Saturday, 18 September 2021

दासता है

 हम 

मातृ, कन्या, बालिका, महिला, बेटी,

वृद्ध के संग हिन्दी दिवस भी मनाते हैं।

विलोपित को याद करते हैं या

सतत विलोपित में सहायक होने का त्योहार मनाते हैं

जिन शब्दों का हिन्दी तथाकथित क्लिष्ट नहीं है

उसका भी आंग्ल प्रयोग करते हैं और 

सामयिक मांग गर्व से कहते हैं।

अधिकांशतः

उपहास उड़ाने वालों को

दर्पण भेंट देना भूल जाते हैं।


हिन्दी के वासी हिन्दी की बधाई देते हैं

इक दिवस की नहीं प्यासी हिन्दी 

आंग्ल की है नहीं न्यासी हिन्दी 

हँसते, रोते हैं कभी हम उदास होते हैं

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।


आंचलिक शब्द हमें रास नहीं आते हैं

हम इन्हें हिन्दी का दुश्मन तलक बताते हैं।

और अंग्रेजी हेतु सूरदास होते हैं

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।


कौन कितना गलत नहीं हमें बहस करनी है।

राष्ट्रभाषा हेतु प्रवाहित समर करनी है।

निर्णीत अपने धर्म का पालन सहर्ष करते हैं,

सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।

Friday, 10 September 2021

कृतघ्न

01. मेघ के स्पर्धा

अभिनय की मुद्रा

हवाई यात्रा

02. हौले से चढ़े

एक-एक सीढ़ियाँ

गुरु का ज्ञान

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"ओ! मिट्टी के लोदा। जितना साल वनवास भोगा गया था न उससे कुछ साल ज्यादा ही लगा था तुम्हें गढ़ने में... वनवास खत्म होते-होते दशहरा दीवाली मनी थी.. तुम से गढ़ने वाले कुम्हार पर कितने आरोप लगाए गए... शिशुपाल की सी हरकत..."

"जिसने गढ़ा था उसने मिटाने की कोशिश भी किया..,"

"धत्त! जिसकी आत्मा मर चुकी हो उसको और कोई क्या मिटा सकेगा...।"

Sunday, 5 September 2021

शिक्षक दिवस की बधाई


#शिक्षक नहीं बनी... अपनी शिक्षा के लिए ऋणी हूँ...
अवसर है बाँटने का

'ज्ञान"

"पिता जी के श्राद्ध के दिवस के लिए मैं इक्कीस पण्डित को न्योता दे आया हूँ.."
"इक्कीस पण्डित से क्या होगा भैया कम से कम इक्यावन पण्डित को बुलाया जाएगा..,"
"यह तो सही नहीं है बुआ...। ग्यारह पण्डित को बुलाना सही होता..., जब एक पण्डित तीन-तीन थाली भोजन लेते हैं तो इक्यावन पण्डित के लिए कितने थाली... "
"यह हमें निर्णय करने दो। बड़ों के बीच में तुम नहीं बोलो। तुमने दुनिया देखी ही कितनी है?"
"हमें दुनिया दिखलाने वाले ने ही बतलाया है कि महाभारत के दौरान, कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुँची तो उन्हें बहुत सारा सोना और गहने दिए गए। कर्ण की आत्मा को कुछ समझ में  नहीं आ रहा था , उसे आहार की आवश्यकता थी।

उन्होंने देवता इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया जा रहा है। तब देवता इंद्र ने कर्ण को बतलाया कि उसने अपने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना दान किया लेकिन अपने पूर्वजों को कभी भी खाना दान नहीं किया। तब कर्ण ने इंद्र से कहा उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे और इसी वजह से वह कभी उन्हें कुछ दान नहीं कर सका।

इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और उसे सोलह दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जिससे वह अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया।"
"तुम्हें सत्य बतलाया गया है। इसलिए तो मैं कह रही हूँ कि ज्यादा से ज्यादा पंडितों को बुलाया जाए..,"
"इसमें दादा को क्या मिलेगा.. दादा को तो वही मिलेगा जो उन्होंने अपने जीवन में...,"

Saturday, 4 September 2021

भाग लें..!

