Wednesday, 25 August 2021
जंग
Tuesday, 24 August 2021
उऋण
"कन्यादान कौन करेगा..?" नेहा और नितिन की शादी के समय पण्डित जी ने कहा। दोनों की शादी मन्दिर में हो रही थी..।
"आप अनुमति दें तो मेरा दोस्त दीपेन कन्यादान करना चाहता है और वह अपनी पत्नी के साथ यहाँ उपस्थित भी है..। सामने आ जाओ दीपेन..," वर नितिन ने कहा।
सबके सामने दीपेन के आते ही उपस्थित लोगों में खलबली मच गयी। दबे आवाज में कानाफूसी शुरू हो गयी तथा वधू नेहा और उसकी माँ भौंचक दिख रहे थे। क्योंकि दीपेन और नेहा एक दूसरे के जेरोक्स कॉपी लग रहे थे।
"यह तुम्हारा ही अंश है देवकी... जो हमें तुम्हारे सेरोगेट मदर के रूप से दान में मिल गया था..," दीपेन की माँ यशोदा ने कहा।
स्वसा के आँसू
मौली को गीला करे
श्रावणी पूनो
पहला तारा
कौन जलाने उठे
साझे का चूल्हा!
Friday, 20 August 2021
स्वाश्रय का सुख
"इस साल भी मामा दादा की कलाई सूनी रह जायेगी दादी माँ..! पिछले साल नहीं भेज पाने का कारण समझ रहा था, लेकिन इस साल भी...?" पोता सुयश ने पूछ लिया।
"राखी से भाईयों की कलाई कब से सजने लगी होगी क्या तुम मुझे इसका इतिहास बता सकते हो ?" दादी ने कहा।
"जी अवश्य! मार्च 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चितौड़ के नाराज सामंतो के कहने पर चित्तौड़ के शासक महाराणा विक्रमादित्य को कमजोर समझकर उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया था। राजमाता कर्णावती को जब यह पता चला तो वे चिंतित हो गईं। उन्हें पता था कि उनके राज्य की रक्षा केवल हूमायूं कर सकता है। इसलिए मेवाड़ की लाज बचाने के लिए उन्होने मुगल साम्राट हुमायूं को राखी भेजी और सहायाता मांगी।
राज्य पर संकट मुसीबत से निपटने के लिए कर्णावती ने सेठ पद्मशाह के हाथों हुमायूं को राखी भेजी थी। राखी के साथ कर्णावती ने एक संदेश भी भेजा था। उन्होंने सहायता का अनुरोध करते कहा था कि मैं आपको भाई मानकर ये राखी भेज रही हूँ।..,"
"हुन्ह्ह्! मेवाड़ की लाज बचाने के लिए...। आज चार सौ सत्तासी साल के बाद भी कन्याओं की लाज बचाने की गुहार जारी है..।" सुयश की बात पूरी होने के पहले ही दादी ने कहा।
"इससे और आपके राखी नहीं भेजने में क्या सम्बंध है दादी माँ?" सुयश ने कहा
"उन्हें मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त करने का संदेश भेज रही हूँ!मेरी माँ अपने भाई को राखी कभी नहीं बाँधा। पण्डित जी से राखी लेकर अपने सिंहोरा में लपेट दिया करती थीं। सुयश तुम मेरा साथ देना ...!"
"जी अवश्य दादी माँ!" सुयश ने कहा
"जब तक हुमायूं अपनी सेना लेकर मेवाड़ पहुँचे, रानी कर्णावती का जौहर हो चुका था। आज तक कन्याओं का गुहार लगाना जारी है। इस साल से मैं भी भैया को राखी नहीं बाँधूगी...!" पोती सुमन का दृढ़ निश्चयी स्वर गूँजा।
"स्त्रियों को वल्लरी बनने के नसीब को बदलकर बरगद बनना तय करना होगा...।" पोता-पोती को अपने बाँहों में समेटते हुए दादी ने कहा।
Tuesday, 17 August 2021
"सुरक्षा कवच"
"तुम मेरे पैंट के पॉकेट से रुपया निकाली हो क्या?" श्यामलाल ने अपनी पत्नी रुक्मिणी से पूछा।
'अन्त भला तो...'
