Thursday, 28 March 2013

सारा खेल किस्मत-लकीरों का है !!





* 51वीं पोस्ट * कोशिश कुछ शब्दों का खेल !
आपसे नहीं बराबरी , नहीं आपसे कोई मेल !!

किसी की दिल से दिल्लगी !
किसी के दिल को लग गई !!

तुझे हक़ मिला नहीं दिल्लगी का
किसी के दिल से ना खेल
खुद का दिल बहलाने के लिए
की किसी दिन ख़ुदा ने दिल्लगी
तेरी दिल्लगी बन जायेगी दिल की लगी
ना सुखेगे अश्क ,तरसेगा दिल के लगी के लिए

सच का गाँस
गले में डाले फाँस
क्लेश जनक !!

थी वो पत्थर
रूबी-पन्ना सरीखी
मान ना दिया !!

थी ही पत्थर
गढ़ते मन-मूर्ति
ज़ज्बात लगा !!

उदास जिया
भाये न ऋतुराज
लागे वो बैरी !!

रास्ता नहीं आसां
पथरीले डगर
पाने में लक्ष्य !!

ना तेरी  हथेली अलग है
ना उसकी हथेली अलग है
ना प्यार का अंदाज़ अलग है
ना प्यार का ज़ज्बात अलग है

सारा खेल किस्मत-लकीरों का है ?
कोई किसी को क्यूँ कमतर आंकते ?

                                                 
                                    कमतर = निकृष्ट



Wednesday, 20 March 2013

होली की उमंग




ठंडाई संग भंग 
मस्त चढ़े रंग 
फाग तरंग 
मिष्ट स्वाद के संग
सब बुढवा 
करे तंग 
समझे 
अपने को 
देवरवा मलंग
होली की उमंग .....।


1)
आ होलाष्टक 
हरकारा लगता 
लाता है ख़ुशी 

(2)
रंग होली का 
भीगा धरा ,बनाया 
इन्द्रधनुष 

(3)
भंग औ रंग 
नाचे धरा -गगन 
गोरी को लागे 

(4)
कामदेव ने 
मधुमास ले आये 
तीर चलाये 

(5)
श्री रूपा राधा 
शरारत कान्हा का 
रंग दे चुन्नी 

(6)
देवर-भाभी 
मिलकर रंगों की 
होड़ लगाईं 

(7)
बैर ना पालो 
रंग में क्लेश घोलो 
तनाव टालो !!



Friday, 8 March 2013

नारी नापे त्रिभुवन




किस्सा सुना सबनें 
विष्णु बने बामन
नापे तीन डग में त्रिलोक 
नारी ने की अनुसरण 
स्नेह बेटी रूप में 
साहस पत्नी रूप में 
संवेदना बहू रूप में 
स्नेह ,साहस और संवेदना
पा माँ रूप में ,
नारी नापे त्रिभुवन 

बनना नहीं किसी की देवी 
बनना नहीं किसी की दासी 
भुलाना नहीं तुम हो जननी जगतजननी रूपा 
भुलाना नहीं अपने जज्बातों को 
निभाना अपने चुने रिश्तों को 
निभाना अपने मिले दायित्वों को 
डरना नहीं दहलीज़ पार की तो 
डरना नहीं मंजिल नहीं दिख रही तो 
थामना अपने हौसले के पंख को 
थामना मदद मांगने वाले हांथो को
दहाड़ना दिखे कामुक आँख तो 
दहाड़ना रोके कोई राह तो 
पकड़ना अपने ऊपर उठे हाँथ को 
पकड़ना कलम बेलन तलवार को 
जूझना जो झंझावत आये तो 
जूझना दक्षता का अवसर आये तो 
सीखना नए युग के चलन को 
सीखना पुराने युग के अनुभव को 
गुर्राना हक़ है तुम्हारा तो 
गुर्राना सही अवसर हो तो ....... 






Monday, 4 March 2013

प्यार का एक रंग ....


वैलेन्टाइन डे बीत गया .... वसन्त आ गया ..... 
प्यार का मौसम .....
देशी हो या विदेशी ..... प्यार सब करते हैं .....
प्यार पहचान लेना ....
प्यार समझ लेना ....
प्यार पा लेना ....
 क्या सच में सहज होता है .... ??