 01. कर्मी बटोरे

तितली के पखौटा

भगौड़ा तम्बू

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02. बैले नृतन

फव्वारा में उछाले

कंधे से सिक्का

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गोरे जेलर ने देखा कि जिस युवक को कल फाँसी दी जाने वाली है उसके चेहरे पर मनोहारी मुस्कान फुट रही है.. और बड़ी आत्मीयता के साथ वह उसका अभिवादन कर रहा है..। जिस दिन से यह सुदर्शन कैदी जेल में आया जेलर के विचार-धारणाओं में क्रांतिकारी परिवर्त्तन होने लगे..। जेलर से रहा नहीं गया उसने पूछ लिया, “तुम इतने प्रसन्न क्यों हो ?” “मैं अगले जन्म की तैयारी में व्यस्त हूँ...!” युवक ने कहा जेलर को आशा थी कि युवक राष्ट्र पर अपने बलिदान के सौभाग्य पर प्रसन्न होगा पर विपरीत उत्तर पाकर कहा, “आज तो हँस रहे हो कल तुम्हारे यही मुस्कुराते होठ मत्यु की कालिमा से काले पड़ जायेंगे..,” फाँसी के तख्ते पर जब युवक को खड़ा किया गया और जल्लाद ने गले में रस्सी के फन्दे को डाला तो उसने मुस्कराकर पूछा- ‘क्या यह रस्सी थोड़ी मुलायम नहीं हो सकती थी? बड़ी खुरदरी और कड़ी है गर्दन में लगती है, भाई!’ युवक को मिले फाँसी के बाद जेलर ने चेहरा देखा ... युवक के चेहरे पर वही अमर मुस्कान बिखरी हुई थी..। मत्यु की कालिमा का कोई चिह्न वीर के शरीर पर नहीं था...। फाँसी के बाद शहीद का शव लेने आये बड़े भाई की रुलाई नहीं थम रही थी ...। गोरे जेलर ने उनकी पीठ को थपथपाते हुए कहा, आप रोते क्यों हैं जिस देश में ऐसे वीर पैदा होते हैं वह देश धन्य है मरेंगे तो सभी .., अमर होकर कौन आया है पर आपके भाई जैसे भाग्यवान कितने होते हैं ...?” सबने विस्मय से देखा गोरा अधिकारी स्वयं रो रहा था जैसे उसका अपना भाई दिवंगत हो गया हो ...। बड़े भाई ने शहीद के मुख पर से कम्बल हटाया तो देखा कि उनके शहीद भाई उन रोने वालों पर हँस रहे थे...। तालियों के शोर के बीच मंच से माइक पर नाट्य प्रस्तुति के संचालक बता रहे थे, "हम सभी अभी देख रहे थे वीर क्रांतिकारी शहीद कन्हाई दत्त की कथा पर नाट्य प्रस्तुति...। मैं बेहद शर्मिंदा हूँ कि मुझे वीर क्रांतिकारी शहीद कन्हाई दत्त के बारे में पहले से पता नहीं था ...। उनके रूप का अभिनय करने वाले छात्र ने ही हमें बताया और विदेशों में निवास करने वालों के संग पूरे देश में स्वतन्त्रता दिवस का अमृतोत्सव हर्षोल्लास से मनाया जाने के क्रम में नाट्य प्रस्तुति देने का प्रस्ताव रखा।” दर्शक दीर्घा में उपस्थित अभिनय करने वाले के माता-पिता को अपने कानों से सुनी और आँखों देखी बात पर विश्वास करने में असमर्थता हो रही थी ...। माता को निंदा रस में बड़ा मजा आता था जिसके कारण कुछ महीनों पहले तक पुत्र के चुगलखोरी की आदत के कारण रिश्तेदारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ रहा था वो आदत छूट रही थी..."अजी! हमारे बेटे ने कब दिशा बदल ली और सही के रेस में शामिल हो गया यह हमें पता भी नहीं चल पाया..!" माता ने पिता से कहा। "मैं तुम्हें सदा कहता था.. हमारे बच्चों का नजरिया बिगड़ने लगेगा वो सच को अनदेखा करना सीख जाएंगे.. । चुगलखोरी उसको बेसिर पैर की बातें बनाना सिखा देगी...। यह बहुत ही जोखिम भरा स्वभाव है जो बच्चे में तब ही विकसित होता है जब माता या पिता उसमें रूचि लेते हैं, क्योंकि उनके द्वारा बताई जानेवाली ख़बरों का अंदाज बहुत ही रोचक होता है। भले ही आधार ख़ुद बच्चे को भी मालूम नहीं होता..। ऐसी बातों को अहमियत न दो..। वरना हमारे बच्चों के सोचने का तरीका बेढंगा होता जाएगा और उनका भविष्य अंधकारमय होता चला जायेगा। बालमन बहुत ही उत्सुक हुआ करता है। अक्सर बच्चों की आदत होती ही है कि वे अपने तथा औरों के घर की बातें आते-जाते कान लगाकर सुनने