Sunday, 6 September 2026

धर्म की सीमा

धर्म की सीमा : युवा प्रवर्तक ब्लॉग


धर्म की सीमा : ब्लॉग बोधायन पत्रिका


आरती की थाली मेज़ पर रखी थी। रोली की लालिमा अभी भाई के माथे पर ताज़ा थी। दीदी ने राखी की गाँठ कसते हुए उसकी कलाई को कुछ पल देखा और अनायास मुस्करा दी।

“दीदी! मैं प्रतीक्षा में रह गया, कल आप कार्यक्रम में क्यों नहीं आ सकीं?” भाई ने मिठाई का एक और टुकड़ा मुँह में रखते हुए पूछा।

“ऐसी भी क्या बात हो गई थी?” भाई का स्वर रंग बदल रहा था।

“कल का कार्यक्रम तीन बजे होना था। ढाई बजे तक पहुँच जाने की बात तय थी। अचानक समय बदलकर पाँच बजे कर दिया गया। संदेश सबको एक साथ भेजा गया था… लेकिन सबको एक साथ तो नहीं मिल पाया?” दीदी की मुस्कान थोड़ी गहरी हुई। वह कुछ क्षण चुप रहीं, फिर कहा।

“क्या मतलब? आपकी बातें हमेशा जलेबी क्यों होती है?” भाई ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“मतलब यह कि जो समय के पाबन्द थे, वे ढाई बजे पहुँचने के लिए ही अपना काम समेटकर निकल पड़े। फोन का स्वर तब बजा जब वे राह में थे, उन्हें देर से सूचना मिली।”

“और जो देर से पहुँचने वाले थे?” भाई हँस पड़ा।

“वे ढाई बजे भी आराम से मोबाइल देख रहे होंगे, उन्हें संदेश जल्दी मिल गया। आराम से विजेता की तरह पाँच बजे पहुँचे… और कार्यक्रम में समय के पाबंद दिखाई दिए।”

भाई की हँसी धीरे-धीरे थम गई।

दीदी ने उसकी कलाई पर बँधे धागे को सहलाया।

“बस, यही समझाना है तुझे। कभी-कभी समय की उलटी चाल में लापरवाही भी समझदारी दिखाई देती है और ईमानदार कोशिश बेवक्त असफल हो जाती है।”

भाई चुप रहा।

“लेकिन…” दीदी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “इससे अपने सही होने का रास्ता मत बदलना। समय की कद्र करना, जिम्मेदारी निभाना और अपने उसूलों पर टिके रहना। हर बार दुनिया तुझे सही साबित करे, यह जरूरी नहीं।”

दोनों ने एक साथ राखी की गाँठ पर उँगली रख दी-


Wednesday, 26 August 2026

२६ अगस्त २०२६

आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे मुद्दे फैले हुए हैं जिनपर दम्पति विमर्श होने बाक़ी हैं -आपकी लेखनी उड़ान भरे- २६ अगस्त २०२६ को यादगार बना लें

काल से दो-दो हाथ : २५ अगस्त २०२६

शाम की सुनहरी धूप आँगन से बिछुड़ रही थी। तुलसी के चबूतरे के पास दीनानाथ जी लड़खड़ाते कदमों को सम्भालने की कोशिश कर ही रहे थे कि मालती देवी चाय की प्यालियाँ समेटते हुए उनके पास आ गईं।

“आज आपके मित्र ने भी टोका न—छड़ी लेकर चला कीजिए। कई साल से बेटे और भाई की सलाह को नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं!” मालती ने कहा।

दीनानाथ जी हल्के से मुस्कुराए। काँपती उँगलियों से उन्होंने मालती की चूड़ियों भरी कलाई थाम ली।

“मुझे तुम्हारा हाथ पकड़कर चलना ज़्यादा सुरक्षित लगता है।”

मालती के चेहरे पर ठहरी शिकायत अचानक पिघल गई।

“छड़ी तो सिर्फ़ ज़मीन का सहारा देती है, मालती… तुम्हारा हाथ थामता हूँ तो मन को सहारा मिलता है।”दीनानाथ जी ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, वे कुछ पल रुके

“पचास साल पहले जब इस हाथ को थामा था न, तब से आज तक कभी लगा ही नहीं कि मैं अकेला चल रहा हूँ।” दीनानाथ जी ने कहा।

मालती ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी दूसरी हथेली भी उनके हाथ पर रख दी। शाम की ठंडी हवा में दोनों आँगन की पगडंडी पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। छड़ी तुलसी के चबूतरे से लगी रह गई।


क़लमी का आकाश : २६ अगस्त २०२६

“सुमन, अगर किसी देश के सर्वोच्च नेतृत्व का दावेदार किसी विदेशी मूल की महिला का बेटा हो, तो क्या उसकी निष्ठा पर सवाल उठना स्वाभाविक नहीं?” चाय के बीच सतीश ने अख़बार की सुर्खियाँ पढ़ते-पढ़ते अचानक पूछा।

“क्यों?” सुमन ने प्याली मेज़ पर रखते हुए पूछा।

“क्योंकि उसकी जड़ें कहीं और भी हैं। संकट की घड़ी में हितों का टकराव हो सकता है।”

सुमन कुछ क्षण उसे देखती रही।

“आलोक, निष्ठा को तुम खून और भूगोल से क्यों माप रहे हो? वैसे भी क्या दोचित्तेपन का नारा है, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’? इसी मिट्टी में जन्मा-पला व्यक्ति देशद्रोही हो सकता है नहीं तो देश ग़ुलाम नहीं हुआ होता और बाहर से आया कोई व्यक्ति इसी देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर सकता है।”

आलोक चुप रहा।

“देशभक्ति वंशावली में नहीं मिलती,” सुमन ने कहा, “वह कर्म से साबित होती है।”

“लेकिन जनता का संशय?”

“संशय का अधिकार जनता को है, पर फैसला पूर्वाग्रह नहीं, संविधान और जनादेश करें—यही लोकतंत्र है।”

आलोक ने अख़बार मोड़ दिया।

“तो तुम्हारे लिए जन्म से ज्यादा कर्म मायने रखते हैं?”

“जन्म तो संयोग है, आलोक। निष्ठा चुनाव है।”

कुछ देर दोनों चुप रहे।

आलोक ने अख़बार के सम्पादकीय पन्ने को फिर खोला। वहाँ देश का नक्शा छपा था।

“सही कहती हो… देश शायद जन्मस्थान नहीं, जिम्मेदारी और जवाबदेही का नाम है।” उसने नक्शे पर उँगली रखी और धीमे से कहा!