"नमस्ते आँटी जी!"
मैं बुटीक में अपने कपड़े पसन्द कर रही थी कि लगा किसी ने मुझे ही सम्बोधित किया है। आवाज की दिशा में देखा तो एक प्यारी सी युवती मुझे देखकर दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुरा रही थी। लेकिन उसकी मुस्कान और आँखें निश्चेत लगीं।
"खुश रहो सुमन! कैसी हो और क्या कर रही हो आजकल?" मैंने पूछा।
"ठीक हूँ आँटी जी। अभी कुछ नहीं कर रही हूँ।" सुमन ने कहा। उसकी आँखें नम हो रही थीं।
"अब अपने माता पिता को रजामंदी दे दो कि वे तुम्हारी शादी कर दें।"
".....!" सुमन की चुप्पी 'कोई रहस्य है' उगल रही थी।
"आपके सिखाये कटाई और सिलाई और बैंक से आपके ही मदद से मिल गए कर्ज से सुमन ने अपना दूकान खोल ली थी...।"
कुछ वर्ष पहले मैं मुफ्त में कढ़ाई, सिलाई , स्टोन से ज्वेलरी बनाना सिखाया करती थी। उसी दौरान अपने कुछ सहेलियों के संग सुमन मेरे पास सीखने आया करती थी... ।
अचानक एक दिन वह मुझसे बोली कि "आँटी जी! मेरी शादी तय हो गयी है। कल से मैं नहीं आऊँगी।"
"शादी! तुम्हारी शादी.. अभी तो तुम सातवीं में पढ़ रही हो। कोई कैसे कर सकता है तुम्हारी शादी? 18 साल से कम उम्र की कन्या की शादी करना गलत है। सबको सज़ा हो जाएगी।"
"आँटी जी! इस राज्य में शराब बन्दी है..। मेरे गाँव में चलकर देखिए हर दूसरे घर में शराब बनता है।" सुमन ने कहा।
दूसरे दिन सुमन नहीं आयी। मैं उसकी सहेली के संग उसके घर जाकर उसके माता-पिता को समझाने की कोशिश की तो पता चला कि उसके दादा अपनी पोती की शादी करना चाहते हैं ।
मैं दादा को समझाने का प्रयास की कि "कच्ची उम्र में विवाह के कारण लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का अधिक सामना करना पड़ता है। लड़के और लड़कियों दोनों पर शारीरिक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है...।
वैदिक काल में बाल विवाह का कोई संकेत नहीं मिलता हैं... मध्यकाल के आते-आते जब भारत बाहरी आक्रमणों को झेल रहा था तब बेटियों को विदेशी शासक भोग की वस्तु समझकर अपहरण कर ले जाते तथा उनके साथ सम्बन्ध बना लेते थे... इसी दौर में रोटी-बेटी की कुप्रथा का प्रचलन हो गया..। छोटी उम्र में विवाह हो जाने के कारण दहेज भी कम देना पड़ता था... , आपके साथ तो ऐसी कोई समस्या नहीं। मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं केस दर्ज कर गवाह बनूँगी...।" उस समय शादी टल गयी... ।
"पिछले साल सुमन की शादी हुई और शादी के कुछ दिनों के बाद ही विधवा हो गयी। ससुराल से अपशगुनी बना बेदखल कर दी गयी..," सुमन की सहेली बता रही थी।
