़ इंकार कर दिया। .... नौकरी करने कैसे जायेगी? .. बेपर्दा .....
.
.
"मैं नौकरी कर रहा हूँ तो घर पर काम करने के लिए ,मेरे माँ -बाप के सेवा के लिए , बच्चों के लिए किसी क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए ये सोच कर न सवाल उठाना चाहिए था साले साहब 
.
बहन-भाई सब कुछ समय की धार में ढूँढ़ने लगे 
समय के साथ बहन को बेटा हुआ ,बेटा बड़ा हुआ और माँ को प्रेरित कर पाठन -लेखन की दुनिया में ला व्यस्त कर दिया ..... तब तक सारे रिश्ते नातों की जंजीर बची कहाँ थी ... 
समय का क्या है .. ना ठहरता है ना छलता है ..... सबके लिए कुछ ना कुछ सोच कर रखा रहता है ..... 


देखो न छल में भी होता है छिपा हित
थमो नहीं राह खुद ढूँढ़नी होती है मीत

शिकवा करके ना मारो कुल्हाड़ी पे पैर






Thursday, 2 February 2017

मुक्तक



उबलते जज्बात पर चुप्पी ख़ामोशी नहीं होती
गमों के जड़ता से सराबोर मदहोशी नहीं होती
तन के दुःख प्रारब्ध मान मकड़जाल में उलझा
खुन्नस में बयां चिंता-ए-हुनर सरगोशी नहीं होती

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वर्ण पिरामिड 

तो 
वैसा
स कर्म
सोच जैसा
गर्व गुरुता
दंभ से दासता
इंसान स्व भोगता
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स्व
भान
सज्ञान
राष्ट्रगान
अव्यवधान
गणतंत्र मान
वीडियोग्राफी भू की




Monday, 30 January 2017

हौसला




"लेखन का क्या हाल-चाल चल रहा है "? बहुत दिनों से प्रभा का लिखा कुछ दिखा नहीं तो ज्योत्सना पूछ बैठी । प्रभा लेखन कार्य में बहुत होशियार थी लेकिन अपने छोटे भाई के अचानक गुज़र जाने से स्तब्ध हो लेखन छोड़ बैठी थी ।

बिल्कुल बंद है दी अभी तो

क्यूँ ?

पता नहीं
राकेश के जाने के बाद एकदम बंद सा हो गया और अब मन ही नही करता । वो पिछले छ: महीने से जो बंद हुआ अभी शुरु हुआ ही नहीं

बहाने हैं सब
साँस जब तक चलती है तो हर काम का समय निश्चित है 🙏

कह सकते हैं दी आप😔
पर अब लेखन में मन नहीं , देखो फिर जागता भी है या नहीं!

सोया ही नहीं है तो जागना क्या ?
अभी जो हम गप्प कर रहे ये भी तो लिख रहे हैं न ? हमारी पहचान ही है कि हम बकबक बहुत करते हैं ,😃😃

ये दी लेखन में नहीं आता न
ये तो बातचीत😝

लेखन में क्या आता है ? गीत , गज़ल , कविता , काव्य , कहानी
लघु कथा क्या होती है ?

लघुकथा तो दी लिखी ही नहीं कभी ! लघुकथा सीखा दीजिए दी ,कोशिश करुंगी!

ये लो कर लो बात
मैं कब लिखी ? मैं तो गप्प को लिख देती हूँ !

ये कमाल आप ही कर सकती हैं😍
मान गए उस्ताद🙏🏻🌹🍫
😀😀😀😀😍😍

उस्ताद बुस्ताद कुछ नहीं
समय काट रही हूँ । जी रही हूँ तो कुछ तो करना है । जाने वाले के साथ जा नहीं सकते । जी रहे सांसें चल रही है तो और सह सकते हैं
सहने की शक्ति है तो लो ज़िंदगी हँस कर जिएँगे ।

जी दी !वो तो सही है
आपसे बहुत कुछ सीखा
तभी तो जेठ के लडके की शादी में किसी को एहसास भी न होने दिया
सबसे ज्यादा हँसी मेरी ही गूँजी ।
सही में दी आपकी ही बहना तो हूँ
मेरे ससुर जी ने बहुत तारीफ की
कि ऐसी लडकी नहीं देखी !