की कोशिश करते हैं। ऐसे में हमें प्रयास करना चाहिए कि हम जब भी कोई ऐसी बात कर रहे हों तो सामान्य बनकर करें ताकि बच्चों में कान लगाने वाली आदत विकसित न हो सके। जब माता का ही अपनी भावनाओं पर कोई काबू नहीं हो और हमेशा आक्रोश में आकर बगैर कुछ सोचे समझे अडो़स -पड़ोस, नाते रिश्तेदारों की बातें बच्चों के सामने बेहिचक कर देती हो...। माता की बातें सुनकर उसके बच्चों के मन में भी संबंधित व्यक्ति के लिए बहुत ही गलत भावना पैदा होने लगती है और सामाजिक- पारिवारिक उत्सवों में बच्चे उस रिश्तेदार की बहुत सारी चुगली खुलेआम कर देते हैं.. माता पिता और वहाँ उपस्थित बाकी सब भी हक्के -बक्के से रह जाते हैं कि बच्चों के मुख से ऐसी बातें आखिर निकलीं भी तो निकली कैसे .. जो तुम्हारे कारण हमारे कन्हैया में आदत बनती रही..।" एक बार फिर पिता अपनी बात रखने का प्रयास किया। "कुछ दिनों पहले तक जो विद्यार्थी पूरे विद्यालय के लिए सिरदर्द बना हुआ था आज अपने कक्षा का सिरमौर हो गया है। संयोग देखिए इसका नाम भी कन्हैया है..," "हमें क्रांतिकारी कन्हाई लाल दत्त के बारे में विस्तार से जानकारी उपलब्ध करायी जाए.., पत्रकार दीर्घा से स्वर गूँजा। "यह अकाट्य सत्य है कि सर्वप्रथम अंग्रेजों ने बंगाल में ही अपने चरण रखे। उसी भूमि पर शक्ति अर्जित कर सारे भारतवर्ष पर शासन चलाया, उसे सुदृढ़ किया अर्थात् बंगाल से ही उनके स्वर्णिम स्वप्न साकार हुए।बंगालियों ने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी शिक्षा, वेश-भूषा, रहन-सहन और उनकी संस्कृति की नकल करते हुए स्वयं में परिवर्तन किये। अंग्रेजों के सहयोगी, वफादार और नौकरियों में भद्र बंगाली पुरुष ही अधिक हुए। इसी प्रकार जब अंग्रेजी राज्य की जड़ें उखाड़ फेंकने की इच्छा जाग्रत हुई तो यह भी सत्य है कि बंगाल के लोगों ने ही बगावत का बिगुल बजाया, गोरी सरकार की जड़ों को समूल नष्ट करने के लिए सर्वप्रथम बंगालिगों ने ही हथियार उठाकर चलायी। सन् 1888 के 30 अगस्त कन्हाई लाल दत्त का जन्म कृष्णाष्टमी की काली अधेरी रात में अपने मामा के घर चन्दनंनगर में हुआ था, कदाचित् इसी से उनका नाम कन्हाई पड़ा हो। यद्यपि उनका आरम्भिक नाम सर्वतोष था। चन्दन नगर तब फ्रांसीसी उपनिवेश था। वास्तव में तो उनका पैत्रिक घर बंगाल के ही श्रीरामपुर में था। कन्हाई जब चार वर्ष के थे तब उनके पिता उनको लेकर बम्बई चले गये थे। पाँच वर्ष बम्बई में रहने के बाद नौ वर्ष की आयु में वह वापस चन्दन नगर आ गये थे और वही उनकी प्रारम्भिक से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हुई। चन्दन नगर के डुप्ले कालेज से उन्होंने स्नातक की परीक्षा दी थी। उसी कालेज के एक प्राध्यापक चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण कन्हाई को क्रान्ति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था। चन्दन नगर में सर्वप्रथम क्रान्ति की योजना बनाने वाले थे - संध्या के सम्पादक ब्रम्हबाधव उपाध्याय। कन्हाई उनके सम्पर्क में भी अपने प्राध्यापक के माध्यम से ही आये थे। स्नातक की परीक्षा देने के उपरांत कन्हाई कलकत्ता आ गये और युगांतर कार्यालय में कार्य करने लगे। कलकत्ता की अनुशीलन समिति से जब उनका सम्पर्क हो गया तो न केवल वह उसके सदस्य बने अपितु उन्होंने अपने घर ही उसकी एक शाखा भी स्थापित की तथा बाद में अपने क्षेत्र में पाँच अन्य शाखाओं की भी स्थापना की थी। इन शाखाओं में व्यायाम तथा लाठी आदि चलाने की शिक्षा दी जाती थी। बाहर से देखकर उन्हें कोई भी विप्लवी समिति की शाखा नहीं समझ सकता था। स्वयं कन्हाई ने विप्लवी बनने की दीक्षा अमावस्या की रात्री में एक वटवृक्ष के तले ली थी। खुदीराम बोस द्वारा किये गये मुजफ्फरपुर बम काण्ड