मैं अमेरिका छः महीने के लिए गयी थी लेकिन वैश्विक युद्ध के कारण पटना वापिस आने में पन्द्रह महीने गुजर गए ...। यहाँ मेरी जिम्मेदारी प्रतीक्षा कर रही थी। मैं सुमन के साथ उसके घर गयी उसके माता-पिता से मिलने। इस बार दादा की जगह पिता अड़ियल लग रहे थे। मैं उनको समझाने का प्रयास किया कि, "विद्यासागर को ग़रीब और आम विधवाओं की व्यथाओं ने प्रभावित किया और उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ़ जंग छेड़ दी। इसके लिए उन्होंने संस्कृत कॉलेज के अपने दफ़्तर में न जाने कितने दिन-रात बिना सोये निकाले ताकि वे शास्त्रों में विधवा-विवाह के समर्थन में कुछ ढूंढ सके।
आख़िरकार उन्हें ‘पराशर संहिता’ में वह तर्क मिला जो कहता था कि ‘विधवा-विवाह धर्मवैधानिक है’! इसी तर्क के आधार पर उन्होंने हिन्दू विधवा-पुनर्विवाह एक्ट की नींव रखी। 19 जुलाई 1856 को यह कानून पास हुआ और 7 दिसंबर 1856 को देश का पहला कानूनन और विधिवत विधवा-विवाह हुआ। कहा जाता है कि जिन भी विधवा लड़कियों की शादी वे करवाते थे, फेरों की साड़ी भी वही उपहार स्वरुप देते थे।
बताया जाता है कि शांतिपुर के साड़ी बुनकरों ने विद्यासागर के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए साड़ियों पर बंगाली में कविता बुनना शुरू किया था,
“बेचे थाको विद्यासागर चिरजीबी होए”
(जीते रहो विद्यासागर, चिरंजीवी हो! )
भले ही, इतिहास इस विधवा-पुनर्विवाह पर मौन रहा लेकिन यह शादी पूरे भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। उन क्रांतिकारी कदम के पदचिन्हों पर आप अपने कदम बढ़ाएं और सुमन की पुर्नविवाह करने का प्रयास करें...।"
"सुमन के किस्मत में विवाह का सुख लिखा होता तो यह विधवा ही नहीं होती...," सुमन के माता-पिता एक ही बात तोता की तरह रट रहे थे...।
मैं भी ठान ली कि सुमन को मुरझाने नहीं देना है...और मैं भी लगातार तरह-तरह की दलीलें देती रही और किरण फूटने के साथ सुमन के पुर्नविवाह का निर्णय नया उजाला फैला गया।
पत्थर भले आखरी चोट से टूटता है... परन्तु पहली चोट कभी व्यर्थ नहीं जाती है...।
Friday, 6 August 2021
सहभागिता
विद्यालय से लौटी बिटिया को सजाने-सँवारने के लिए हरी चूड़ी, हरा रिबन, हरी बिन्दी, हरा फ्रॉक लेकर बैठी लक्ष्मी बार-बार अपनी मुनिया को पुकार रही थी। मुनिया होमवर्क करने में उलझी हुई बार-बार, "आई माँ! आई माँ!" कहती हुई आखिर में आ गयी।
"यह समान कहाँ से आया माँ?" मुनिया ने कहा।
"आज मुझे मजदूरी ज्यादा देर की मिली मुनिया।" माँ लक्ष्मी ने कहा।
"मेरे पास किताब नहीं होने की वजह से मुझे कक्षा के बाहर धूप-बारिश में खड़ा रहना पड़ा माँ..! सियार के बियाह का आनन्द ली..!"