Sunday, 29 January 2017

सीख



शाम को टहलते हुए आसानी होती है , दूध व सब्ज़ी ले कर लौटना ... यूँ तो अक्सर दूध बूथ से ही लेती हूँ ... लेकिन कभी कभी किराने की दुकान से भी दूध ले लेती हूँ .... सब्ज़ी का दुकान और किराने का दुकान एक दूसरे के आस पास है .... सब्ज़ी ले कर किराने के दुकान से ही दूध लेना आसान था ..... किराने की दुकान गयी तो दुकान में मालिक युवा था ..... चालीस रुपया दी ; दूध था ३९ का , युवा दूध दे मोबाइल में व्यस्त हो गया । मेरे टोकने पर वो बुदबुदाता(चिल्लर चाहिए) टॉफी का डिब्बा खोलने लगा .... मैं मना की कि नहीं मुझे टॉफी नहीं चाहिए ... बाद में हिसाब कर लेंगे ... तो बेहद उखड़े आवाज में बोला कि मैं हमेशा नहीं बैठता दुकान में ,याद कौन रखेगा , चेंज ले कर आना चाहिए ; मेरे पास एक रुपया नहीं है ,दो का सिक्का है .... युवा वर्ग को तैश गलत बात पर ही ज्यादा आता है ..... सब्जी वाले से मैं एक का सिक्का ली ,किराने के दुकान से दो का सिक्का बदली ,सब्जी वाले को दो का सिक्का देकर चलती बनी

Tuesday, 24 January 2017

मध्यांतर



आज दैनिक जागरण अख़बार के कार्यालय में .."बालिका दिवस" .. के अवसर पर संगनी क्लब की सदस्याएं अपने अपने विचार रख रही थीं .. विषय था "बेटियाँ बचाओ - बेटियाँ पढ़ाओ"
"मेरी परवरिश अच्छी हुई .... मैं पढ़ी लिखी हूँ ... शिक्षिका हूँ .... मेरे पिता मेरे संग रहने आये मगर रह ना सकें | हमारा संस्कार , हमारी परवरिश ऐसी है कि हम ससुर से वैसा व्यवहार नहीं कर सकते हैं , जैसा हमारे घर आये हमारे पिता के साथ होता है , हम घर छोड़ भी नहीं सकते " बताते बताते रो पड़ी महिला ...
"बताते हुए आपके आँखों में आँसू है यानि अभी भी आप कमजोर हैं ..... आँखों में नमी लेकर अपनी लड़ाई लड़ी नहीं जा सकती है ..... घर में एक से आप अपनी लड़ाई जीत नहीं सकती .... तो ... ज्यों ही चौखट के बाहर आइयेगा , सैकड़ों से कम से कम लड़ना होगा, कैसे जीतने की उम्मीद कर सकती हैं ..... दीदिया का कहना है ::पुरुष,स्त्री को चाहें जितना भी प्यार कर ले किन्तु,बराबरी का दर्ज़ा.....नको, सोचना भी मत।"
" सोचना क्यूँ है
जहाँ ना हो वहाँ दे भी नहीं"
"ना देने पर घर,हल्दीघाटी बन जाता है विभा।"
"मुझसे बेहतर कोई जान नहीं सकता है दीदिया , लेकिन दवा भी यही है
समय लगता है लेकिन स्थिति सुधरती है"
जंग जारी रखना है और जीतना है

Tuesday, 17 January 2017

मुक्तक





प्रीत की रीत की होती नहीं जीत यहाँ
ह्रीत के नीत के होते नहीं मीत यहाँ
शीत यहाँ आगृहीत तड़ीत रूह बसा
क्रीत की गीत की होती नहीं भीत यहाँ

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ली
पाली
रश्मियाँ
'हरियल'
जौ गेंहूँ बाली
भू स्वर्ण नगरी
स्वेद कलमकारी
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पी
प्रधि
शै चोर
स्वप्न संधि
बैरी है बौर
कंचन नरंधि
स्व लगी गप्पियाने

खूबसूरत हरा कबूतर 'हरियल' जिसके पैर पीले होते हैं

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२१ मई -चाय दिवस

  सन्धान उधड़ रहे थे रिश्ते धीरे-धीरे, जैसे पुरानी रज़ाई का कोना, बातों के धागे टूट चुके थे, और मौन ने घर भर में शुरू कर दिया अँधेरा बोना! त...