 नौवें-दसवें कक्षा में रही होगी वो पुष्पा .... !! एक दिन किताब-कौपी ,बक्सा-पेटी ,पलंग-विस्तर सब को उलट-पलट कर युद्ध-स्तर पर खोज़-अभियान चला तब उसे पता चला कि कोई उसे चाहता था ....
 जिस घर में वो रहती थी उस घर के सामने और दाहिने तरफ पक्की सड़क थी .... दोनों तरफ के सड़क जहाँ कॉर्नर बनाते थे वहीं पर एक तरफ के घर में वो रहती थी दूसरी तरफ एक डॉ.दंपति रहते थे .... उन के साथ डॉ.साहब का छोटा भाई रहने आया था .... पुष्पा सुबह से रात तक जब भी घर से बाहर होती ,उसे सामने पाती .... सुबह ब्रश करते करते बाहर आती तो भी सामने वो बारामदे में खड़ा होता .... स्कूल जाने के लिए घर से निकलती तो भी वो उसके पीछे-पीछे स्कूल तक जाता .... दोपहर में लंच के लिए स्कूल से निकलती ,तो वो स्कूल के गेट पर खड़ा मिलता .... घर आती खाना खाती .... स्कूल के लिए जाती , स्कूल में शाम में छुट्टी होती तो गेट पर होता ,घर तक पीछे-पीछे आता .... शाम में घर से बाहर निकलती तो वो अपने घर के गेट पर या बारामदे में होता .... किसी के साथ भी होता तो उसका चेहरा पुष्पा की तरफ ही होता .... रात में खाना खाने बाद भी पुष्पा अपने परिवार वालों के साथ बाहर निकलती तो वो बाहर ही होता .... बाज़ार जाती किसी काम से तो वो भी एक दूरी पर उसे जरूर देखती .... कभी परिवार वालों के साथ सिनेमा देखने सिनेमा हॉल जाती तो इंटरवल में देखती कि वो भी हॉल में कहीं न कहीं वो है .....
एक बार पुष्पा को बुखार लग गया कुछ दिन तक वो बाहर नहीं निकल सकी .... तो उसकी सखियाँ उससे मिलने ,उसके घर आईं .... वे बताई कि पुष्पा के स्कूल नहीं जाने की वजह से कुछ लड़के उन्हें छेड़ते हैं .... पुष्पा को कोई लड़का छेड़ने का हिम्मत नहीं कर पाते थे क्यूँ कि उसके बड़े भाइयों का दबदबा था .... जब पुष्पा की तबीयत ठीक हो गई और वो स्कूल अपनी सहेलियों के साथ जाने लगी तो फिर पहले की तरह कुछ लड़के ,लड़कियों को छेड़ने के नियत से सामने से आते नज़र आए लेकिन चुकि पुष्पा सब लड़कियों के पीछे चल रही थी इसलिए उन लड़कों को दूर से वो दिखाई नहीं दी .... सब लड़के साईकिल पर थे .... लड़के ,सब लड़कियों के चारों तरफ गोल घेरा बना हँस-हँस के परेशान किया करते थे .... उस दिन भी उन लड़कों का वही इरादा रहा होगा .... लेकिन पुष्पा पर नज़र पड़ते ही सब भाग गए .... लेकिन एक दूरी बना कर वो डॉ.साहब का भाई अपना नित का रूटीन फॉलो करता रहा .... कुछ दिनों-महीनों में पुष्पा की नज़र भी उसे ढूँढने लगी ....
कभी-कभी ऐसा हुआ कि पुष्पा किसी वजह से ,सुबह से रात तक घर से बाहर नहीं निकल पाई ,तो दूसरे दिन उसके बाहर आने पर ,वो लड़का अपने चेहरे पर गहरी उदासी लिए , हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाता और सामने पड़े गमले को उठा कर ज़ोर से पटक देता .... दो-चार बार ऐसा होने पर पुष्पा को मज़ा आने लगा .... वो जानबूझ कर बाहर नहीं आती और छुप कर उस लड़के को परेशान होता देखती ...............,लड़का बैचैनी से टहलता नज़र आता .... साईकिल से पुष्पा के घर के सामने वाले सड़क पर चक्कर लगाता , साईकिल की घंटी बेवजह बजाता .... लड़का अपने घर के ग्राउंड-गेट के ग्रिल को ज़ोर-ज़ोर से बजाता .... रात होने पर टॉर्च को जलाता-बुझाता .... पुष्पा को खिलखिला कर हँसने का मन करता .... लेकिन मुस्कुराते हुये वो सो जाती .... न जाने वो लड़का सोता या रोता ..... खाना खाता या खाना खाता भी नहीं .... पुष्पा को कुछ पता नहीं चलता .... पुष्पा उस लड़के को जान बुझ कर तंग कर रही है , ये लड़के को भी कभी नहीं पता चला होगा .... जिस दिन भी ऐसा पुष्पा करती , दूसरे दिन उसके दीदार होने पर , वो लड़का उठा-पटक .... धूम-धड़ाम जरूर करता .... कभी गमला फूटता .... कभी मेज़-कुर्सी ज़ोर से पटकता .... कभी तो साईकिल ही .... एक आदत बन जाती है न ....
 लेकिन पुष्पा और उस लड़के के बीच में , एक शब्द भी बात , कभी भी नहीं हुई .... लड़के का नाम तक नहीं जान पाई .... क्यूँ वो घर को छोड़ कर चला गया , कहाँ गया ,पुष्पा को कभी भी पता नहीं चला .... आज भी उसे एक सवाल के जबाब का इंतजार है कि अगर वो प्यार करता था तो कभी लिख कर , बोल कर प्यार का इजहार क्यूँ नहीं उससे किया .... लेकिन करता भी तो वो कैसे .... पुष्पा कभी अकेली कहाँ होती थी .... 
घर वाले जो ढूंढ रहे थे , 
वो मिलता भी तो कैसे ,
कोई निशानी ..... ??
प्यार का एक रंग ............