"आज के बाद कक्षा में केवल पढ़ाई करना मुनिया। ले मैं तेरा किताब लेकर आया हूँ।" मुनिया का पिता ने कहा।
Wednesday, 4 August 2021
बिना_वर्दी_का_योद्धा
"मुझे नहीं पता था कि मेरे घर में भी विभीषण पैदा हो गया है..," सलाखों के पीछे से गुर्राता हुआ पिता अपने बेटे का गर्दन पकड़े चिल्ला रहा था।
"बड़े निर्लज्ज पिता हो। जिस पुत्र पर गर्व होना चाहिए उसको तुम मार देना चाहते हो...," पिता के हाथों से पुत्र का गर्दन छुड़ाता हुआ पुलिसकर्मी ने कहा।
"क्या करता मैं .. आप माँ की विनती सुने नहीं उलटा उन्हें कमरे में कैद कर दिया और कांवड़ियों की टोली बनाकर जल उठाने चले गए।"
"सावन में जलाभिषेक करना हम हिन्दुओं का धर्म भी है और अधिकार भी।" पिता पुनः चिल्लाया।
"और इस वैश्विक युद्ध में समाज हित के लिए सरकार द्वारा बनाई गई नीति...? क्या सीमा पर लड़ रहे फौजी का ही दायित्व है...?" पुत्र ने कहा।
"तुम्हें और तुम्हारे साथियों को तो जो सजा होगी सो होगी..., तुम्हारे पोशाक बनाने वालों का बेड़ा गर्क हो गया।" पुलिसकर्मियों के ठहाके गूँजने लगे। □
Wednesday, 28 July 2021
प्रत्यापित अनुभव
उम्र के जिस पड़ाव (1960-2021) पर मैं हूँ और अब तक हुए समाज से भेंट के कारण , मुझे तीन पीढ़ियों को बेहद करीब से देखने का मौका मिला। तीन पीढ़ी यानि मेरी दादी की उम्र की महिलाओं में सास बहू का रिश्ता, मेरी माँ की उम्र की महिलाओं में सास बहू का रिश्ता, और मेरी उम्र की महिलाओं में सास बहू का रिश्ता..। अक्सर बिगड़ते रिश्ते और मूल्यह्रास होते सम्बन्ध का आधार बीच की कड़ी यानि माँ के पुत्र और पत्नी के पति में संतुलन ना बना पाने वाला पुरुष होता है।
बिहार हरियाणा राजस्थान जैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों की ही बात नहीं है.. जहाँ आईएएस जैसा शिक्षित प्राणप्रिया से त्रस्त प्राणेश आत्महत्या कर लेते हों। धनाढ्य गृहों में गृहणी से भयभीत सास किसी कोने में आसरा पाने में असमर्थ हो जाती हो..। पत्नी के आत्महत्या कर लेने की धमकी से त्रसित पुत्र आँखेें चुराने में व्यस्त रह जाता हो...। आज के दौर में भी पढ़ा लिखा अशिक्षित मूढ़ अनेकानेक परिवार पाए जा रहे हैं..। हो सकता है महानगरों की तितलियाँ मेरी बातों से सहमत नहीं हों.. ।
किसी ने सच कहा है कि साहित्यकार भविष्यवक्ता होते हैं...। प्रेमचंद की *'गृहनीति'* को मैं तब पढ़ी थी जब मुझे पीढ़ी और बीच की कड़ी की समझ नहीं थी। आज भी सामयिक और सार्थक लेखन पा रही हूँ...।
क्यों केवल माँ की उलाहनों को सुनकर पुतर श्रवण कहलाये उसे पूरे ईमानदारी के साथ नायक की तरह..
बेटा -'ज़ब तुम समझने भी दो। जिस घर में घुड़कियों, गालियों और कटुताओं के सिवा और कुछ न मिले, उसे अपना घर कौन समझे ? घर तो वह है जहाँ स्नेह और प्यार मिले। कोई लड़की डोली से उतरते ही सास को
अपनी माँ नहीं समझ सकती। माँ तभी समझेगी, जब सास पहले उसके साथ माँ का-सा बर्ताव करे, बल्कि अपनी लड़की से ज्यादा प्रिय समझे।'
और
'तुम इस घर को जल्द छोड़नेवाली हो, उसे बहुत दिन रहना है। घर की हानि-लाभ की जितनी चिन्ता उसे हो सकती है, तुम्हें नहीं हो सकती।
समझदारी वाली बात का अनुकरण करना चाहिए
पत्नी के पल्लू को थामे या गले के लॉकेट में नग जड़ा मेहरमौउग/जोरू का गुलाम ना कहलाने के लिए...