के उपरान्त अंग्रेजी राज्य की रातों की नीद हराम हो गयी थी। सारा अंग्रेजी शासन चौकन्ना हो गया था। चारो ओर संदिग्ध लोगो की खोज आरम्भ कर दी गयी थी। खूब दौड़-धूप के बाद पुलिस को पता चला कि इन क्रान्तिकारियो का अड्डा मानिकतल्ला के एक बगीचे में है। यह बगीचा अरविन्द घोष के भाई सिविल सर्जन डाक्टर वारीन्द्र घोष का था। गुप्तचर विभाग वह से क्रान्तिकारियो की गतिविधि पर दृष्टि रखने लगे। दुर्भाग्य से क्रान्तिकारी गुप्तचर विभाग की इस कारस्तानी से सर्वथा अनभिज्ञ रहे। इसका परिणाम क्रान्तिकारियों के लिए भारी संकटकारी साबित हुआ। गुप्तचर विभाग को इससे सफलता मिली और उसने देश के सर्वप्रथम बम षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया। इसमें बगीचे के मालिक वारींद्र घोष उनके भाई अरविन्द घोष , नलिनी कन्हाई लाल दत्त समेत लगभग 35 देशभक्त लोगो को बन्दी बनाने में पुलिस सफल हो गयी। इन सब बन्दियो को अलीपुर कारागार में रखा गया था और वही पर इन क्रान्तिकारियो पर अभियोग चलाया गया। इसी कारण इस अभियोग का नाम अलीपुर षड्यंत्र रखा गया था। कन्हाई लाल दत्त के साथ-साथ उसके प्रेरक प्रोफ़ेसर चारु चन्द्र राय भी बन्दी बनाये गये थे। सब पर अभियोग चला किन्तु चारू चन्द्र राय को फ्रांसीसी सरकार की बस्ती का नागरिक होने के कारण रिहा कर दिया गया। अलीपुर अभियोग में भी नरेन्द्र गोस्वामी नामक का एक व्यक्ति भी बन्दी बनाया गया था जिसने सरकारी गवाह बनना स्वीकार कर लिया। उसके इस देशद्रोह से क्रान्तिकारियो के रहे-सहे प्रयत्नों पर पर पानी फिर जाने की आशंका होने लगी। यद्यपि नरेन्द्र के इस कुकृत्य की देशभक्त समुदाय द्वारा चारो ओर भर्त्सना होती रही किन्तु इससे अभियोग में तो किसी प्रकार की सहायता मिलने की संभावना थी ही नहीं। यहाँ तक की अभियोग के दौरान ही एक दिन भरी अदालत में किसी अभियुक्त ने उसको लात तक मार दी थी। उसका परिणाम यह हुआ कि एक तो वह इन बन्दियो के सामने आने से सदा बचता रहा और दूसरे सरकार ने भी उसके लिए सुरक्षा की व्यवस्था कर दी। उसको दो सरकारी अंगरक्षक दिए गये। अब जेल में ही कन्हाई लाल दत्त और सत्येन्द्र बसु ने इस देशद्रोही को सबक सिखाने की एक अदभुत योजना बना डाली। उन्होंने निश्चय किया कि नरेंद्र अपना ब्यान पूरा करे उससे पूर्व ही उसको इस संसार से प्रयाण कर लेना चाहिए। कन्हाई लाल दत्त और सत्येन्द्र की बुद्धि निरंतर कार्य कर रही थी। उन्होंने सबसे पहले जेल के वार्डन से घनिष्टता बढाई उन्हें बहुत हद तक प्रभावित कर लिया। उसके फलस्वरूप जेल के भीतर लाये जाने वाले कटहल- मछली के भीतर रखी दो पिस्तौल को प्राप्त करने में वो सफल हो गये। उसमें किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं हुई। वे पिस्तौल किन वाडरो द्वारा आयोजित किये गये और किसने बाहर से भेजे थी , इस तथ्य को बाह्य जगत कभी नहीं जान पाया। सितम्बर माह की तिथि निकट आ गयी जिस तिथि को नरेन्द्र को अपना वक्तव्य देना निर्धारित किया गया था। नरेन्द्र नियमित रूप से प्रतिदिन सत्येन्द्र और कन्हाई लाल के पास मिलने के लिए आता था। 31 अगस्त 1908 के दिन भी वह अपने समय पर उनके पास आया। तभी सत्येन्द्र ने अपने सिरहाने रखी पिस्तौल से नरेन्द्र पर वार किया गोली उसके पैर में लगी किन्तु वह उससे गिरा नही। सत्येन्द्र ने तभी दूसरी गोली चलाई तब तक नरेन्द्र भागने लगा था। सत्येन्द्र और कन्हाई दोनों ने उसके निकट पहुँचकर उसे गोलियों से छलनी कर दिया। कन्हाई को 10 नवम्बर 1908 को फांसी देने का दिन तय किया गया। क्रांतिकारी कन्हाई की कथा पर नाट्यप्रस्तुति की तैयारी करते समय इस चुगलखोर कन्हैया की आदतें परिवर्त्तनशील हो सकीं। अपनी अक्षम्य गलतियों के लिए आप सभी से क्षमा याचना करता हूँ।"

