Saturday, 8 February 2020

लाइलाज तो प्रेम है



[07/02, 8:03 am] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता : सबके लिए

[07/02, 8:26 am] : विभा दी गुलाब के काँटों से डरती हूँ...।

[07/02, 8:27 am] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता : 🤔आप और डर😜🍫

[07/02, 8:28 am] : गोली से नहीं चुभन से डरती हूँ...
[07/02, 8:30 am] : बिना काँटों के फूलों के साथ यही उपहार भी देती हूँ....

[07/02, 8:35 am] विभा रानी श्रीवास्तव दंतमुक्ता: बिन कांटों के फूल का चयन किया जा सकता है

शब्दों में के कांटों का क्या किया जाए

जिन्हें शब्दों के कांटों की आदत हो जाती है

उन्हें गुलाब के कांटों के चुभन अच्छे लगने लगते हैं...
[07/02, 9:23 am] : बहुत खूब कही आपने
[07/02, 5:33 pm] : बहुत प्यारी बात
कांटों के चुभन का क्या है बस थोड़ी सी शक्कर...

5 comments:

  1. जी दी ऐसे रंग मजं अक्षर पढ़ने में नहीं आ रहा।
    कृपया ठीक कर दीजिये न ताकि पाठकों को सहूलियत हो।

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    1. ओह्ह गलती हो गई रंगों के साथ खेलना उचित नहीं हो सका

      सस्नेहाशीष संग शुक्रिया छूटकी

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  2. जय मां हाटेशवरी.......

    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    09/02/2020 रविवार को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में. .....
    सादर आमंत्रित है......

    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

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  3. "जिन्हें शब्दों के कांटों की आदत हो जाती है
    उन्हें गुलाब के कांटों के चुभन अच्छे लगने लगते हैं..."

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आपको कैसा लगा ... यह तो आप ही बताएगें .... !!
आपके आलोचना की बेहद जरुरत है.... ! निसंकोच लिखिए.... !!

चालाकी कि धूर्तता

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