पति -'नहीं-नहीं तुमने बिलकुल गलत समझा। अम्माँ के मिजाज में आज मैंने विस्मयकारी अन्तर देखा, बिलकुल अभूतपूर्व। आज वह जैसे अपनी कटुताओं पर लज्जित हो रही थीं। हाँ, प्रत्यक्ष रूप से नहीं, संकेत रूप से। अब तक वह तुमसे इसलिए नाराज रहती थीं कि तुम देर में उठती हो। अब शायद उन्हें यह चिन्ता हो रही है कि कहीं सबेरे उठने से तुम्हें ठण्ड न लग जाय। तुम्हारे लिए पानी गर्म करने को कह रही थीं !
नायक का अनुसरण करना चाहिए ...
कहानी में पढ़ा था कि किसी परिवार में सास-बहू के बीच झगड़े के कारण सदैव अशान्ति फैली रहती थी। एक बार दोनों के बीच की कड़ी का पुरुष किसी काम से दूसरे शहर जाता है और बहुत महीनों तक वापस नहीं लौटता है और ना अपनी ख़ैरियत की कोई खबर भेजता है। जब एक अचानक लौटता है और बिना कोई आहट किये घर के अन्दर की बात सुनने की कोशिश करता है तो उसे सास बहू की मधुर बातें सुनाई देती हैं और उसे लगता है कि उसकी अनुपस्थिति के कारण दोनों के बीच रिश्ते सुधर गए हैं तो वह उनलोगों से मिले बिना वापिस लौट जाता है..! यानि या तो वो सुलझाए या लोप हो जाये...!
कहने का तात्पर्य यह है कि सारी जिम्मेदारी बीच की कड़ी की है।
कहने का तात्पर्य यह है कि सारी जिम्मेदारी बीच की कड़ी की है। सोने पर सुहागा हो जाये जो गृहधुरी स्वामिनी भार्या
स्त्री :- मुझे सास बनना ही नहीं है। लड़का अपने हाथ-पाँव का हो जाये, ब्याह करे और अपना घर सँभाले। मुझे बहू से क्या सरोकार ?'
पति -'तुम्हें यह अरमान बिलकुल नहीं है कि तुम्हारा लड़का योग्य हो,तुम्हारी बहू लक्ष्मी हो, और दोनों का जीवन सुख से कटे ?
स्त्री -'क्या मैं माँ नहीं हूँ ?
पति -'माँ और सास में क्या कोई अन्तर है ?'
स्त्री -'उतना ही जितना जमीन और आसमान में है ! माँ प्यार करती है, सास शासन करती है। कितनी ही दयालु, सहनशील सतोगुणी स्त्री हो, सास बनते ही मानो ब्यायी हुई गाय हो जाती है। जिसे पुत्र से जितना ही
ज्यादा प्रेम है, वह बहू पर उतनी ही निर्दयता से शासन करती है। मुझे भी अपने ऊपर विश्वास नहीं है। अधिकार पाकर किसे मद नहीं हो जाता ?मैंने तय कर लिया है, सास बनूँगी ही नहीं। औरत की गुलामी सासों के बल पर कायम है। जिस दिन सासें न रहेंगी, औरत की गुलामी का अन्त हो जायगा।' विचार रखते हुए सहयोग करे...!
Friday, 16 July 2021
नियति को तैय करने दो वो तुम्हें कहाँ फिट करती है
साहित्यिक स्पंदन सितम्बर 2021 अंक धरोहर विशेषांक गुरु/बाबा आपको समर्पित करने की इच्छा बलवती हुई तो आपसे सम्बंधित संस्मरण, आलेख, आपकी लिखी रचनाओं की समीक्षा इत्यादि आमंत्रित की। आप जान लीजिये.. संस्था के मात्र दो पुरुष रचनाकारों ने श्रम किया तो हम इक्कीस महिला रचनाकारों ने प्रयास किया!