Wednesday, 19 August 2026

राग की थाती

 

धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपनी गुल्लक तोड़ी और थोड़ा-सा तेल लेकर लौटी। दीपक जल गया। हवा ने टूटे तारों को छू लिया- धुँध में चित्र उभरने लगे।
मीनाक्षी के सामने पड़ी वायलिन के तार टूटे थे। हवा उन्हें छूती तो एक करुण-सी ध्वनि उठती—उस धुन का टुकड़ा, जिसे उसका पति पूरा किए बिना चला गया था। वह वायलिन ठीक नहीं करवाती थी। हर शाम खिड़की पर दीपक जलाती और उसी अधूरे राग के साथ बैठी रहती।
“दादी! आप रोज़ क्यों खिड़की पर दीपक जलाती हैं?” एक दिन पड़ोस की बच्ची ने पूछा।
“कोई लौटे और उसे रास्ता याद नहीं रहे तो उसकी मदद हो!” मीनाक्षी ने धुँध में देखते हुए कहा था।
आज शाम अँधेरी खिड़की थी। मीनाक्षी जा चुकी थी। वही अधूरा राग उठने लगा। बच्ची ने सड़क की ओर देखा—


Sunday, 9 August 2026

सन्ध्या का आलोक

दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था।

पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उनका यह दर्द लौट आता था। तभी सामने वाली बेंच पर बैठने की कोशिश करती एक वृद्धा लड़खड़ा गईं। वृद्ध छड़ी के सहारे उठे। धीरे से उनके पास पहुँचे और पानी की बोतल बढ़ा दी।

“लीजिए… थोड़ा सुस्ता लीजिए।” वृद्ध ने कहा।

कुछ घूँट पानी पीकर वृद्धा ने म्लान मुस्कान ओढ़ ली।

“धन्यवाद…! अब तो लगता है, शरीर ही नहीं, मेरी ज़रूरत भी खत्म हो गई हैं।” वृद्धा ने कहा।

वृद्ध की नज़रें उनके पास रखे ऊन के उलझे लच्छों पर पड़ीं। उन्होंने उसे उठा लिया।

“ऐसा मत कहिए,” वे मुस्कराए, “उम्र काम नहीं छीनती, बस काम का ढँग बदल देती है। आप बुनिए…, उलझों को मैं सुलझा देता हूँ।”

वृद्धा की आँखों में हल्की-सी चमक उतर आई।

धागे सुलझते रहे और बातें भी। पता चला, उनका नाम सुमित्रा था। पास के वृद्धाश्रम में रहती थीं। वृद्ध का नाम रामनाथ था। उनकी पत्नी को गुज़रे कुछ वर्ष बीत चुके थे। उनकी सन्तान अपने कामों में इतना व्यस्त रहती थी कि उनका स्नेह-सम्मान भी अब मोबाइल की घंटियों में सिमट गया था। दोनों ने अपने-अपने दुःखों का ब्योरा नहीं दिया; शायद उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। क्यों कि वे भविष्य की योजना बना रहे थे। आगे रामनाथ ऊन लाएँगे। फ़ौजियों-अनाथों के लिए स्वेटर तैयार होंगे। कुछ पीड़ाएँ शब्दों से नहीं, केवल उपस्थिति से पढ़ी जाती हैं।

नीम की पत्तियों से छनती साँझ धीरे-धीरे गहराने लगी।

रामनाथ ने सुलझा हुआ ऊन सुमित्रा की हथेलियों पर रख दिया। सुमित्रा जी की सलाइयाँ फिर चल पड़ीं।

घर लौटते समय फाटक तक पहुँचकर रामनाथ ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

नीम की छाँव में सुमित्रा जी चुपचाप बुन रही थीं। रामनाथ ने मुस्करा दिए। उनके घुटनों का दर्द वैसा ही था, पर कदम पहले से हल्के लग रहे थे।

Sunday, 26 July 2026

बोझ/कल्पना/मृगतृष्णा?


26-07-2026
2+6+0+7+2+0+2+6=25
2+5=7

प्रदर्शनी का आख़िरी दिन, आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने जमा हो गई थी- कुछ लोग बाल सँवार रहे थे, कुछ अपने चेहरे पर मुस्कान चढ़ाने में लगे थे, कुछ अपने गर्दन का कोण बदलने में-

जबकि दीवारों पर सजे हर चित्र में चेहरा अलग था—किसी की आँखें बड़ी, किसी की नाक टेढ़ी, किसी की त्वचा साँवली, किसी के बाल बिखरे। 

लोग चित्रों के सामने कम, एक-दूसरे के सामने ज़्यादा ठहर रहे थे।

“यह नाक ठीक कर दी होती…”
“रंग थोड़ा और साफ़ होता तो अच्छा लगता…”
“चेहरा इतना अलग क्यों बना दिया?”
चित्रकार ने मुस्कुराते हुए चुपचाप अपने सारे चित्र उतार लिए।
“क्या प्रदर्शनी ख़त्म हो गई?” एक दर्शक ने पूछा,

“नहीं… अब सबसे बड़ा चित्र सामने है। जिसमें बरसों से हर कोई, किसी और जैसा बनाने में लगा है।“ चित्रकार ने कहा।

02.

पलटा दुश्मन (ज़हर का अमृत बनना /पुरानी कुल्हाड़ी गाड़ देना)

राष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता का फ़ाइनल था। ग्रैंडमास्टर रुद्रप्रताप की अगली चाल प्रतिद्वन्द्वी नीरव को ‘मात’ देने वाली थी। पूरा सभागार उसकी जीत की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी पीछे से किसी स्त्री के रुँधे स्वर ने सन्नाटा चीर दिया—

“डॉक्टर ने कहा है, ऑपरेशन अगले महीने तक नहीं हुआ तो मेरा बेटा…”

आयोजकों ने उन्हें बाहर ले जाना चाहा, परन्तु तबतक उनके शब्द रुद्रप्रताप तक पहुँच चुके थे। उसने पहली बार सामने बैठे नीरव को गौर से देखा। पीला चेहरा, काँपते हाथ और धँसी हुई आँखें… वह तो हार से नहीं, अपनी बीमारी से लड़ रहा था। टूर्नामेंट की इनामी राशि ही उसकी आख़िरी उम्मीद होगी। रुद्रप्रताप ने बिसात पर नज़र डाली। उसकी उँगलियाँ वज़ीर तक गईं… फिर लौट आईं। अगले ही क्षण उसने ऐसी चाल चली कि उसकी पूरी बाज़ी बिखर गई। कुछ ही मिनटों बाद उसने अपना राजा लिटा दिया।

“आई रिज़ाइन।”

पुरस्कार वितरण के बाद नीरव दौड़ता हुआ उसके पास पहुँचा।

“सर… आपने क्यों जानबूझकर हार मान ली ?”

