Tuesday, 4 February 2020

“गौरवशाली यादें”


अभी तो हर गली हर मुहल्ले हर शहर में लाउडस्पीकर लगाकर निर्भया/दामनी/चुन्नी/मुन्नी के बलात्कारियों के संग न्याय-व्यवस्था को गाली देने की इच्छा बलवती होती जा रही है।

"राउर पापा बहुते गंदा-गंदा गाली दी ले बबुनी!" मैं कई महीनों के बाद अपने मायके के गाँव गई थी.. घर के बाहर मुझे खड़ा देखकर धान पीटती, चूड़ा कूटती महिलाओं में से कई बोल उठी तो अन्य कई अनुमोदन के स्वर मिला बैठी।
  मैं चौंक गई। उन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। घर के अंदर गई तो पापा के गाली देने की बात को भाई-भाभियों द्वारा भी पुष्टि की गई। अब मेरे स्तब्ध होने की बारी थी।
    मेरी माँ की पहचान थी, उनकी शीतल व शांत वाणी, नपा-तुला बोलना, इतना धीमा बोलना कि जिससे बोल रही हैं केवल वही सुन पाए। हम बच्चों को उनसे कभी डाँट नहीं मिला। वे बहुत ही मधुर गाती थीं। उनके गाये गीत बहुत लंबे होते थे। मैं सदा सोचती कि उन्हें यह याद कैसे रह जाता है। बेहद अनुशासन प्रिय व्यक्तित्व पापा का भी था। हम भाई-बहनों में कभी झगड़ा हुआ भी तो अपशब्द किसी के मुँह से नहीं निकलता था। सुलह करने/कराने में हमने माता-पिता को भी गुस्सा में कभी नहीं देखा। जैसे अन्य दम्पतियों में नाराजगी-उलाहना पाया जाता है, वैसा कभी भी हमने अपने माता-पिता में नहीं पाया। अगर कभी हमारे बड़े भैया बहुत तेज गुस्सा होते थे तो एक अपशब्द बोलते थे वो था 'सुअर'। इसके अलावे हम अपने घर में दूसरी कोई गाली सुने ही नहीं थे। पापा कब , कैसे , क्यों गाली देने लगे यह मेरे लिए खोज का विषय हो गया। लेकिन पता कैसे लगाती ! ना तो वे मेरे सामने किसी को गाली देते और ना स्वीकार करते कि वे गाली देते हैं। आज भी पापा को मैं याद करती हूँ तो चार बजे भोर में , दोनों आँखों को बंद किये,  दादी-दादा के चरण-स्पर्श के बाद ही, सांसारिक वस्तुओं को देख पाते हुए पिता का स्मरण होता है।
 मेरी माँ की मृत्यु बहुत वर्षों पहले हो चुकी थी। हमारे पापा के जीवन का बहुत लंबा समय अकेलापन में कटा। बच्चों के पास रहे, संग होना सबके लिए थोड़ा कठिन होता है। क्या सठियाना वजह रही होगी उनका गाली देने की..। कहते हैं लोग न कि हिन्दू के वृद्ध सठिया जाते हैं।
 साठ साल की तो मैं भी हो चली हूँ। क्या मैं भी गाली देने लगूँगी...!
सच कहूँ ...! जब बलात्कार का वीडियो वायरल होता है तो चिल्ला-चिल्ला कर गाली देने की इच्छा होती है। बलात्कार करने वाले से लेकर वीडियो को वायरल करने वालों पर। न्यायालय में बलात्कारियों के वकीलों पर..! न्याय में होने वाले देरी पर कानून बनाने से लेकर लागू करने वालों पर।

जब कोई बहन की पिटाई का वीडियो , मरने का वीडियो वायरल करने का अनुरोध करता नजर आता है तो उस लड़की के ससुराल वालों को गाली देने की इच्छा होती है। ज्यादा इच्छा होती है गाली दूँ.. लड़की के मायके वालों को। अरे! मार खाने से लेकर, मरने तक सहने की घुट्टी पिलाई गई रहती है लड़कियो में.. आज भी समाज की चिंता ज्यादा है लोगों में। उफ्फ यह समाज भी तो उन जैसों से ही बना है जिन्हें बेटियाँ-बहुएँ इंसान ही नजर नहीं आती हैं। दकियानूसी समाज की औरतों को ही औरतों के हर मामले में पुरुषों की गलती छोटी बात लगती है।
"जाने भी दो, औरत को थोड़ा-बहुत बर्दाश्त करना आना चाहिए।" कहती बड़ी-बुजुर्ग औरतें माँ-सास को... क्या गाली दिया जाए सोचती रहती हूँ!
एसिड अटैक करने वालों.. ऐसी सूची बनाऊँ तो लम्बी फेरहिस्त है..! खोज करनी थी मुझे गाली देने की वजह की तो बात यह समझ में आई कि जब हम लाचार-बेबस हो जाते हैं, व्यवस्था से पीड़ित होते हैं। तो गाली देकर अपने मन का भड़ास निकालते हैं..!
परिवेश और परवरिश माता-पिता का ही दिया हुआ है कि मैं कैसी भी परिस्थिति में रहूँ, मेरे शब्दकोश में अपशब्द नहीं है। स्नेह करना सम्मान देना मुझे मेरे पिता ने ही सिखाया। मेरे पिता अपनी भगनी-भतीजियों के संग-संग आस-पड़ोस की बेटियों को भी अपनी बेटी समझते थे.. उनके ससुराल के गाँव में जल ग्रहण नहीं करते थे..! तब बेटियाँ समाज की साझेदारी की होती थी।
 पापा से मिले ही संस्कार है फुर्सत ही नहीं कल की नकारात्मक बातें आज में याद रखने की.. नई सुबह में नई बातों की लम्बी सूची मिल जाती है।
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रश्मि प्रभा जी ने विभा को यायावर सी किसी से कहीं भी प्यार से मिल लेती है कहा।
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    आज के समय में जब ड्योढ़ी के अंदर की सारी जिम्मेदारियों को पूरा कर ली... बेटा , बहू के संग विदेश चला गया और तन्हाई का स्थायी रूप से निवास हो गया तो ड्योढ़ी के बाहर की दुनिया में अपने को रमा देना उद्देश्य हो गया... समाजिक ऋण जिस रूप में उतार सकूँ प्रयास करती हूँ... कल पर यकीन है, कौन सा आज ही प्रलय आ जाने वाला है। संयम, समझ व संवेदना का साथ समय पर छोड़ देते हैं तो शिक्षित होने का क्या फायदा..
 मरने के बारे में सोचती ही नहीं... यानी सोचने के लिए समय नहीं निकाल पाती कि कभी मरना भी है... हर पल जीत लेती हूँ जीने के लिए... सहित्योपचार नहीं मरेगा, हमलोगों द्वारा स्थापित साहित्य और समाज के प्रति जागरूकता और पागलपन नहीं मरेगा... मर ही नहीं सकता न... बूँद हूँ! दरिया के संग मिलकर सागर का दशा-दिशा बदलने की चाहत रखती हूँ..!

5 comments:

  1. सार्थक जीवन मंत्र। जी दी आपका व्यक्तित्व सदैव प्रेरणादायक है। आपके विचार स्त्रियों के सीमित विचारधारा के मिथक को तोड़ते हैं। जीवनपर्यंत अपने जीवन के निःस्वार्थ उद्देश्य का यह सफ़र निर्विध्न चलता रहे यही कामना करती हूँ।
    प्रणाम दी।
    सादर।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 04 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत बढ़िया

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