आपको याद है पाँच साल पहले जब संस्था के स्थापना दिवस के दिन केवल महिलाओं की संस्था होने की घोषणा की थी तो आपने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि क्या सृष्टि, सृजन, परिवार, समाज या देश एक लिंग से चल सकता है । क्या आप (तब हम पूरी तरह एक दूसरे से परिचित नहीं थे। हमारी भेंट हुए छः महीने गुजरे थे) गाड़ी एक चक्के से चलाना चाहती हैं ?
तब मैंने जबाब दिया था कि, "क्या करती मैं ? मैं अभियंताओं से परिचित हूँ, मेरे पति महोदय अभियंता हैं और उन्हें हाइकु का मजाक उड़ाने में बहुत आनन्द आता है। वे हाइकु के लिए अनुवादक रखने का सलाह देते हैं तो उनके मित्र भी उनका ही साथ देते हैं। वे तो संस्था सदस्यता से दूर ही भले।"
तो आपने कहा था कि "मैं हूँ न!"
"तो ठीक है । केवल महिलाओं की संस्था नहीं होगी।" मेरे इस घोषणा के बाद गुंजन जी भी अपने को शामिल करने के लिए कहा और सदैव सहायता करने के लिए तैयार रहे। एक समय में संस्था में पुरुष साहित्यकारों की सदस्यता ज्यादा रही । लेकिन... जब भी कोई कार्यक्रम होता महिला साहित्यकारों की ही उपस्थिति ज्यादा होती । बाहर से जो अतिथि साहित्यकार आते वे महिलाओं की ही संस्था मानते। अरे मानते क्या बाहर में चर्चा करते तो महिलाओं की ही संस्था कहते। एक नन्हीं बच्ची की तरह मैं आपके पास ठुनकते हुए शिकायत लेकर पहुँच जाती। आप हँसते हुए कहते "हवा में की गई बातों का पीछा नहीं करते..! जिस संस्था का मैं अभिभावक हूँ वह संस्था केवल महिलाओं की कैसे हो जाएगी? और विश्वास रखो जो जो मुझसे-तुमसे स्नेह रखते हैं , मुझपर-तुमपर विश्वास करते हैं एक दो भी जरूर होंगे जो समय पर तुम्हारे आजूबाजू खड़े मिलेंगे! तुम्हारे धैर्य का मैं सदैव कायल होता हूँ, मेरे सामने भी कमजोर मत पड़ा करो.. !"
आपसे जब भी फोन पर बात होती, हैल्लो कहने और प्रणाम आशीर्वाद के बाद आप मेरा हाल बाद में पूछते पहले संस्था के सभी पुरुष सदस्यों का हाल-चाल पूछते, अभिलाष, रवि, नसीम, राजेन्द्र, संजय सब कैसे हैं ? सब स्वस्थ है न? सबका सृजन खूब फले। तब महिलाओं की जानकारी लेते , अन्त में मेरी बारी आती। वैसे सारा सस्नेहाशीष मेरे हिस्से में ही आता। आप बाखूबी जानते थे, माँ को खुश करने के लिए उसके बच्चों को ज्यादा प्यार दुलार करना पड़ता है। आपकी बहन आपकी सदैव ऋणी है। मेरे इतना कहने पर , भाई बहन में ऋण नहीं चलता आपका कहना, हिसाब बराबर नहीं करता...
Tuesday, 13 July 2021
वीरमणि हेतु प्रतिकार
"लगता है मेरे दिमाग का नस फट जाएगा। जब मुझसे पलटवार करना कठिन हो जाता है तो मेरी स्थिति ऐसी ही हो जाती है।"
"अरे ऐसा क्या हो गया जो तू इतने तनाव में है ! किसी ने कुछ कह दिया क्या। मुझे बताओ कि क्या बात हो गयी ?"