Wednesday, 25 August 2021

जंग

     अनेकानेक सृजक जुगनुओं को तैयार कर चुके वरिष्ठ साहित्यकार की अचानक अन्तिम यात्रा शुरू हो गयी...। साहित्य जगत अनहद तम घिर जाने की कल्पना से भयभीत हो उठा। सन्ध्या में सूर्यास्त एक पक्षीय दृष्टिकोण है। मोक्ष जीवन सन्ध्या का सत्य सदैव स्वीकार नहीं हो पाता है। श्रद्धांजली-शब्दांजली का दौर शुरू हो गया। एक संस्था ने श्रद्धांजली सभा एक अन्य के जयंती सभा के संग रखी। पुष्पांजली के लिए तस्वीर और बैनर केवल जयंती वाले का रहा। एक अन्य गोष्ठी में किसी ने कहा, -"मैं उनसे लगभग चालीस-पैतालीस सालों से जुड़ा हुआ था। अपने सारे दुःख उनसे साझा करता था और उसका निदान पा भी लेता था।" ये वो महाशय थे जो गुरू के नाम को कैश करते रहे... । अन्तर होता है अपने दुःख साझा कर लेना और सामने वाले के दुःख को समझ लेना.. । हमारी साँसों तक सूर्य का अस्त होना सम्भव नहीं होगा ख़ुद से वादा तो कर लें... । मैं से मैं
"गुरु जी ! क्या आप अपना निवास स्थान बदल रहे हैं ?
"निवास स्थान बदल नहीं रहा हूँ स्थायी रूप से अब यह शहर ही छोड़ कर जा रहा हूँ..!"
"उस बच्ची का क्या होगा जिसे आप निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं ?"
"वो बच्ची प्रतियोगिता जीत कर पुलिस बन गयी और दूसरे शहर में नियुक्त हो गयी..!"
"किलकारी के बच्चों-बच्चियों का साहित्यिक भविष्य अंधकारमय दिखलाई पड़ रहा है मुझे..,"
"उनकी मुझे बिलकुल चिन्ता नहीं, क्योंकि मेरा योग्य शागिर्द वादा किया है कि उनका साहित्यिक लेखन निर्बाध्य रूप से प्रगति करता रहे इसकी जिम्मेदारी निभाएगा।
"आप कई संस्थाओं के अध्यक्ष-अभिभावक हैं उनका तो निश्चिंत बेड़ा गर्क हो जाएगा !"
"उन संस्थाओं में अध्यक्ष से ज्यादा मजबूत कन्धे और इरादों वाले सदस्य और सचिव हैं... सैलाब नहीं आने देंगे.."
यूँ तो गुरु जी प्रत्येक पर्व-त्योहार में अपने बच्चों के पास चले जाते थे। फोन पर बात करते समय उनके आस-पास वो शान्ति समझ में नहीं आती थी जिनकी वे चाहत प्रकट करते थे।
 गुरु जी अक्सर कहा करते थे कि उनका जी अब केवल लिखने-पढ़ने में लगता है। बगल में रेडियो बजता रहे और कुछ टॉफियाँ पास में हो तथा बीच-बीच में चाय मिलती रहे। अब स्थायी रूप से शहर छोड़ने की बात सुनकर एकता विचलित थी। गुरु जी को रोकने का असफल प्रयास कर रही थी क्यों कि उन्होंने कहा कि अब बच्चे चाहते है कि डैडी उनके साथ रहें। आखिर आत्मज और खून का रिश्ते का पलड़ा भारी होता दिखलाई दे रहा था। अभी तक जिन्हें केवल पैसों से मतलब रहा और शिकवा कि हमारे लिए किया ही क्या है। सारी जिन्दगी तो समाज हेतु साहित्य में डूबे रहे। अब तो सेवा की जरूरत है तो
कर्मस्थली ने एक ही लेखनी को शिक्षक, लेखक, समीक्षक, प्रकाशक, सम्पादक, पथ प्रदर्शक बना डाला। लघुकथा नगर, महेन्द्रू पटना यह पता रहा एक लम्बे अर्से तक। कोई मकान नम्बर नहीं , कोई गली नम्बर नहीं, बस लघुकथा नगर। यह एक ऐसे आदमी का पता रहा है , जो लघुकथा में ही जागता, लघुकथा में ही स्वप्न देखता। ओढ़ना बिछाना लघुकथा ही रह। यह लघुकथा का वह सूत्रधार रहा , जिससे भारत भर के लघुकथाकार, समीक्षक, समर्थक, स्थापित साहित्यकार, नवोदित रचनाकार, राजनेता, पत्रकार, सभी जुड़े हुए रहे। आजीवन लेखन का जज़्बा एक ही रफ्तार से कायम रहा। जन्मस्थली देश बँटवारा के कारण छूट गया और कर्मस्थली उम्र ढ़लने के बाद अस्वस्थ्यता के कारण। हजारों लेखक उनका सानिध्य चाहते थे। लेकिन सात बेटियों के संग पला इकलौता बेटा अपने पिता से आजीवन विरक्त रहा। कर्मस्थली पर कभी नहीं ही दिखलाई दिया। कर्मस्थली छोड़ने के बाद मात्र आठ महीने के जीवन काल में यानि बरगद के ध्वस्त होते समय भी झलक पाने नहीं आया। पिता को प्रतिपल अपने पुत्र की प्रतीक्षा रह गयी। नाती मुखाग्नि दिया..। बेटियाँ सेवा से लेकर श्राद्धकर्म की तैयारी कीं। धीरे-धीरे पुत्र की अभिलाषा खत्म हो जाएगी।
यूँ तो वर्षों से अपने पुत्र और पोते को हर बात में याद करते थे लेकिन जबसे रामरतन बीमार पड़े तबसे नाती और बेटी से बार-बार फोन कर बुलाने के लिए कहते। बेटी फोन करती लेकिन उसका फोन कोई उठाता ही नहीं। रटते-रटते रामरतन अन्तिम यात्रा पर निकल गए। सात बहनों का इकलौता भाई ना तो बहनों के गले लग दिलासा देने आया और ना अन्धी माँ का सहारा देने आया। जब बेटा ही नहीं आया तो बुआ-चाचा-मामा क्या आते..! एक दूसरे को दिलासा देती बहनें खुद को ज्यादा समझाती, –"चार दिन बाद उसकी बेटी की शादी है भला कैसे आ पाता..!"
–"हाँ! तुम ठीक कह रही हो। लड़की की शादी दस तरह का डर लगा रहता है।"
–"दिन बढ़ाने पर कहीं लड़के वाले किसी तरह का बहाना बनाकर इन्कार कर देते तो...,"
–"मरनी पर सात पुश्तों को हड्डी का छूत लगता है दीदी..! भला लड़के वाले ऐसे घर में पानी कैसे पीने आयेंगे?" घर की सहायिका से बर्दाश्त नहीं हो सका तो वह उबल ही पड़ी।
–"तुमको इससे क्या लेना-देना? तुम अपने काम से मतलब रखो। घर के मामले में मत बोलो। तुम क्या जानों समय बदल गया है। अब ऐसी रूढ़ि परम्परा की बातों को आधुनिक लोग नहीं मानते हैं..! " कई बहनें एक साथ बोल पड़ीं।
–सच में मुझे क्या मतलब दीदी। लेकिन कह देते हैं कहीं आगे पछताना ना पड़े। अभी कहीं यह बात लड़के वालों से छुपा लिया हो। समाज कितना भी आधुनिक हो जाये। मरनी में पूजा-पाठ नहीं होता तो शादी-ब्याह... तौबा-तौबा...!"