“बेटा, शतरंज में राजा बचाना पड़ता है… आज पहली बार लगा, बिसात के बाहर एक ज़िन्दगी बचाना ज़्यादा ज़रूरी है।आज मैंने राजा को हरा कर मौत की एक चाल टाल दी।”रुद्रप्रताप ने मुस्कराते हुए कहा।

Wednesday, 22 July 2026

बदले ताले

“तुम्हें पता है, पिछले आपातकाल में सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवाज़ आती थी?” वाइन ग्लास बढ़ाते हुए प्रभाकर जी ने पूछा।

“मुझे ऐसी कोई भी चीज नापसन्द है जो मेरे दिमाग को भ्रमित करती है,” रोहन ने इंकार रूप में अपना हाथ और अनभिज्ञता स्वरूप सिर हिलाया।

“खामोशी की…। जब आधी रात को लोग उठाए जाते थे, तब पूरा मोहल्ला जागता था, मगर कोई खिड़की नहीं खुलती थी।” प्रभाकर जी ने कहा।

“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।

प्रभाकर जी ना तो मुस्कराए और ना कुछ कहा। धीरे से उठे, अलमारी खोली और वही पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी, जिसे वे बरसों पहले जेल से लौटते समय साथ लाए थे।

“जब सोशल मीडिया बोलना बन्द कर दें…” रोहन ने कहना चाहा।

“…तब इंसान एक-दूसरे को पढ़ना शुरू करते हैं।” प्रभाकर जी ने उसकी बात पूरी कर दी—

शाम ढल रही थी। चाय की दुकान पर लोग पहले की तरह बैठे थे। मौसम, महँगाई, क्रिकेट और राजनीति— इत्यादियों पर बातें हो रही थीं, लेकिन शिक्षा-चिकित्सा की बातें नहीं हो रही थी। रोहन ने डायरी खोली। पहला वाक्य “इतिहास दोहराया गया है” लिखने से पहले उसने एक बार चारों ओर देखा। शहर बिल्कुल सामान्य था।

Tuesday, 30 June 2026

आँखों की धुँध


सर्दियों की एक बेहद सर्द शाम थी। राघव एक आलीशान होटल में से अपनी कम्पनी की कामयाबी का जश्न मनाकर लौट रहा था। रास्ते में चौराहे पर बने भव्य मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के बाहर रोशनी जगमगा रही थी। राघव ने गाड़ी रोकी, श्रद्धा से सिर झुकाया और बाहर बैठे कुछ आदतन माँगने वालों को नोट बाँट दिए। तभी उसकी नजरें कुछ दूरी पर, एक दीवार के सहारे बैठी एक बूढ़ी महिला पर पड़ी। कम्पकम्पाती ठंड में उसके पास ढंग का कोई ऊनी कपड़ा नहीं था। उसके पास ही एक छोटी लड़की फटी हुई कॉपियों को समेटे रो रही थी। राघव कौतूहलवश उनके पास गया।

"क्या हुआ माताजी? आप वहाँ कतार में क्यों नहीं बैठीं? वहाँ पैसे बँट रहे हैं," राघव ने पूछा।

बूढ़ी महिला ने स्वाभिमान से सिर उठाया और कहा, "बेटा, हम भिखारी नहीं हैं। मेरे बेटे-बहू दुर्घटना में चल बसे। मैं लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करके इस बच्ची को पढ़ा रही हूँ। आज मकान मालिक ने किराया न देने पर रात को ही बाहर निकाल दिया और बच्ची की स्कूल की फीस न भरने के कारण उसकी किताबें भी फेंक दी गईं। मुझे भीख नहीं, बस सिर छुपाने की जगह और मेरी बच्ची के लिए मदद चाहिए।"

राघव के चेहरे का भूगोल बदल गया। तभी वहाँ से एक साधारण से कपड़ों में एक सज्जन गुजरे, उन्होंने उस बूढ़ी महिला की बात सुन ली थी। उन्होंने तुरन्त आगे बढ़कर अपनी गर्म शॉल उस बुजुर्ग महिला के कंधों पर डाल दी। फिर बच्ची की कॉपियाँ उठाईं और कहा, "माताजी, मेरे घर के पास एक छोटा सा कमरा खाली है। आप वहाँ रह सकती हैं और मेरी पत्नी को घर के कामों में मदद कर सकती हैं। और रही बात इस बच्ची की पढ़ाई की, तो इसका दाखिला मैं कल अपने स्कूल में मुफ्त करवा दूँगा। पास के ही सरकारी स्कूल में मैं शिक्षक हूँ।”

शिक्षक ने राघव की दुविधा को भाँप लिया और बेहद शान्त स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमन्दों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”

“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।

“अब आपने सही समझा। सच्ची श्रद्धा पत्थरों की दीवारों तक सीमित नहीं होती, वह इंसानियत के रूप में भी धड़कती है।” शिक्षक ने कहा।


ग़ज़ल

मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,

जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।

जो चल पड़े हैं तो मंज़िल को ढूँढ ही लेंगे,

मगर ये वक़्त की गर्दिश का रास्ता है बहुत।

उलझ गया है जो धागा उसे सुलगने दो,

कि अब ज़माने से अपना ही वास्ता है बहुत।

वो कायदे जो बनाए थे दिल की बस्ती ने,

उन्हीं उसूलों का दुनिया में वाब्ता  है बहुत।

मेरा फ़लक के सितारों से राब्ता है बहुत,

जो गिर गया वो नज़र से तो ख़ाब्ता है बहुत।


चमकना सीख लिया जिसने मुश्किलों में 'विभा',

उसी चिराग़ का तूफ़ाँ से जाब्ता है बहुत


Friday, 26 June 2026

२६-०६-२०२६ : शून्योपरान्त या लंतरानी?

छोड़ चुकी हूँ

समस्याओं पर विचार रखना।

हर गाँठ को खोलने की ज़िद में

उँगलियाँ ही लहूलुहान होती थीं।


अब जो नहीं बदल सकता,

उसे समय के हवाले कर देती हूँ।

जो बदल सकता है,

उसे अपने साहस के।


दर्द जब ज्वार से भी ऊँचा उठता है,

लहरें शोर करना छोड़ देती हैं।

समुद्र सिर्फ़ गहरा हो जाता है।

दुःख का बिम्ब भाटा में नीचा बैठता है


लकड़ी जब पूरी जल जाती है,

लपटें नहीं बचतीं—

बस एक मुट्ठी राख

हवा के साथ चल देती है।

राख के बिम्ब के लिए वैतरणी मचल जाती है


बादल जब जी भर बरस लेते हैं,

आकाश रोता नहीं,

बस धुला-धुला-सा

चुप पड़ा रहता है।

वर्षा का बिम्ब सरस लेते हैं-


पेड़ जब अन्तिम पत्ता भी खो देता है,

हवा से शिकायत नहीं करता।

वह अगली ऋतु की प्रतीक्षा में

स्थिर खड़ा रहता है।

वृक्ष का बिम्ब अक्खो-मक्खो करता है!


नदी जब चट्टानों से लड़ते-लड़ते थक जाती है,

उन्हें तोड़ने की नहीं,

उनके बीच से रास्ता बनाने की

कला सीख लेती है।

नदी अपने बिम्ब को ढूँढते-ढूँढते पक जाती है


तेल जब आख़िरी बूँद तक पहुँचता है,

लौ काँपती नहीं,

एकदम स्थिर हो जाती है

बुझने से ठीक पहले।

दीपक का बिम्ब कोई नहीं खोजता है!


रेत ने कब का छोड़ दिया है

बादलों का हिसाब रखना।

उसे मालूम है—

हर बरसात उसकी नहीं होती।

मरुस्थल का बिम्ब कोई मरोड़ दिया है!