Saturday, 23 February 2013

वसंत लाया



(1)
पीली चुनर


ओढ़े हठी धरणी

मधुऋतु में

*************
(2)
षट रागिनी

कुहू लगे मन पे

कुसुमागम

*************
(3)
किंशुक छाया

वशीभूत अचला

तृप्त मानव


*************

(4)
देख के बौर

बौराये - मत्त जाये

वसंतव्रत


 

*************
(5)

पा के पलाश

बसंती है वसुधा

मदन माया


*************
(6)
गुलाल उड़ा

फाग ,रँग होली का

वसंत लाया
 
*************
(7)
झूमें औ नाचें

रसभरी रसिक

हुआ मानव

*************
(8)
अवसाद के

तुषार भी पिघला

टेसू ताप से

**************
(9)
मन मयूर

को किया  आह्लादित

वन की लाट

*************


Friday, 8 February 2013

Ego है तो Go ....

बेटे के facebook के profile में 1500 friend हैं ....

उससे पुछी :-
 इतने को Add क्यूँ करते हो .... ?
 कैसे Manage करते हो .... ?
इतने सारे Friend हैं .... ?

तो वो बोला .... :-
जो मुझे जानते हैं ....
या
जानना चाहते हैं ....
मैं जिसे जानता हूँ ....
या
जानना चाहता हूँ ....
सब से जुड़ता जाता हूँ ....
घर - परिवार - रिश्तेदार हैं ....
School - College था ....
Office - Institution है ....
देश - विदेश है ....
Train - Aeroplane में मिलना हो जाता है ....
वे जुड़ जाते हैं ....
कभी-कभी तो ऐसा होता है , कि दो आपस के दुश्मन मेरे Profile में भी होगें ....
दोनों मेरे अच्छे दोस्त भी हैं ....

Q.तुम्हें फर्क नहीं पड़ता .... ?

Ans.क्यूँ ....?
मुझे फर्क पड़ना चाहिए .... ?

Q.कभी कभी  उलझन नहीं होती .... ?