Tuesday, 24 August 2021

उऋण

"कन्यादान कौन करेगा..?" नेहा और नितिन की शादी के समय पण्डित जी ने कहा। दोनों की शादी मन्दिर में हो रही थी..।

"आप अनुमति दें तो मेरा दोस्त दीपेन कन्यादान करना चाहता है और वह अपनी पत्नी के साथ यहाँ उपस्थित भी है..। सामने आ जाओ दीपेन..," वर नितिन ने कहा। 

सबके सामने दीपेन के आते ही उपस्थित लोगों में खलबली मच गयी। दबे आवाज में कानाफूसी शुरू हो गयी तथा वधू नेहा और उसकी माँ भौंचक दिख रहे थे। क्योंकि दीपेन और नेहा एक दूसरे के जेरोक्स कॉपी लग रहे थे।

"यह तुम्हारा ही अंश है देवकी... जो हमें तुम्हारे सेरोगेट मदर के रूप से दान में मिल गया था..," दीपेन की माँ यशोदा ने कहा।


स्वसा के आँसू

मौली को गीला करे

श्रावणी पूनो


पहला तारा

कौन जलाने उठे

 साझे का चूल्हा!

Friday, 20 August 2021

स्वाश्रय का सुख

 


"इस साल भी मामा दादा की कलाई सूनी रह जायेगी दादी माँ..! पिछले साल नहीं भेज पाने का कारण समझ रहा था, लेकिन इस साल भी...?" पोता सुयश ने पूछ लिया।

"राखी से भाईयों की कलाई कब से सजने लगी होगी क्या तुम मुझे इसका इतिहास बता सकते हो ?" दादी ने कहा।

"जी अवश्य! मार्च 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चितौड़ के नाराज सामंतो के कहने पर चित्तौड़ के शासक महाराणा विक्रमादित्य को कमजोर समझकर उनके राज्‍य पर आक्रमण कर दिया था। राजमाता कर्णावती को जब यह पता चला तो वे चिंतित हो गईं। उन्‍हें पता था कि उनके राज्‍य की रक्षा केवल हूमायूं कर सकता है। इसलिए मेवाड़ की लाज बचाने के लिए उन्होने मुगल साम्राट हुमायूं को राखी भेजी और सहायाता मांगी।

राज्य पर संकट मुसीबत से निपटने के लिए कर्णावती ने सेठ पद्मशाह के हाथों हुमायूं को राखी भेजी थी। राखी के साथ कर्णावती ने एक संदेश भी भेजा था। उन्‍होंने सहायता का अनुरोध करते कहा था कि मैं आपको भाई मानकर ये राखी भेज रही हूँ।..,"

"हुन्ह्ह्! मेवाड़ की लाज बचाने के लिए...। आज चार सौ सत्तासी साल के बाद भी कन्याओं की लाज बचाने की गुहार जारी है..।" सुयश की बात पूरी होने के पहले ही दादी ने कहा।

"इससे और आपके राखी नहीं भेजने में क्या सम्बंध है दादी माँ?" सुयश ने कहा

"उन्हें मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त करने का संदेश भेज रही हूँ!मेरी माँ अपने भाई को राखी कभी नहीं बाँधा। पण्डित जी से राखी लेकर अपने सिंहोरा में लपेट दिया करती थीं। सुयश तुम मेरा साथ देना ...!"

"जी अवश्य दादी माँ!" सुयश ने कहा

"जब तक हुमायूं अपनी सेना लेकर मेवाड़ पहुँचे, रानी कर्णावती का जौहर हो चुका था। आज तक कन्याओं का गुहार लगाना जारी है। इस साल से मैं भी भैया को राखी नहीं बाँधूगी...!" पोती सुमन का दृढ़ निश्चयी स्वर गूँजा।

"स्त्रियों को वल्लरी बनने के नसीब को बदलकर बरगद बनना तय करना होगा...।" पोता-पोती को अपने बाँहों में समेटते हुए दादी ने कहा।



Tuesday, 17 August 2021

"सुरक्षा कवच"

"तुम मेरे पैंट के पॉकेट से रुपया निकाली हो क्या?" श्यामलाल ने अपनी पत्नी रुक्मिणी से पूछा।