Thursday, 25 June 2026

हाइकु और ग़ज़ल

 अमराई में

तोता का कलरव—

युद्ध विराम

ढोल का शोर

भगोड़ा का बजाया—

युद्ध विराम

युद्ध विराम—

भगौड़ा का उकेरा

इन्द्रधनुष


नभ में छाए

पतंग व पतंगी—

युद्ध विराम

ग़ज़ल

कुछ नहीं वक़्त का ही तकाज़ा तो है,

ग़म पुराना सही दर्द ताज़ा तो है।


टूटकर बिखरे रिश्ते कई बार पर,

दिल में जुड़ने का कोई इजाज़ा तो है।


रात भर अश्क आँखों से बरसे मगर,

दूर होकर भी मेरा वो ख़्वाजा तो है।


ख़्वाब सारे बिखर कर हुए धूल भी,

आँख पर एक सपने का क़ब्ज़ा तो है।


वो न आएँ कभी, कोई शिकवा नहीं,

दिल का बाक़ी अभी वे ही राजा तो है।


लोग पढ़ते नहीं दिल के मजमून को,

मीर के लेख का यह नतीजा तो है।


ये अंधेरा भी छँट जाएगा देखना,

आस के आसमाँ में वो इक जा तो है


आज हर ओर है बेयक़ीनी, विभा,

कल सँवरने का अंदाज़ दूजा तो है।

Monday, 22 June 2026

गुलदस्ते में वट

पिता ने दिया काया तो उस काया को निरोग रखना योग की माया

पिता का साया धूप में शीतल छाँव बन जाता है,

जीवन का हर कठिन रास्ता सहज बन जाता है।

सदा स्मरण करते पिता के मौन तपस्या को,

जिससे घर का हर कोना उजियारा पाता है।


तन को बल, मन को शांति, प्राणों को नव प्रकाश,

सदा योग देता है जीवन को सुन्दर विश्वास।

बाहर जितनी दौड़-धूप है, भीतर उतनी ही ख़ामोशी,

स्वयं को खोजो, मिल जाएगा अपना ही आकाश।

वही संस्कृति चाहिए वहीं के वहीं आँगन के कुशल टिकाई में

सुख, शांति और सफलता की खोज में निकले हम,

दुनिया भर में उत्तर ढूँढ़ते रहे हरदम।

योग ने सिखाया—अपने भीतर उतरना सीखो,

पिता ने कहा—सत्य और श्रम का पथ चुनो।

फिर समझ में आया जीवन का यह रहस्य,

जिसे खोजते रहे हम यहाँ-वहाँ,

वही-वहीं था—पिता की सीख और अपने ही योग के बीच।

संयम, साहस, श्रम और सच्चाई,

ये सब आसान नहीं थे,

पिता की रोज़मर्रा की साधना थी।


योग ने जब मन के भीतर दीप जलाया,

पिता का चेहरा उसी उजाले में नज़र आया।


पिता ने उँगली थामकर चलना सिखाया है,

योग ने गिरकर भी सम्भलना सिखाया है।


योग तन को साधता है, पिता मन को गढ़ते हैं,

वही दोनों मिलकर जीवन को वहीं ऊँचाई देते हैं।


पिता ने कहा था—

जीत से पहले स्वयं पर विजय पाना,

योग ने वही बात

श्वासों की भाषा में दोहराई है।


एक ने जीवन का अनुशासन दिया,

एक ने मन का सन्तुलन दिया


वहीं दोनों मिलकर संस्कार को वही गहराई देते हैं।

Wednesday, 17 June 2026

मूल्यों का क़द


June 20, 2026

१८ अगस्त २०२६ 

निखिल का पैतृक शहर विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गया। बस्तियाँ डूब गईं, हाहाकार मच गया। राहत कार्य में जुटे थके-हारे निखिल ने जब पुस्तकालय का दरवाज़ा खोला, तो वह दंग रह गया।

पुस्तकालय की मेज़ें हट चुकी थीं। अलमारियों में किताबों की ओट से दवाइयाँ झाँक रही थीं। हॉल में बेघर परिवार आश्रय लिए हुए थे और शहर के युवा वहाँ सहमे बच्चों को सँभाल रहे थे।

वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने आगे बढ़कर निखिल के कन्धे पर हाथ रखा और बोले, "बेटा! किताबें सिर्फ़ कागज़ का पुलिन्दा नहीं होतीं, वे समाज को संकट में एक-दूसरे के लिए खड़ा होना सिखलाती हैं।"

निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”


ग़ज़ल

हर घड़ी अक्स को चमकाने की चाहत ही नहीं,

खुरदरा रहने की छूटेगी ये आदत ही नहीं

दाग़ से ही तो है इस चाँद में ऐसी रौनक़,

इस जहाँ में कहीं बेदाग़ फ़ज़ीलत ही नहीं।

हद से ज़्यादा जो सफ़ाई में लगे रहते हैं,

उनके चेहरों पे कोई सच्ची सी रंगत ही नहीं

कुछ खुरदरे से भी कोने हों ज़रूरी घर में,

हर तरफ़ सिर्फ़ नफ़ासत की ज़रूरत ही नहीं।

ये जो ठोकर है संभलने का सलीक़ा देती,

चिकने रोड़ों की मुझे कोई इबादत ही नहीं।

रास्ते का मुड़ा ही मोड़ हो हारा तो नहीं 

इस सफ़र में मुझे राहों से शिकायत ही नहीं

अपनी अनगढ़ सी कला पर ही यक़ीं काफ़ी, 'विभा'

हर तरफ़ काँच के महलों की हिफ़ाज़त ही नहीं।

Sunday, 14 June 2026

ग़ज़ल

लफ़्ज़ वो अब तलक, तो बने ही नहीं

जो बयाँ कर सकें, हिय सुने ही नहीं।

रास्ते में जो थे, जाल नफ़रत के वो,

हम सफ़र में कभी, यूँ तने ही नहीं।

ग़म के जो ख़्वाब थे, वक़्त के रात-दिन,

जाने किस मोड़ पर, वो बुने ही नहीं।

ज़िन्दगी ने दिए, जितने ज़ख़्म-ओ-सितम,

दर्द वो हमने फिर, तो गिने ही नहीं!

लाख शिकवे रहे, इस ज़माने से पर,

दर्द के वो फ़साने, गुने ही नहीं।

दिल में ऐसा बसा, हिज्र का सिलसिला,

कोई मौसम खुशी का, मने ही नहीं।

राह-ए-उल्फ़त में जो, अश्क बिखरे 'विभा',

हम ने दामन में वो, फिर चुने ही नहीं।


ग़ज़ल 2

बात निकली तो कई राज़ भी फिर दिल से निकले,

दर्द के फूल भी कुछ अश्कों की महफ़िल से निकले।

जब अँधेरों ने कहा तो कई सीमा से निकले,

रास्ते तब ही नए एक नई मंज़िल से निकले।

हमने चाहा था कि ख़ामोश रहें जीवन भर यूँ

पर कई शब्द अचानक ही मेरे दिल से निकले।

वक़्त की धूप में रिश्तों की नमी जाती ही रही,

फिर भी कुछ ख़्वाब सलामत थे जो मुश्किल से निकले।

उसकी यादों का समंदर था बहुत ही गहरा मगर,

कुछ चमकते हुए मोती उसी साहिल से निकले

ज़िन्दगी भर जिसे थे अपना समझते रह गए हम,

वे भी इक रोज़ किसी और के आदिल से निकले।

घात निकली तो नज़र उनके कई रंग ही आए 

कुछ हँसी के थे,  'विभा' तो वे ही कुछ छल से निकले



Tuesday, 9 June 2026

ब्याज का टापू

दिन की चुभती हुई धूप की जगह अब एक ठंडी, मखमली हवा ने ले ली थी। पेड़ों पर चहचहाहट तेज हो गई थी। हरीश बाबू ने अपनी किराने की दुकान का शटर आधा गिराया और गल्ले (कैश बॉक्स) के पास बैठ गए। गल्ले से नोटों की गड्डी निकाली। कुल मिलाकर पन्द्रह हजार चार सौ रुपये। हरीश बाबू के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उनके लिए यही उनकी 'दिन की पूँजी' थी, जिससे उनका घर चलता था और बैंक बैलेंस बढ़ता था। वे दुकान पूरी तरह बंद करने ही वाले थे कि तभी एक कमजोर सी आवाज आई, "बाबूजी... कुछ खाने को दे दो। बड़ी भूख लगी है।"

