Friday, 15 May 2020

विश्व परिवार दिवस




"बहुत बड़ी चिंता दूर हुई और अब शायद पापा के साथ हम सबका तनाव कुछ कम हो पायेगा।"
बेटे-बहू से मिलने श्रीवास्तव जी अपने पत्नी के साथ कैलिफोर्निया आये..। वे छ: महीने के लिए आये थे तो अपनी दवाइयों को उसी अनुपात में लाये थे। छ महीना पूरा होने पर आ गया था, लेकिन वैश्विक युद्ध के कारण उनका वापसी टलता जा रहा था। श्रीवास्तव जी की स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए पूरा परिवार परेशान था। श्रीवास्तव जी का बेटा अपने परिचित, मित्रों में बात चलाता है जिसमें उसे पता चलता है कि बैंगलोर में रहने वाला तनय 'अर्जेन्ट मेडिसिन्स फॉर्म इंडिया टू वर्ल्डवाइड' के माध्यम से विश्व के किसी कोने में दवा उपलब्ध करवा देता है।
श्रीवास्तव जी के बेटा-बहू तनय से सम्पर्क करते हैं.. वर्चुअल गोष्ठी में तनय से माया कहती है,-"हमें तत्काल दवा चाहिए आप अपना अकाउंट डिटेल दीजिए।"
"पहले आप सभी दवाओं का नाम, प्रिस्क्रिप्शन दिखाइये, अपना आधार कार्ड दिखाइए। दवाओं का इंतजाम कर जब आपको भेज दूँ तो पैसे की बात होगी।" तनय कहते हैं।
"इन हालात में आपको इतना विश्वास है..?" श्रीवास्तव जी की बहू को आश्चर्यचकित होते हुए पूछती है।
"क्या आपको वसुधैव कुटुम्बकम् पर विश्वास नहीं...?"



2 comments:

  1. जो देशवासी कैलिफोर्निया तक पहुँचे उन पर पैसों को लेकर अविश्वास नहीं करेंगे फिर वसुधैव कुटुम्बकम हुआ न....यहाँ एक भिक्षुक बुखार से तड़पता मेडिकल स्टोर पर हाथ फैलाकर दवा के लिए गिड़गिड़ाते देखा जा सकता है...।
    चलो कहीं तो है वसुधैव कुटुम्बकम।

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  2. आपकी बातों से बिलकुल सहमत हूँ.. रेलवे पटरी पर दम तोड़ती.. घर वापसी की तस्वीरों में - खबरों में हालात जाहिर हो रहे हैं.. बहुत ही भयावह परिस्थितियों से सामना करने के लिए तैयार रहना है.... फिर भी सावन-भादो की अमावस्या की काली गहरी रात में एक जुगनू दिख जाए तो उस प्रकाश में उम्मीद जगती है... वो कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा.. किसी को बीस हजार सैलरी मिली हो और उसमें से पंद्रह हजार गरीबों में बाँट दे.. भारत में बहुत चमत्कार होते रहते हैं.. मेरे आस-पास के बच्चों की टोली खोज-खोज कर भूखों को खाना, दवा पानी देने के लिए मुस्तैद से तैनात हैं... जब भी सकारात्मकता फैलाने का मौका मिले.. बस प्रयास करते रहना है...

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अभिविन्यास

 "अद्धभुत, अप्रतिम रचना। नपे तुले शब्दों में सामयिक लाजवाब रचना। दशकों पहले लिखी यह आज भी प्रासंगिक है। परिस्थितियाँ आज भी ऐसी ही हैं। ...