Wednesday, 5 February 2020

बस यूँ ही..



सदा सोचती हूँ
बड़े-बड़े नाखून
कैसे संभाले जाते होंगे!
लाख जतन करो
गीले नाखून से
चटक ही जाते हैं रिश्ते!

काश! रिश्तों में आये पतझड़ के
पत्तो सी आई सिकुड़न को भी
उबलते पानी पर
चलनी में रखकर
भाप से सीधे किये जा सकते
बुनावट में निखार आ जाता।

5 comments:

  1. वाह!! बेहतरीन पंक्तियां "काश रिश्तो में आए पतझड़ के पत्तों सी आई सिकुड़न को भी है उबलते पानी पर चलनी में रख कर भाप से सीधे किए जा सकते...👌 यूँ प्रतीत हो रहा है कि यह पंक्तियां कवि के कोमल मन से गुजरकर कागज के पन्नों पर उकेर दी गई हो. आश्चर्यचकित हो जाती है कभी-कभी कि हम इंसान कितने आशावान होते हैं रिश्तो के खत्म होने के बाद में फिर से उस रिश्ते को जीवंत करने की पूरी कोशिश करते हैं छोटी सी पंक्तियों में आपने बहुत बड़ा संदेश दे डाला बहुत ही अच्छा लिखा आपने बधाई...🙏🙏

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  2. वाह दी बहुत अच्छी पंक्तियाँ।

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  3. बहुत सुंदर पंक्तियाँ

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