"आज दूसरी बार हमें कहा गया कि हमारे गुरु/अभिभावक/बाबा पंजाब के जड़ थे। वट बिहार को मिल गया।"
"इसमें गलत क्या कहा गया है ? सच्चाई को स्वीकार कर लेना सीख लें।"
"क्या हम इन्सानों के हाथ में कुछ हो पाता है..? सबकुछ वक्त और नियति तय करते हैं..। कहने वाले अपने को बहुत ऊँची चीज साबित करना चाह रहे हैं। यदि हम यह कहें कि उनका नसीब बिहार ले लाया। उस दौरान सभी बातों का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाए तो सत्य विध्वंस दिखलायी देगा।"
"अरे छोड़ो न ! जिसका दाना-पानी जहाँ का लिखा होता है..।"
गुरु/बाबा/अभिभावक का महाप्रयाण हुए तेरह दिन गुजर चुके थे। बेटे-बेटियाँ, शिष्य सभी पितृ-शोक से उबरने के लिए प्रयासरत थे। दो सत्र में शब्दांजली-कार्यक्रम रखा गया था। स्थानीय सशरीर उपस्थिति देने वाले थे तो अस्थानीय गूगल मिट से वर्चुअल। सभी अपने-अपने संस्मरण के संग उनकी ही लिखी रचनाओं का पाठकर श्रद्धांजली दे रहे थे। एक विभा ही थी जो दोनों सत्र में अपनी उपस्थिति निर्धारित की हुई थी। दोनों कार्यक्रमों में और रोती बेटियों को एक ही बात समझाने का प्रयास कर रही थी कि "बाबा/गुरु/अभिभावक कहीं नहीं गए हैं बाहर वालों समझों कि वे बिहार में हैं और बिहार वाले समझें कि वे दिल्ली में हैं। आज टेक्नोलॉजी के उन्नति होने से पल झपकते हम किसी से बात कर लेते हैं। किसी को वीडियो कॉल में देख लेते हैं। जब हमारी शादी हुई थी तो हफ्तों/महीनों एक पत्र की प्रतीक्षा में गुजर जाते थे तो चन्द शब्द पढ़ने को मिलते थे। हम उसी पुराने ज़माने को मान कर चलते हैं।
कविता, ग़ज़ल, हाइकु, तांका, कहानियाँ, उपन्यास के साथ-साथ असंख्य लघुकथाओं के संग आलेख-समीक्षाओं में हमारे सारे प्रश्नों के हल मौजूद हैं। हमारी पीढ़ी तो उसमें ही डूबते-उतराते बाबा/गुरु/अभिभावक की उपस्थिति का अनुभव करते गुजर जाएगी। हमारा अनवरत पढ़ना-लिखना चलता रहे। इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं। हमारे बाद की पीढ़ी जो चाहेगा वह भी पा लेगा। बस! सँजोना ही तो है।"
"आप भुलावे में हैं। आपलोगों के गुरु/बाबा सशरीर जा चुके हैं। आपलोग अब अपने लिखे पर उनसे सुझाव नहीं मांग सकते! उनसे कहा नहीं जा सकता कि आप हमारी त्रुटि बता दें। बाऊ जी जब तक थे आपलोगों ने श्रम कम किया।" बाबा/गुरु के पुत्तर जी ने कहा।
"थोड़ी देर पहले आपने ही कहा था, आपके विचार और बाऊ जी के विचार में बहुत समानता है। लत्तर/बेल सी हम बेटियाँ हमें चिन्ता नहीं । उनकी पगड़ी आपके सिर पर.. ! मैं तो यही कह रही थी कि,"बाबा/गुरु कहीं गए नहीं हैं ! उनकी उपस्थिति को महसूस करना है।"
Monday, 12 July 2021
ज्ञान