"नहीं तो ! क्यों कितना निकला हुआ है?" रुक्मणी ने सवाल किया ।
"कुछ खुदरा निकला हुआ है। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।" श्यामलाल ने कहा।
"मैंने मना किया था कि बच्चों का नामांकन अंग्रेजी स्कूल में नहीं करवाइए...। उड़ती-उड़ती कई खबरें फैली हुई हैं।" रुक्मणी ने कहा।
"मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और मैकोले का प्रसिद्ध मुहावरा बना, कि 'जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी..।" रुक्मणी ने पुनः कहा।
शाम में जब श्यामलाल अपने दोनों बच्चे जो नौंवी और दसवीं के विद्यार्थी थे को पढ़ाने बैठे तो गाँधी जी का बीड़ी पीने की लत के कारण नौकर की जेब में पड़े दो-चार पैसों में से एकाध पैसा चुरा लेने की आदत और उस लत और आदत के कारण आत्महत्या करने का फैसला करने। पर आत्महत्या कैसे करें? अगर तुरन्त ही मृत्यु न हुई तो क्या होगा? मरने से लाभ क्या? क्यों न ये सब सह ही लिया जाए? ऐसे उलझनों में फँस कर फिर बीड़ी पीना छोड़ देना। यानि नौकर के पैसे चुराकर बीड़ी खरीदने और फूंकने की आदत भूल गए वाले प्रसंग को पढ़ने के लिए कहा।
रात्रि भोजन के बाद श्यामलाल जब सोने गए उन्हें अपने बिस्तर पर एक चिट्ठी मिली..,
पूज्य पिता जी
मैं बेहद शर्मिन्दा हूँ। आज आपको मेरी वजह से लज्जित होना पड़ा। आगे प्रयास करूँगा कि ऐसा मौका दोबारा ना आये। आप आम का वृक्ष लगा रहे हैं , आपको बबूल का काँटा ना मिले। भविष्य में शायद गर्व करने लायक पुत्र बन सकूँ। तब आप मुझे क्षमा कर देंगे न?
              
                                                 आपका अपराधी

उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आँखों से निकली धारा से चिट्ठी भीग गई। उन्होंने क्षणभर के लिए आँखें मूंदी, चिट्ठी फाड़ डाली और देर रात बच्चों के सर को सहलाकर अपने कमरे में आकर चैन से सो गए। अब वे बच्चों के प्रति आश्वस्त लग रहे थे।

'अन्त भला तो...'

"नमस्ते आँटी जी!"

मैं बुटीक में अपने कपड़े पसन्द कर रही थी कि लगा किसी ने मुझे ही सम्बोधित किया है। आवाज की दिशा में देखा तो एक प्यारी सी युवती मुझे देखकर दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुरा रही थी। लेकिन उसकी मुस्कान और आँखें निश्चेत लगीं।

"खुश रहो सुमन! कैसी हो और क्या कर रही हो आजकल?" मैंने पूछा।

"ठीक हूँ आँटी जी। अभी कुछ नहीं कर रही हूँ।" सुमन ने कहा। उसकी आँखें नम हो रही थीं।

"अब अपने माता पिता को रजामंदी दे दो कि वे तुम्हारी शादी कर दें।"

".....!" सुमन की चुप्पी 'कोई रहस्य है' उगल रही थी।

"आपके सिखाये कटाई और सिलाई और बैंक से आपके ही मदद से मिल गए कर्ज से सुमन ने अपना दूकान खोल ली थी...।"

कुछ वर्ष पहले मैं मुफ्त में कढ़ाई, सिलाई , स्टोन से ज्वेलरी बनाना सिखाया करती थी। उसी दौरान अपने कुछ सहेलियों के संग सुमन मेरे पास सीखने आया करती थी... ।

अचानक एक दिन वह मुझसे बोली कि "आँटी जी! मेरी शादी तय हो गयी है। कल से मैं नहीं आऊँगी।"

"शादी! तुम्हारी शादी.. अभी तो तुम सातवीं में पढ़ रही हो। कोई कैसे कर सकता है तुम्हारी शादी? 18 साल से कम उम्र की कन्या की शादी करना गलत है। सबको सज़ा हो जाएगी।"

"आँटी जी! इस राज्य में शराब बन्दी है..। मेरे गाँव में चलकर देखिए हर दूसरे घर में शराब बनता है।" सुमन ने कहा।

दूसरे दिन सुमन नहीं आयी। मैं उसकी सहेली के संग उसके घर जाकर उसके माता-पिता को समझाने की कोशिश की तो पता चला कि उसके दादा अपनी पोती की शादी करना चाहते हैं ।

मैं दादा को समझाने का प्रयास की कि "कच्ची उम्र में विवाह के कारण लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का अधिक सामना करना पड़ता है। लड़के और लड़कियों दोनों पर शारीरिक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है...।

 वैदिक काल में बाल विवाह का कोई संकेत नहीं मिलता हैं... मध्यकाल के आते-आते जब भारत बाहरी आक्रमणों को झेल रहा था तब बेटियों को विदेशी शासक भोग की वस्तु समझकर अपहरण कर ले जाते तथा उनके साथ सम्बन्ध बना लेते थे... इसी दौर में रोटी-बेटी की कुप्रथा का प्रचलन हो गया..। छोटी उम्र में विवाह हो जाने के कारण दहेज भी कम देना पड़ता था... , आपके साथ तो ऐसी कोई समस्या नहीं। मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं केस दर्ज कर गवाह बनूँगी...।" उस समय शादी टल गयी... ।

"पिछले साल सुमन की शादी हुई और शादी के कुछ दिनों के बाद ही विधवा हो गयी। ससुराल से अपशगुनी बना बेदखल कर दी गयी..," सुमन की सहेली बता रही थी।