Ans.एक , दूसरे के प्रति क्या सोचते हैं ....
वो दोनों अपने निजी जिंदगी क्या करते हैं , उससे मुझे क्या मतलब ....
दोनों मेरे अपने हैं .... दोनों अगर मुझे ये कहें उसका साथ छोड़ दो तो मुझे तो दोनों को अपनी दोस्ती से बाहर का रास्ता दिखलाना होगा .... और जहां तक सही और गलत का सवाल है , तो ..... वे दोनों एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं ये उनका निजी मामला है  .... मैं तो ये देखता हूँ कि वे दोनों मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं  .... मेरे जिंदगी में कौन रहेगा या कौन नहीं रहेगा या किसकि कितनी महत्व हैं या रहनी चाहिये ये तो मेरा निजी मामला है .... किसी के साथ काम करने से वो दोस्त नहीं हो जाता और कोई विदेश में है , तो उसका महत्व कम नहीं हो जाता .... किसी को profile में Add करता हूँ और कोई ऐसा मेरा बहुत करीबी जो मुझे पहले से जानता है , उस आने वाले के कारण मुझे Unfriend कर देता भी है , तो I Do't care .... वो  उसकी मर्ज़ी होगी ....
उसे मेरी दोस्ती ज्यादा महत्वपूर्ण है या उसका Ego ....
Ego है तो Go ....
Ego आंख की किरकिरी की तरह है .... बिना उसे साफ किये आप साफ साफ नहीं देख सकते ....
( दो ही चीजें अनन्त हैं – ब्रह्माण्ड और मनुष्य की मूर्खता ....
 पहले के बारे में मैं पक्की तरह से नहीं कह सकता .... ~ अलबर्ट आइन्स्टीन ~ )

अधिकतर लोगों को एहसास ही नहीं होता है कि जब वे किसी दुसरे को दोषी ठहराते हैं , तो वे खुद को कितनी बड़ी  गलफहमी में जकड़ते हुये अपनी शक्तियों को खो देते हैं ..... !!


 

Saturday, 2 February 2013

दूर नहीं हुई आशंका ....। अब सोच में हूँ ....।




दुखित था मन ,व्यथित था हृदय ,जब था आक्रोश .... 
हम ऐसे हो जाएँ , खुश हों , मौत के सुन आदेश .... ??
लो आ गया , जारी भी होगा अध्यादेश ....
बदल गया कानून , बदल भी जायेगा देश .... ??
क्या बीतेगी उनपर , जब माँ पत्नी सुनेंगी सन्देश ....

हो तो वही रहा है ,सुनने की थी जिसकी आस ....
मन व्यथित और हृदय क्यूँ है , फिर उदास ....

मिलेगी तो उन्हें भी सज़ा ,जबकि नहीं उनका कोई दोष .... 

मैं फेशबूक और ब्लॉग की दुनिया में ,
समय गुजारने के ध्येय से आई थी ....
अकेलापन , जिसे मैं अपने स्वभाव से चुन ली थी
उसे दूर करने का साधन मिला था ....,
जो मन को भा रहा  था ....
बहुत कुछ सीखने को मिला ....
बहुत अपने मिले ....
पढ़ने के लिए बहुत कुछ मिला ....
पढ़ना शुरू की ....
एक ब्लॉग से दुसरे ब्लॉग तक ....
यहाँ भी बहुत उलझने हैं ....
कहीं लगता है , रास्ता साफ नज़र आ रहा है ....
कहीं लगता है ,एक ,दुसरे का रास्ता काट रहा है ....
कोई कहता नज़र आ रहा है ....
काश ....
लौटा पाते , दिन  वो तो ,
जीवन facebook , Google , Blog की
बातें 18 वीं सदी के शास्त्रार्थ की ....
पढ़ते-पढ़ते अपनी ,एक नई सोच बन रही है ....
दूर नहीं हुई आशंका  .... अब सोच में हूँ ....

जब हालात समझने में एक राय नहीं ....
जब हालात सुधारने में एक राह नहीं ....
तब लगे हैं बदलने में सोच की दिशा .... 
 तब लगे हैं बदलने में समाज की दशा ....
उलझन है कि सुलझती नहीं .... 
बेकरारी को करार आती नहीं ....
नाम की इच्छा तो ना कभी थी ....
और आगे कभी हो भी गई तो वो बेबकूफी होगी ना ....
लिखना तो आज भी नहीं आता ....
कभी कुछ  लिख ली तो बस ....