हरीश बाबू ने पलटकर देखा। सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। फटे-पुराने कपड़े, चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में बेबसी। हरीश बाबू का हाथ अनजाने में ही जेब के नोटों की तरफ गया, लेकिन फिर कुछ सोचकर उन्होंने नोट हाथ में ही दबाए रखा।

उन्होंने दुकान के अन्दर देखा। एक शेल्फ पर ताजे ब्रेड का पैकेट, जैम की शीशी और दही की थैली रखी थी। हरीश बाबू ने शटर थोड़ा ऊपर उठाया, अन्दर गए और ब्रेड-जैम और दही ले आए। उस सामान को उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया।

बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से सामान थाम लिया। उसकी सूखी आँखों में अचानक चमक आ गई। "जुग-जुग जियो बाबू! भगवान तुम्हारी तिजोरी हमेशा भरी रखे।" उसने आसमान की तरफ हाथ उठाया और भरभराई आवाज में कहा।

उसकी आँखों से छलकते आँसू और चेहरे पर के उस सुकूँ को देखकर हरीश बाबू के चेहरे पर सन्तोष का गाढ़ापन छा गया। बूढ़ी औरत दुआएँ देती हुई आगे बढ़ गई।

हरीश बाबू ने दुकान का ताला लगाया और घर की तरफ चल दिए। रास्ते में उन्होंने जेब में हाथ डाला।

"आज समझ में आया... तिजोरी की पूँजी तो बस जेब का बोझ है, असली 'दिन की पूँजी' तो वे दुआएँ हैं जो आज कमा कर घर ले जा रहा हूँ।" मुस्कुराते हुए आसमान की तरफ देखा और बुदबुदाए।


अन्त की साँसें

बारूद के काले धुएं ने, वो नीला अम्बर निगल लिया,

इंसान के अंधी नफरत ने, हँसता हुआ चमन कुचल दिया।

जहाँ कभी थी नदियों की कल-कल, और पेड़ों की घनी छाँव,

वहाँ आज बस सन्नाटा है, मर गए शहर, उजड़ गए गाँव।

वो बम के गोले, वो मिसाइलें, वो बारूदी अन्धियारा,

जीत की खातिर इंसानों ने, अपनी ही साँसों को मारा।

जहरीली गैसों के तांडव ने, पत्तों का यौवन छिन लिया,

सूख गए सब बाग-बगीचे, पंछियों का जीवन छिन लिया।

जो शहर कभी था धड़कन जैसा, कंक्रीट का कंकाल हुआ,

नदियों का पानी तेजाब बना, हर कोना-कोना निवाला काल हुआ।

हवा हो गई इतनी कड़वी, फेफड़ों में अब अंगारे हैं,

हम जीत गए जो जंग मगर, खुद अपनी ही किस्मत हारे हैं।

पर देखो! उस मलबे के नीचे, काली राख को चीरकर,

एक नन्हा अंकुर उग आया, विपदा का सीना बींधकर।

वो चीख-चीख कर कह रहा, इंसानी इस नादानी से—

"ये धरती फिर सज सकती है, प्यार और बस पानी से।"

ग़ज़ल

नदी में जो दिखे वो चाँद बेकल है 

मगर क्यों काँच के परदे में धूधल है।


धरा और चाँद की दूरी नहीं घटती,

उदासी में कटा जो वो ही इक पल है।


भटकता फिर रहा जो दिल वो है अक्खड़

मोहब्बत का कोई भी अब नहीं हल है।


दुआओं से बदल जाती है ये दुनिया

मुक़द्दर की लकीरें भी मुसज्जल है


हक़ीक़त की ज़मीं पर पैर हैं जलते

विभा ख़्वाबों का रिश्ता सिल्क मख़मल है।

Friday, 5 June 2026

अन्त की साँसें

कमलजीत ने अपने बख्तरबन्द सूट का हेलमेट उतारकर जहरीली हवा का सूचकांक देखा। रीडिंग लाल निशान से भी ऊपर थी। लगभग अट्ठाइस-तीस वर्ष पहले यह जगह ‘सपनों का शहर’ कहलाती थी—चौड़ी सड़कें, दोनों ओर अमलतास -गुलमोहर के वृक्ष और बीच से बहती एक शान्त नदी। वहीं आज यहाँ केवल कंक्रीट के काले कंकाल खड़े थे। नदी एसिड से भरे नाले में बदल चुकी थी और हवा में बारूद की गन्ध स्थायी रूप से घुल गई थी।

“सर, यहाँ हमें कुछ नहीं मिलेगा। यह पूरा इलाका ‘डेड ज़ोन’ घोषित हो चुका है,” युवा सैनिक कबीर ने सूखी धरती पर कदम रखते हुए कहा। उसके पैरों के नीचे मिट्टी राख बनकर उड़ने लगी। कमलजीत एक टूटे हुए फ्लाईओवर के नीचे बैठ गया। उसकी आँखों के सामने अतीत का वह भयावह दृश्य तैर उठा। दो महाशक्तियों के अहंकार ने जब युद्ध का रूप लिया, तब केवल इंसान ही नहीं मरे थे, प्रकृति भी लहूलुहान हो गई।रासायनिक हमलों और परमाणु विस्फोटों ने महीनों तक आसमान को काले धुएँ से ढके रखा। सूरज की रोशनी धरती तक न पहुँच सकी। जंगल, बाग-बगीचे और खेत कुछ ही दिनों में राख हो गए। पेड़ समाप्त हुए तो वर्षा रूठ गई, जलस्रोत सूख गए और जीवन का चक्र टूट गया। युद्ध ने कुछ महीनों में वह सब नष्ट कर दिया, जिसे प्रकृति ने करोड़ों वर्षों में सँवारा था।

“हम समझते रहे कि हम शहर क्या देश बचाने के लिए लड़ रहे हैं,” कमलजीत की आवाज़ भर्रा गई, “लेकिन हम यह भूल गए कि शहर इमारतों से नहीं, उसकी साँसों से बनता है। जब पर्यावरण ही नहीं बचा, तो शहर भी मर गया।”

