वृद्ध दिवस–
कमरों में पसरा
मकड़जाल।
जीवंत वृद्ध से मिलना कोई नहीं चाहता,
पुण्यतिथि की बेसब्री से प्रतीक्षा होती..।
मैं रेत हूँ— हर बार आँखों में किरकिरी पैरों के नीचे ही क्यों आती हूँ? कभी किसी ने मेरे कणों में छिपी टूटी हुई सदियों को पढ़ा है? सबने मुझ पर...
और मकड़ियां मस्त। सच है।
ReplyDeleteबहुत खूब !!!
ReplyDeleteसही कहा आपने...।जीते जी सेवा करें वृद्धों की
ReplyDeleteपुण्यतिथि की क्या जरूरत।