Monday, 28 January 2013

रच शौर्य गाथा ना गा चाँचरी( वह गाना जो वसंत में गाया जाता है )


आज लगता है , काश मुझे भी होती , एक धी .....
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आ जा ,सुन ल जा बात खरी-खरी(स्पष्ट)
ना बताइब ,ना समझाइब बारी-बारी(बार-बार)
बहुत चला चु क ल जा जुबान के आरी(लकड़ी काटने वाला)
अब आ गइल बा ओकर पारी
अपने पे आगइल त पड़ी भारी
शर्मों - हया से संकुचल नारी
पा जाये मान - सम्मान त हो जाए वारीफेरी(निछावर)
ना समझ ओकरा क अबला-बेचारी
संगी संयमित ना रहे त मार पिला-पिला वारि(पानी)
ना बुझ बेटी के  नाजुक गिरी(किसी बीज के अन्दर का गुदा)
उ लाँघ चूकल बड़हन(ऐवरेस्ट) गिरि(पहाड़)
कोई छूये ना , ओकर आँचल के किनारी
ना त भोंक दी , तोरा छाती पे कटारी
हो चुकल अरिघ्न(शत्रु का नाश करने वाली) ना बना व जा अरि
ना बन के अब रह सके दुधारी
ओकरा पास बा कलम-बेलन दुधारी
रच शौर्य गाथा ना गा चाँचरी( वह गाना जो वसंत में गाया जाता है )
बहुत बन के रह चु क ल गठरी-कुररी(मादा-टिटहरी)
मेहनत के रंग दिखला बन चातुरी(चतुराई,धूर्तता)