कबीर की नज़र अचानक फ्लाईओवर की एक दरार पर पड़ी। मलबे और जहरीली मिट्टी के बीच एक नन्हा-सा हरा अंकुर सिर उठाए खड़ा था। कंक्रीट के उस मरुस्थल में वह जीवन की पहली दस्तक था।

“सर! देखिए!” कबीर उत्साह से चिल्लाया।

कमलजीत झुककर उस अंकुर को देखने लगे। उनकी आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। उन्होंने अपने वॉटर-पैक से कुछ बूँदें उसकी जड़ों में टपका दीं।

“इंसान के युद्ध ने शहर मिटा दिया, कबीर,” वे धीमे से बोले, “लेकिन प्रकृति हार मानना नहीं जानती। यदि हम अपनी बंदूकें हमेशा के लिए रख दें, तो यह खोया हुआ शहर फिर साँस लेना सीख सकता है।”

"हाँ! हाँ इस उजड़े हुए शहर में यही एक अकेला अंकुर है, पर इसके भीतर एक पूरे भविष्य का जंगल हरा हो रहा हैं।" अति उत्साहित कबीर सर ऊँचा कर हथेली जोड़े आकाश को आह्वान कर रहा था।

दोनों सैनिकों ने उस नन्हे पौधे को सलाम किया। 

Thursday, 28 May 2026

सूत और साँसें

जेठ की दुपहरी उतरान पर थी। गाँव के पुराने बरगद के नीचे बिछा वट-सावित्री का उत्सव अभी-अभी समाप्त हुआ था। सुहागिनें अपने-अपने पतियों की दीर्घायु का वर माँगकर लौट चुकी थीं। पंडित जी दक्षिणा की भारी गठरी सँभाले जा चुके थे। चबूतरे पर अब केवल बिखरा सिंदूर, उलझे कच्चे धागे, भीगे चने और धूल में लिथड़े फल-पकवान बचे थे। बरगद के तना के पीछे से दो जोड़ी आँखें धीरे-धीरे उभरीं।बालक मंगरू और उसकी छोटी बहन बुचिया दबे पाँव चबूतरे की ओर बढ़े। दोनों की निगाहें जमीन पर ऐसे दौड़ रही थीं, जैसे भूख भी तलाशना सीख जाती है।

“देख भैया! कितना बड़ा केला!” बुचिया ने आधा साफ़ केला उठाकर अपनी फटी फ्रॉक में छुपा लिया। उसके चेहरे पर वही चमक थी, जो किसी अमीर बच्चे के हाथ नया खिलौना आने पर होती है।

मंगरू मिट्टी में पड़े बताशे और भीगे चने बीन रहा था। दूसरों की पूजा का बचा हुआ प्रसाद, उनके कुछ अंश का भोजन था।

“अरे! हटो वहाँ से…! पूजा की जगह अपवित्र कर दी तुम लोगों ने!” उनके पीछे से तभी तेज आवाज गूँजी—

गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।

बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।

“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।

“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।

“आज मैंने अपने पति की लम्बी उम्र के लिए सोने का धागा चढ़ाया था, और इस बच्चे ने टूटी मिट्टी के दीये में अपने पिता की पूरी जिन्दगी समेट ली।” बुदबुदाती चाची के हाथ काँपने लगे और चाँदी की थाली अचानक बहुत डगमगाने लगी। कुछ क्षण तक वे निश्चल खड़ी रहीं। फिर चुपचाप थाली में बचे फल और लड्डू बुचिया के फ्रॉक में डाल दिए। बच्चे खिल उठे। वे दौड़ते हुए मुसहरी की ओर भाग गए। बरगद की छाँव अब भी वैसी ही थी-

Monday, 25 May 2026

दीये में बची लौ

शहर के एक प्रसिद्ध महाविद्यालय में वार्षिक विज्ञान प्रदर्शनी चल रही थी। समर और उसके दोस्तों ने महीनों रात-दिन एक करके 'स्मार्ट विलेज' का एक बेहतरीन वर्किंग मॉडल तैयार किया था। पूरा महाविद्यालय उनकी तारीफ कर रहा था। शाम को जब नतीजों की घोषणा होने वाली थी, तब महाविद्यालय के ट्रस्टी के बेटे, रोहन, ने समर को अकेले में बुलाया। रोहन ने टेबल पर पैसों से भरा एक लिफाफा रखा और कहा, "समर, इस प्रोजेक्ट पर मुख्य नाम मेरा और मेरे दोस्तों का रहेगा। तुम बस बैकस्टेज रहना। इस पैसे से तुम अपनी पूरे साल की फीस भर सकते हो और वैसे भी, तुम्हें आगे इंटर्नशिप के लिए मेरी सिफारिश की ज़रूरत पड़ेगी ही।"

समर एक बेहद साधारण परिवार से था। उसके पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन का एक हिस्सा बेच दिया था। रोहन की बात सुनकर समर के भीतर एक गहरा द्वंद्व छिड़ जाना स्वाभाविक हो गया! एक तरफ आर्थिक सुरक्षा और भविष्य का रास्ता था, तो दूसरी तरफ उसकी महीनों की मेहनत और उसका स्वाभिमान।

वह भारी कदमों से पुस्तकालय की तरफ चला गया। वहाँ दीवार पर महापुरुषों के सुविचार लिखे थे। अचानक उसकी नज़र एक पुरानी डायरी के पन्ने पर पड़ी, जिस पर किसी ने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था :-

“आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं करते हैं तो मर जाते हैं और मरी आत्मा से आप शव होते हैं-”

इन शब्दों ने समर के भीतर जैसे एक बिजली का करंट दौड़ा दिया। उसे अपने पिता का वह चेहरा याद आया, जिन्होंने तंगी में भी कभी किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाया था। “अगर आज मैंने अपने स्वाभिमान का सौदा कर लिया, तो मैं खुद की ही नज़रों में हमेशा के लिए गिर जाऊँगा! तब तो मैं केवल एक ज़िन्दा लाश बनकर रह जाऊँगा!” समर लगातार बुदबुदाने लगा।

नतीजों की घोषणा का समय हो गया था, मुख्य अतिथि माइक पर आए और बोले, "इस साल का बेस्ट प्रोजेक्ट अवॉर्ड जाता है—रोहन और उनकी टीम को!"

पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। रोहन स्टेज की तरफ बढ़ने लगा। तभी समर अपनी सीट से खड़ा हुआ और उसने ज़ोर से कहा, "रुकिए!"