लाहौर में जन्मस्थली और पटना में कर्मस्थली बनाये हमारे गुरु/अभिभावक में अनुकरणीय बहुत से गुण हैं... –'जंग जीतने का जज़्बा, –'सब ईश की कृपा मान सहज स्वीकार कर लेना, –'लगातार पढ़ना और लिखना, 【और हाँ! लेखन कार्य करते समय रेडियो से गाने सुनना और टॉफी खाना, (एक बात बताऊँ टॉफी खाते हुए निश्छल शिशु लगते.. वैसी ही सरल मुस्कान चेहरे पर होती है)】, –'समय का पाबन्द होना –'महिलाओं का मन से आदर करना। रक्त से बने जो जिस सम्बन्ध में आती महिला उनको वो आदर मिलना स्वाभाविक है लेकिन रक्त से परे समाज में मिली जिन महिला से जो सम्बन्ध उनके दिल ने स्वीकार किया उसे उस रूप में ही वे स्वीकार करते हैं यानि जिसे शिष्या कहा तो सदैव शिष्या रही, जिसे बिटिया कहा वो एक पिता का प्यार ही पाया.. जिसे बहन कहा उसे कभी गलती से भी दोस्त नहीं कहा हालांकि बहन सच्ची मित्रता निभाई..., जिस महिला को दोस्त कहा , किसी भी दबाव में उसे बहन नहीं कहा।
पुरुषों की गलत बात पर तो थपड़ियाने-धकियाने में सोचते नहीं हैं । लेकिन किसी महिला से नाराज होते नहीं देखा गया। सबसे मज़ेदार बात तब होती है जब भाभी जी (गुरु जी की पत्नी) नाराज़ होती हैं और गुस्से में बोलना शुरू करती तो गुरु जी अपने शर्ट का किनारा पकड़कर फैला लेते हैं जैसे कुछ मांग रहे हों। भाभी जी अकेले बोलते-बोलते जब थक कर चुप हो जाती हैं तो शर्ट को झाड़कर हाथ झाड़ते हुए खिलखिलाने लगते हैं और भाभी जी गुस्सा तो दूर हो ही चुका था। माहौल ऐसा हो जाता है जैसे कुछ देर पहले कोई बात ही नहीं हुई हो गुस्सा दिलाने वाली।
एक बार मैं पूछी थी कि," आप इतनी देर चुप कैसे रह लेते हैं और शर्ट फैलाने का अर्थ क्या है ?"
"अगर मैं चुप नहीं रहूँ तो बहस में बात बिगड़ती जाएगी और रिश्ते में कड़वाहट के सिवा कुछ नहीं बचेगा। मेरी किसी गलती से उसे नाराज होने का पूरा हक है और वो किससे कहेगी..! और वो जो गुस्से में कहती है उसे मैं फैलाये अपने शर्ट में बटोरता जाता हूँ । जो समझने योग्य बात होती है उसे आत्मसात करता जाता हूँ और उस गलती को दोबारा नहीं दोहराने का प्रयास करता हूँ और जो अनर्थक विलाप होता है उसे झाड़ देता हूँ।
मुझे नए-नए सबक मिलते रहे...
२६ अगस्त २०२६
आज ना तो संयुक्त परिवार है और ना सासू जी के नुकीले दाँत बचे हैं- बेटियाँ ससुराल में नहीं रह रही -बेटों का रूप बदला है… समाज में अभी अनेक ऐसे...
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Interesting and Amazing World thank U .... मुझसे बेहतर मुझे , कौन जान सका है …। मेरे बारे कौन , क्या कहता है क्या फर्...
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(1) पीली चुनर ओढ़े हठी धरणी मधुऋतु में ************* (2) षट रागिनी कुहू लगे मन पे कुसुमागम ************* (3) किंशुक छाया वशीभूत अचल...