Tuesday, 22 January 2013

सफ़र , एक आजाद बच्ची की , कैद से स्वच्छंद जिंदगी


एक छोटी सी बच्ची , देर रात तक अपने ताऊ ,बड़े चाचा ,छोटे चाचा ,फूफा ,पापा के (काम से बाहर गए के) लौटने का इन्तजार करती .... जब सब घर आते और उस बच्ची को जगा देखते , तो , सबके चेहरे से थकान जैसे मिट सी जाती और उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती .... जब वे सब खाना खाने बैठते तो वो बच्ची दौड़-दौड़ कर सबकी थाली-पानी लगाती .. रोटियाँ पहुँचाती ....
संयुक्त परिवार था .... लेकिन सबकी पत्नियाँ (ताई , बड़ी चाची , छोटी चाची और बुआ) गाँव में रहतीं और शहर में उस बच्ची की माँ और सबके साथ , सबके मिला कर 22 बच्चे .... यानि बड़े-छोटे सबको जोड़ कर 28 व्यक्ति का परिवार .... सुबह से शाम तक चहल-पहल रौनक लगा रहता .... संयुक्त परिवार था तो कुछ खट-पट होती होगी .... लेकिन उस बच्ची को सभी बहुत प्यार करते .... सबकी वो दुलारी थी .... केवल उसका जन्मदिन बहुत धूम-धाम से मनता .... खाने-पीने ,पहनने-ओढ़ने में कोई रोक-टोक उसे नहीं मिला ....
आजाद पक्षी की तरह चहकती वो बड़ी हुई और उसकी शादी एकल परिवार में हुई .... जहाँ पर्दा भी था ...... उसे घर से बाहर के चौखट तक जाने की इजाजत नहीं थी .... उसके बोलने - हंसने पर ,खाने-पहनने पर रोज टीका - टिपण्णी होती .... एक दिन वो अपने सोने के कमरे में बैठी थी ,गर्मी का दिन था तो कमरे की खिड़की खुली रखी , बाहर सड़क से उसके ससुर जी को वो पलंग पर बैठी नज़र आई तो वे घर में आये और खिड़की के पर्दे में जगह-जगह काँटी ठोक दिए ताकि फिर बाहर से कोई उनकी बहु को देख ना सके ....
एक दिन घर में उसके अलावे केवल एक छोटा नौकर था ,घर के बाकी सदस्य कहीं घुमने गए थे ...... उसे बाहर से किसी औरत की आवाज सुनाई दी ,और नौकर बाहर से ही आता दिखा , तो वो नौकर से पुछी :- बाहर कौन है .... नौकर बोला :- आपकी माँ ......
वो बाहर झांक कर देखी तो फटेहाल में एक भिखमंगी खड़ी दिखाई दी .... नौकर की बात सुनने पर उसे बहुत गुस्सा आया ,लेकिन वो नौकर को डांट नहीं सकती थी .... सास के घर आने पर ,उनसे वो इस उम्मीद में बात की कि शायद वे डांटें ..... लेकिन सब हंस कर रह गए ... उसे बहुत बुरा लगा ...... वो नौकर से बात करना छोड़ दी और काम लेना भी ..... लेकिन ये बात घर में किसी को पसंद नहीं आया ........ एक दिन उसके पापा को बुलवा कर ,पापा के साथ उसकी की भी बहुत बेइज्जत की गई और घर से निकल जाने का आदेश मिला ....... परन्तु ,उसके पापा ,उसके सास-ससुर से हाँथ जोड़ ,पैर पकड़ कर माफ़ी मांग लिए और बात को संभाल लेने की सीख बेटी को दे कर चले गए ....
अब उसकी सास को हथियार मिल गया ,कोई छोटी-बड़ी बात होती ,किसी तरह की कोई घटना होती , उसके बाप-भाई को बुलवा लेती और दिल खोल कर बेइज्जत करती और उसका मनोबल तोड़ने का  पूरा कोशिश करती .... वो चाह कर भी किसी बात , कोई अन्याय का विरोध नहीं करती ... उसे अपने मैके के लोगों पर  गुस्सा आता , कि वे उसकी सास के बुलाने पर आ क्यूँ जाते हैं , उन्हें मना भी करती , तब भी वे आ जाते ,शायद उन्हें डर हो , कि वे नहीं जायेगें तो उनकी बेटी को वापस पहुँचा दे .... ब्याहता बेटी को कौन अपने घर में बोझ बना कर रखना चाहेगा ...... आसान था आकर माफी मांगना और बेटी को नरक में जलने के लिए छोड़ना .... ये सिलसिला या यूँ कहें ,ये नाटक हर महीने चला शादी से 6छ्ह साल तक ....
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रिश्ता बनाने वाले , ये तूने सबको क्या दिया
एक ओर  कुआँ , दूजी ओर खाई खोद दिया
एक  श्रवण को अंधा , कान से कच्चा बना दिया
माता कहती दिन को रात , तो रात कह दिया
माता , सूरज को कहती चाँद , तो चाँद कह दिया
श्रवण की हुई नहीं थी शादी , क्या तूने उसे बता दिया 
श्रवण जब मारा गया , तब उसके माँ-बाप ने श्राप दिया  
खुद माँ-बाप की जिन्दगी कैसे कटी नहीं सुना दिया
खुद माँ-बाप जी लिया , बहू की जिन्दगी नर्क बना दिया !!
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फिर वो जिद पर अड़ कर पति के पास नौकरी पर आ गई ....
नौकरी पर पति के मर्जी के खिलाफ रह रही थी तो मार खाना भी शामिल हो गया .... हालात कैसे भी रहे ,लेकिन वो कभी यह नहीं सोची कि वो तलाक ले ले और अपनी जिंदगी अकेले जिए .... समाज और समाज के नियम-कानून , पति की छोड़ी औरत का क्या हाल होता है , उससे वो अनजान नहीं थी ....  और तलाक़ के बाद उसकी जिंदगी और मुश्किलों से घिर जाती .... ऐसी बात भी नहीं थी कि उसमें अकेले जीने की हिम्मत और काबिलियत की कोई कमी थी .... लेकिन वो हारने वालों में से नहीं थी ..... लड़ कर जितने वालों में से थी ....
जब वो एक परिवार से लड़ कर अपनी गरिमा की रक्षा नहीं कर पाती तो दहलीज़ लांघने के बाद हज़ारों नर-भक्षियों से अपनी अस्मिता की रक्षा करनी पड़ती तो वो कैसे करेगी .... रोज मरमर कर जीने की हिम्मत वो कहाँ से लाती और वो अपने पति को छुटकारा दे , उनकी जिंदगी आसान नहीं बनाना चाहती थी .... मर्दों का क्या , तलाक हुआ और उनकी दूसरी शादी हुई और एक लड़की बली-बेदी पर चढ़ी .... समाज तो पति से अलग हुई मादा को न जीने देती है और ना मरने .... उसे बस इन्तजार रहा अपने बेटे के बड़े होने का ....
बेटे के बड़े होते ही , वो सब ठीक करती चली गई .... पहले विरोध की अपने भाई-बाप के बुलाने का , फिर ,अपने ऊपर उठने वाले हांथो का .... एक दिन में नहीं हुआ , उसमें वर्षो लगे .... लेकिन हिम्मत रखी और आवाज़ उठाती रही .... आज अपने पति के साथ रहते हुये भी , वो स्वच्छंद जिंदगी जी रही है .......... !!
इन बातों को बताने का मक़सद यही है कि अपने हालातों को बदलने का जज्बा हर इंसानों में होनी चाहिए ...... जब एक परिवार की स्थति में बदलाव ला सकेंगे , तभी तो समाज बदलेगा और जब समाज बदलेगा तो देश की स्थिति तब तो सुधरेगी ...........