हॉल में सन्नाटा छा गया। 

"सर, यह प्रोजेक्ट रोहन का नहीं, मेरा और मेरी टीम का है। रोहन ने इसे पैसों के दम पर खरीदने की कोशिश की है। मेरे पास इस प्रोजेक्ट के कोडिंग लॉग्स, शुरुआती डिज़ाइन्स और हर एक स्टेज के वीडियो प्रूफ हैं, जो साबित कर देंगे कि इसे किसने बनाया है।" समर मंच पर गया और मुख्य अतिथि से सीधे मुखातिब होकर कहा।

"तुम जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो? तुम्हारा करियर बर्बाद हो सकता है।" ट्रस्टी ने समर को डराने की कोशिश की।

"सर, करियर फिर बन सकता है, लेकिन बिका हुआ आत्मसम्मान कभी वापस नहीं आता।" समर ने मुस्कुराकर कहा, 

समर के हौसले और पुख्ता सबूतों के आगे कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा। जाँच हुई और अवॉर्ड समर की टीम को मिला।

रात को जब समर अपने हॉस्टल के कमरे में लौटा, तो बिजली कटी हुई थी। उसने मेज़ पर एक छोटा सा मोम का दीया जलाया। हवा के झोंकों के बीच भी वह दीया पूरी ताकत से जल रहा था। समर ने उस दीये की लौ को देखा और मुस्कुरा दिया— “आज मैंने अपने भविष्य की ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की भी रक्षा की है।” समर बुदबुदाते हुए कहा। वह भी दीये में बची लौ की तरह, विपरीत परिस्थितियों में भी शान से प्रज्वलित हो रहा था।

Thursday, 21 May 2026

२१ मई -चाय दिवस

 सन्धान

उधड़ रहे थे रिश्ते धीरे-धीरे,

जैसे पुरानी रज़ाई का कोना,

बातों के धागे टूट चुके थे,

और मौन ने घर भर में

शुरू कर दिया अँधेरा बोना!

तभी रसोई में

चाय ने धीमे से उबाल लिया।

केतली की भाप में

कुछ अनकहे दुख पिघले,

अदरक की खुशबू ने

थके हुए मन पर

माँ के हाथ-सा स्पर्श कमाल किया!

इस तेज़ भागती दुनिया में

जहाँ लोग

मोबाइल की स्क्रीन पर

अपनापन खोज रहे हैं,

वहाँ चाय आज भी

पुरानी सिलाई मशीन की तरह

घर-घर रिश्तों की

तुरपाई कर रही है।

कभी पिता की थकान में

चीनी बन घुल रही है,

कभी माँ की चिन्ता में

इलायची-सी महक रही है,

कभी दोस्तों के बीच

ठहाकों की भाप बन उड़ रही है,

तो कभी प्रेमियों के मौन में

एक कप की गरमी बन टिक रही है।


पद्य प्रबन्ध—

धूल की परतें

केतली पर

तप की लौ

लाल मखमली कुर्सियों पर,

सजी साड़ियों का एक समन्दर है,

पर कौन जानता है कि किस चेहरे के,

कितना गहरा द्वंद्व अन्दर है!


एक हाथ में बनारसी का आँचल है,

दूजे में मिट्टी का वो कुल्हड़ गर्म,

एक कलाई पर बँधी है आधुनिक घड़ी,

जो याद दिलाती है घर के नियम और धर्म।


मंच पर चल रहा है विमर्श बड़ा,

'सशक्तीकरण' के ऊँचे-ऊँचे नारों का,

पर यहाँ फुसफुसाहट में दर्ज है दर्द,

ज़िम्मेदारियों के अन्तहीन किनारों का।


ये सजना-धजना कोई शौक नहीं,

ये तो दुनिया के लिए एक ओट है,

मुस्कुराहटों के इस सघन वीराने में,

छिपी हर दिल पर कोई न कोई चोट है।


चाय की हर चुस्की के साथ यहाँ,

कोई अपनी थकान बिसरा रही है,

तो कोई अपनों की बंदिशों से सुस्ता

बस! चुपचाप तनिक पल चुरा रही है।


ये मिट्टी के कुल्हड़ गवाह हैं इस बात के,

कि हर औरत भीतर से कितना तपती है,

औरों की ज़िंदगी में ज़ायका भरने को,

वो ख़ुद को साँचों में कितना खपाती है।


Wednesday, 20 May 2026

शिकायतें और ग़ज़ल

मैं रेत हूँ—

हर बार

आँखों में किरकिरी

पैरों के नीचे ही क्यों आती हूँ?

कभी किसी ने

मेरे कणों में छिपी

टूटी हुई सदियों को पढ़ा है?

सबने मुझ पर

अपने-अपने महल बनाए,

फिर एक दिन

मुझे ही बिखरा हुआ

कहकर चले गए।

समन्दर रोज़

मुझसे मिलने आता है,

पर मेरी प्यास

कभी क्यों नहीं पूछता!

हवाएँ

अपनी मनमानी से

मुझे उड़ाती रहती हैं,

और लोग कहते हैं—

“रेत का कोई घर नहीं होता!”

मैंने तो

हर कदम के निशान सँभाले,

पर किसी ने

मेरी हथेली पर

अपना नाम स्थायी नहीं लिखा।

तपती धूप में

मैं जलती रही चुपचाप,

फिर भी

मरुभूमि का दोष

मेरे हिस्से ही आया।

मुट्ठी से फिसलती रेत की अजब कहानी

मुट्ठियों में कैद हुई,

तो फिसल जाने का इल्ज़ाम मिला,

बिखरी रही धरती पर,

तो बेवफ़ा कहलायी।

मैं रेत हूँ—

समय की सबसे पुरानी गवाह,

फिर भी

हर लहर

मुझे मिटा देने का दावा करती है।

मुझसे ही

(Hourglass) रेत घड़ी का आविष्कार हुआ था, जो सीधे तौर पर समय के बीतने को दर्शाती है।

रेत का गिला/रेत की शिकायतें क्या-क्या नहीं हो सकती हैं?

    मैं मरुभूमि बनूँ तो अभिशाप, और तट बनूँ तो सौंदर्य— यह भेदभाव क्यों है?

कविताओं और शेरो-शायरी में मेरा उपयोग अक्सर 'बेबसी' और 'उदासी' को दर्शाने के लिए ही क्यों किया जाता है-


ग़ज़ल

हौसलों का नया एक थल देखिए,

मुश्किलें हो रहीं कैसे हल देखिए।

ठोकरों ने तराशा है इंसाँ को यूँ,

पत्थरों से निकलता महल देखिए।

वक्त चुपचाप चेहरों को पढ़ता रहा,

कौन अपना रहा, कौन छल देखिए।

आँखों में ख़्वाब कितने सजाए मगर,

जो हक़ीक़त में बदला वो पल देखिए।

आँधियों ने उड़ाने की कोशिश तो की,

है चमन का मगर आत्मबल देखिए।

रास्ते ही सिखाते हैं चलना यहाँ,

हमसफ़र बन के ही साथ चल देखिए।

अब 'विभा' को दिखाते हैं तारा यहाँ,

आसमानों में कोई भी दल देखिए।


Saturday, 16 May 2026

छाँव का स्थायित्व और अवहित्था

https://www.facebook.com/share/r/18WzEZJakd/?mibextid=wwXIfr

बरगद के विशाल वृक्ष का तना लाल-सुनहरे धागों से भरता जा रहा था। पूजा की थालियों में दीपक टिमटिमा रहे थे और मंत्रों की धीमी ध्वनि हवा में घुल रही थी। नंदिनी भी महिलाओं की भीड़ में थी। उसके हाथ में पाँच रंगों वाला मौली था, परन्तु वह कभी बरगद को देखती कभी अपने हाथों में पकड़े मौली को निहारती। तीन महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी। 