   मैं अमेरिका छः महीने के लिए गयी थी लेकिन वैश्विक युद्ध के कारण पटना वापिस आने में पन्द्रह महीने गुजर गए ...। यहाँ मेरी जिम्मेदारी प्रतीक्षा कर रही थी। मैं सुमन के साथ उसके घर गयी उसके माता-पिता से मिलने। इस बार दादा की जगह पिता अड़ियल लग रहे थे। मैं उनको समझाने का प्रयास किया कि, "विद्यासागर को ग़रीब और आम विधवाओं की व्यथाओं ने प्रभावित किया और उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ़ जंग छेड़ दी। इसके लिए उन्होंने संस्कृत कॉलेज के अपने दफ़्तर में न जाने कितने दिन-रात बिना सोये निकाले ताकि वे शास्त्रों में विधवा-विवाह के समर्थन में कुछ ढूंढ सके।

आख़िरकार उन्हें ‘पराशर संहिता’ में वह तर्क मिला जो कहता था कि ‘विधवा-विवाह धर्मवैधानिक है’! इसी तर्क के आधार पर उन्होंने हिन्दू विधवा-पुनर्विवाह एक्ट की नींव रखी। 19 जुलाई 1856 को यह कानून पास हुआ और 7 दिसंबर 1856 को देश का पहला कानूनन और विधिवत विधवा-विवाह हुआ। कहा जाता है कि जिन भी विधवा लड़कियों की शादी वे करवाते थे, फेरों की साड़ी भी वही उपहार स्वरुप देते थे।

बताया जाता है कि शांतिपुर के साड़ी बुनकरों ने विद्यासागर के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए साड़ियों पर बंगाली में कविता बुनना शुरू किया था,

“बेचे थाको विद्यासागर चिरजीबी होए”

(जीते रहो विद्यासागर, चिरंजीवी हो! )

भले ही, इतिहास इस विधवा-पुनर्विवाह पर मौन रहा लेकिन यह शादी पूरे भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। उन क्रांतिकारी कदम के पदचिन्हों पर आप अपने कदम बढ़ाएं और सुमन की पुर्नविवाह करने का प्रयास करें...।"

"सुमन के किस्मत में विवाह का सुख लिखा होता तो यह विधवा ही नहीं होती...," सुमन के माता-पिता एक ही बात तोता की तरह रट रहे थे...।

मैं भी ठान ली कि सुमन को मुरझाने नहीं देना है...और मैं भी लगातार तरह-तरह की दलीलें देती रही और किरण फूटने के साथ सुमन के पुर्नविवाह का निर्णय नया उजाला फैला गया।

पत्थर भले आखरी चोट से टूटता है... परन्तु पहली चोट कभी व्यर्थ नहीं जाती है...।

Friday, 6 August 2021

सहभागिता

विद्यालय से लौटी बिटिया को सजाने-सँवारने के लिए हरी चूड़ी, हरा रिबन, हरी बिन्दी, हरा फ्रॉक लेकर बैठी लक्ष्मी बार-बार अपनी मुनिया को पुकार रही थी। मुनिया होमवर्क करने में उलझी हुई बार-बार, "आई माँ! आई माँ!" कहती हुई आखिर में आ गयी। 

"यह समान कहाँ से आया माँ?" मुनिया ने कहा।

"आज मुझे मजदूरी ज्यादा देर की मिली मुनिया।" माँ लक्ष्मी ने कहा।

"मेरे पास किताब नहीं होने की वजह से मुझे कक्षा के बाहर धूप-बारिश में खड़ा रहना पड़ा माँ..! सियार के बियाह का आनन्द ली..!"

"आज के बाद कक्षा में केवल पढ़ाई करना मुनिया। ले मैं तेरा किताब लेकर आया हूँ।" मुनिया का पिता ने कहा।

Wednesday, 4 August 2021

बिना_वर्दी_का_योद्धा

"मुझे नहीं पता था कि मेरे घर में भी विभीषण पैदा हो गया है..," सलाखों के पीछे से गुर्राता हुआ पिता अपने बेटे का गर्दन पकड़े चिल्ला रहा था।

"बड़े निर्लज्ज पिता हो। जिस पुत्र पर गर्व होना चाहिए उसको तुम मार देना चाहते हो...," पिता के हाथों से पुत्र का गर्दन छुड़ाता हुआ पुलिसकर्मी ने कहा।

"क्या करता मैं .. आप माँ की विनती सुने नहीं उलटा उन्हें कमरे में कैद कर दिया और कांवड़ियों की टोली बनाकर जल उठाने चले गए।"

"सावन में जलाभिषेक करना हम हिन्दुओं का धर्म भी है और अधिकार भी।" पिता पुनः चिल्लाया।

"और इस वैश्विक युद्ध में समाज हित के लिए सरकार द्वारा बनाई गई नीति...? क्या सीमा पर लड़ रहे फौजी का ही दायित्व है...?" पुत्र ने कहा।

"तुम्हें और तुम्हारे साथियों को तो जो सजा होगी सो होगी..., तुम्हारे पोशाक बनाने वालों का बेड़ा गर्क हो गया।" पुलिसकर्मियों के ठहाके गूँजने लगे। □

बोझ/कल्पना/मृगतृष्णा?

26-07-2026 2+6+0+7+2+0+2+6=25 2+5=7 प्रदर्शनी का आख़िरी दिन, आज सभागार के बीच में चित्रकार ने एक बड़ा-सा दर्पण रख दिया था- भीड़ उसके सामने ज...