Sunday, 20 January 2013

समझा - बुझा - साँझा - माँझा करो



युवराज के ताजपोशी की
तैयारी शुरू होने पर है
होशियार में से
हो भी निकला हुआ है
ना पत्नी है ना बेटी ,
दर्द वो क्या जानेगा :(
मुन्ना को मिला झुनझुना समझा करो ...........


जब लगने लगा ,
इंतजार खत्म होने पर है
बेटी की मौत - शहीद की
कुर्बानी रंग लाने पर है
दिग्गजों में उठा-पटक
क्या गुल खिलाने पर है
अब तक जो होता आया है
वही होता रहेगा बुझा करो ..........

सबकी निगाह
फास्ट ट्रैक कोर्ट पर है
कुछ नहीं सोच-समझ में ,
कठोर कानून कब बनेगा 
क्या होगा शहीदों के
मान-सम्मान का , आतंकित है मन 
कब कब कब ,कितना ,
कौन जानता है ,साँझा करो ................

खुदा की लाठी बे-भाव पड़ेगी ,
 दम निकाल के छोड़ेगी ,
हम ये क्यूँ इंतज़ार करें ,
छोड़ो खुद की बातें ,
बातें प्यार की ,
जुटाओ हिम्मत ,
करो इन्कलाब की बातें ,
एक जलियावाला बाग
तब बना था ,एक हम बना दें ,
उनकी आत्मा को झंझकोर कर ,
अपनी-अपनी कर-कलम पर माँझा करो ......

Thursday, 17 January 2013

हौसला कैसे बढ़ाऊँ


साफ दर्पण में शक्ल देखने का हौसला नहीं बचा
दिखता है अपनी बेबसी ,व्यथित इंसानों की लाचारगी
खुद को तसल्ली दे भी लूँ ,क्या कह कर उन्हें तसल्ली दूँ
शेर का खाल पहन भी लूँ , खुश हो भी लूँ
दहाड़ने का मौसम भी है ,मौका-ये-दस्तुर भी
पूंछ हिलाने से फुरसत कैसे पा लूँ 
मसाल को मंजिल पर पहुँचाना तो है 
मार दिए जाने का ना तो डर  ,ना शर्मिंदगी है  
लेकिन ,रास्ते ना-वाकिफ हैं ,
लड़ाई के तरीके भूल जाना ,कैसे माफ़ करूँ
जिन्हें कोसते-कोसते सुबह-शाम करूँ
सब तकलीफों का जिम्मेदार मानूँ
जब वे भिक्षाटन में निकले तो मुग्ध हो ,
भिक्षा देने का गर्व क्यूँ महसूस करूँ

न्याय दिलाने के लिए ,कौन सा दरवाज़ा खटखटाऊँ
नर-भक्षियों का सामना कर ,सज़ा तक कैसे पहुँचाऊँ
छुटता जा रहा आस , नील का रंग कैसे उतारूँ

आत्मविश्वास के कमान पर स्वाभिमान का तीर कैसे चढ़ाऊँ
साफ दर्पण में शक्ल देखने का हौसला कैसे बढ़ाऊँ ............





२६ अगस्त २०२६

आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे...