Wednesday, 23 July 2014

आ गया मॉनसून




तांका 

1

नूर की बूँदें
उदासी छीन रही
इक आसरा
तरुणी हुई धरा 
अनुर्वरा ना रही

======

2

बूँदों की धुन
झींगुर सुर संग
कील निकाले
पेंगो संग सपने
ऊँची उड़ान चढ़े  


पेंगो की चाह 
वहशी करे पीछा
कदम खींचे।


15 comments:

  1. मनहारी तांका

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  2. सुंदर वर्नण...
    सुंदर अंदाज मे....

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  3. अपने मन की उमंग को सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

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  4. बहुत मनभावन प्रस्तुति....

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  5. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन 3 महान विभूतियाँ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  6. हाइकु ने आज का दर्द बयाँ किया है. कभी तो ठीक होगा सब.

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आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

ग़ज़ल

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