“वट-सावित्री का व्रत पति की लम्बी उम्र और अटूट दाम्पत्य के लिए होता है।” दादी-नानी, मामी-मौसी, बुआ-चाची, माँ को कहते सुना था। सासू माँ ने भी तो वही दोहराया था।

“क्या सिर्फ पति की उम्र लम्बी होना ही शादी का रिश्ता बचा लेता है? फिर मेरे दादा और दादा ससुर जी ने दूसरी शादी कर परदेश-विदेश क्यों जाकर बस गए! दादी और दादी सासू माँ के किए व्रत से ससुर जी की लम्बी आयु है या उनकी दूसरी पत्नी के किए व्रत से?” नन्दनी बुदबुदाते हुए, चुपके से सामने बैठे आरव को देखा। वह मुस्कुरा रहा था, उसकी पूजा की टोकरी सम्भाल रहा था ताकि धागा उलझे नहीं।

“इतनी कसकर क्यों बाँध रही हो?” आरव ने हल्के से पूछा।

“ताकि रिश्ता कभी ढीला न पड़े।” नन्दनी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“धागे से नहीं, साथ निभाने से रिश्ते बन्धे रहते हैं।” आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया!

“यह धागा सिर्फ पति की लम्बी उम्र का नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, हमारा सम्मान और हमारे साथ के उस वचन का प्रतीक है, जिसे हर दिन निभाने का प्रयास हमें करना होगा।” बरगद के चारों ओर घूमते हुए नन्दनी बुदबुदा रही थी। 

“हे वटवृक्ष, हमारे रिश्ते की जड़ें भी इतनी ही गहरी होने में साक्षी रहना कि समय की आँधियाँ भी इन्हें हिला न सकें।” आरव ने पेड़ को प्रणाम करते हुए कहा।

अवहित्था

सम्मान समारोह के लिए मंच सज चुका था। मंच पर पुरस्कार की घोषणा होने ही वाली थी। इस साल के 'सर्वश्रेष्ठ लेखक' के रूप में मीरा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। मंच से लेकर सभागार में बैठे सभी लोग मीरा की तरफ देख रहे थे, और राघव की नजरें भी लगातार सामने की पंक्ति में बैठी अपनी पूर्व मित्र और सह-लेखिका मीरा पर टिकी थीं। कुछ साल पहले दोनों के रास्ते एक कड़वाहट के साथ अलग हो गए थे।

अचानक उद्घोषक ने माइक संभाला, "और इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ लेखक हैं... राघव!"

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। राघव मंच की ओर बढ़ने लगा। उसने अनजाने में ही मीरा की तरफ देख लिया, मीरा के चेहरे पर एक पल के लिए घोर निराशा और दुःख का भाव आया, उसकी आँखें नम हुईं—शायद वह अपनी हार या पुराने दिनों को याद कर बैठी थी।

लेकिन अगले ही पल, जैसे ही बगल में बैठी सहेली ने मीरा की तरफ देखा, मीरा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसने एक गहरी साँस ली, चेहरे पर दुनिया भर की कृत्रिम सहजता और एक बड़ी सी मुस्कान ओढ़ ली। वह खड़े होकर सबसे ज्यादा उत्साह से तालियाँ बजाने लगी, जैसे राघव की इस जीत से ज्यादा खुशी उसे जीवन में कभी मिली ही न हो।

राघव मंच पर था, पर उसकी नजरें मीरा के उन हाथों पर थीं जो ताली बजा रहे थे,। थोड़ी देर के बाद वह मंच से उतर गया और “मैं समझ रहा हूँ कि इन कंगन की खनक के पीछे तुमने अपने भीतर कितने बड़े तूफ़ान को दबाए बैठी हो! लेखन में तो अव्वल थी ही, अभिनय भी बाकमाल कर लेती हो!” मीरा के पास से गुजरते हुए राघव ने कहा।


Monday, 11 May 2026

माँ की प्रतिक्षाएँ

 


ना कोई गिला

दंश सहे की कला

प्रश्न माँ जबाब माँ

स्व सोती गीला

स्वेच्छा से स्वत्व त्याग

थाती धैर्य का मिला

माँ प्रतीक्षा करती है

द्वार पर टँगी घड़ी की तरह

हर लौटते क़दम की।

सिर्फ़ सन्तान के लौट आने की नहीं,

कभी अपने नाम से पुकारे जाने की भी।

सुबह की पहली रोटी के साथ

वह रख देती है

दिनभर की छोटी-छोटी आशाएँ—

बिना झुँझलाए कोई बात कर ले,

कोई उसके सिरदर्द को भी

समाचार समझे।

कोई पूछे—

“आज तुमने क्या खाया?”

जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।

वह प्रतीक्षा करती है

कि बच्चे जब सफल हों

तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,

उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।

रसोई से बाहर की एक सुबह का,

जहाँ चाय की भाप में

उसके अपने सपने भी उबलें थे!

बरसों पुराने सन्दूक में

उसने कुछ इच्छाएँ छिपा रखी हैं—

एक अधूरी यात्रा,

एक बिना टोके हुई नींद,

एक शाम

जब वह सिर्फ़ अपने लिए सज सके।

पुरानी अलमारी में तह किए

अपने अधूरे शौकों की—

कभी फिर से रंग उठाने की,

कभी किताबों में लौट जाने की।


माँ को प्रतीक्षा रहता है

उस फ़ोन का

जो केवल काम से न आया हो,

जिसमें कोई कहे—

“बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”


वह प्रतीक्षा करती है

कि घर के निर्णयों में

उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए।

कभी-कभी माँ को

अपने ही जन्मदिन की तारीख़

याद रखे जाने की प्रतीक्षा भी होती है।

वह चाहती है कि बुढ़ापे में

उसे बोझ नहीं, घर का इतिहास समझा जाए।

उसे प्रतीक्षा रहती है

कि घर में उसकी उपस्थिति

सिर्फ़ सुविधा की तरह नहीं,

एक सिद्धान्त की तरह महसूस की जाए।

माँ प्रतीक्षा करती है—

त्योहारों पर

सिर्फ़ पकवानों की तारीफ़ न हो,

उसकी थकान भी पढ़ी जाए

बच्चे सिर्फ कमाने वाले हाथ न बनें,

उसके काँपते हाथ भी थामने वाले बनें।

बिना किसी अपराधबोध के

उसे भी आराम मिल सके।

और इन सब के सबसे भीतर—

एक बहुत धीमी, बहुत निजी प्रतीक्षा—

कि जिस तरह उसने

सबको बिना शर्त अपनाया,

कभी कोई उसे भी उसी तरह थाम ले।

माँ की प्रतिक्षाएँ

बहुत ऊँची-ऊँची मीनारें नहीं होतीं—

होती हैं बस इतना कि

जिस घर को उसने जीवन दिया,

उस घर में उसका अपना एक कमरा,

अपना एक समय, और एक सम्मान

सभी की आँखों में बचा रहे। 


धर्म की सीमा

धर्म की सीमा : युवा प्रवर्तक ब्लॉग धर्म की सीमा : ब्लॉग बोधायन पत्रिका आरती की थाली मेज़ पर रखी थी। रोली की लालिमा अभी भाई के माथे पर ताज़ा ...