Wednesday, 5 February 2020
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धर्म की सीमा
धर्म की सीमा : युवा प्रवर्तक ब्लॉग धर्म की सीमा : ब्लॉग बोधायन पत्रिका आरती की थाली मेज़ पर रखी थी। रोली की लालिमा अभी भाई के माथे पर ताज़ा ...
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(1) पीली चुनर ओढ़े हठी धरणी मधुऋतु में ************* (2) षट रागिनी कुहू लगे मन पे कुसुमागम ************* (3) किंशुक छाया वशीभूत अचल...

हार्दिक आभार भाई आपका
ReplyDeleteवाह!! बेहतरीन पंक्तियां "काश रिश्तो में आए पतझड़ के पत्तों सी आई सिकुड़न को भी है उबलते पानी पर चलनी में रख कर भाप से सीधे किए जा सकते...👌 यूँ प्रतीत हो रहा है कि यह पंक्तियां कवि के कोमल मन से गुजरकर कागज के पन्नों पर उकेर दी गई हो. आश्चर्यचकित हो जाती है कभी-कभी कि हम इंसान कितने आशावान होते हैं रिश्तो के खत्म होने के बाद में फिर से उस रिश्ते को जीवंत करने की पूरी कोशिश करते हैं छोटी सी पंक्तियों में आपने बहुत बड़ा संदेश दे डाला बहुत ही अच्छा लिखा आपने बधाई...🙏🙏
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद आपका
Deleteवाह दी बहुत अच्छी पंक्तियाँ।
ReplyDeleteबहुत सुंदर पंक्तियाँ
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