Friday, 15 May 2020

अडिग



Write a 5 Lines Story this week ❤

लेखन कार्य करना है 5 पंक्तियों में एक कहानी.., दी गई तस्वीर से जुड़ी।

7 Best Stories को किया जायेगा स्पेशल फीचर इस रविवार  🙂

अपने किन्ही 5 दोस्तों को फेसबुक पर भी टैग करें।

नीरजा कृष्णा , पटना

–आदरणीया  Nirja Krishna जी
🤔सिर्फ 5 को टैग करना असंभव तो है अतः जिन्हें #टैग करवाने की #इच्छा हो उनका #स्वागत है

#5LinesStory
#ThePinkComrade

मेरी_पाँच_पँक्तियों_की_कहानी_कुछ_यों_चली

01. पँक्ति_एक :–,-शेर-ए-कश्मीर इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस से अंतिम परीक्षा देकर शुचिता घर वापिस आई तो फिर उस पहाड़ी शहर में साल भर के बाद ही चिकित्सक बनकर आ पाई।

02. पँक्ति_दो :–,-1934 और 2015 में आये भूकम्प ने जिस तरह धन-जन-जमीन को क्षति पहुँचा दिया था, 2020 के दिसम्बर में धन-जन-मन की क्षति स्पष्ट रूप से नजर आ रही थी।

03. पँक्ति_तीन :–,-"शुचिता ने तय किया कि वह बिना धन लिए जन के साथ उनके मन की भी सेवा करेगी, जिसके लिए उसे युवाओं की मंडली बनानी पड़ेगी।

04. पँक्ति_चार :–,-"जबतक भेजे को साफ करने वाला थ्रेसर नहीं आ जाता, तबतक उसे धैर्य से काम चलाना चाहिये..," कई बार मज़ाक-मज़ाक में सुनी बात ,उसे सच साबित होती नजर आ रही थी।

05. पँक्ति_पाँच :–, शुचिता को अपने लगन व श्रम पर पूरा विश्वास था कि "ताला में ही तो जंग लगा है..,"

Sunday, 10 May 2020

*"मातृ शक्ति को नमन"*


–मेरी दादी माँ लगभग सौ साल की होकर गुजरी होंगी... । अपने पंद्रह-सोलह बच्चों की परवरिश के संग बहू-दामाद , नाती-नतनियों, पोते-पोतियों के चहल-पहल से गुलजार घर में सारा समय गुजर गया । एक अन्न बर्बाद हो जाए, उन्हें पसंद नहीं था...उन्हें पूजा-पंडित से कोई मतलब नहीं था.. ।

–लेकिन मेरी माँ को रामायण और कुलगुरु (घर के पुरोहित) पर अंधविश्वास था.. जब भी उन्हें कोई परेशानी नजर आती या तो कुलगुरु को बुलाकर पूजा जाप करवा लेतीं या रामायण खोल कर पढ़तीं और किसी विशेष पन्ने पर हम बच्चों से अपनी आँखों को बन्दकर किसी एक शब्द पर उँगली को रखने के लिए कहतीं और जो दोहा बनता उससे परिणाम निकाल कर अपने कामों में व्यस्त हो जातीं। वैसे उनके जैसा शक्ल पाकर भी मैं उनके जैसा मधुर आवाज और लयमय गीत गाना नहीं पा सकी।


Saturday, 9 May 2020

मातृ शक्ति को नमन


माँ क्या होती है?
–जानने को मिला
अनसूया की कथा पढ़!
त्रिदेव जिस वजह से
शिशु बने हों!
मेरी माँ अनसूया सी थी..

–जानने को मिला
गाय बहुला की कथा पढ़
मोह में कृष्ण सिंह बने हों!
मेरी माँ बहुला सी थी..

–जानने को मिला
कृष्ण को ओखल से बाँध
धारा-धार रोती...,
गर्भनाल की ही जो बात होती
माता यशोदा-धाय पन्ना की
बात नहीं होती।
मेरी माँ यशोदा सी थी..

–जानने को मिला
गिरजाघर में ईशा की शांति में
माँ मरियम की सौम्य मूर्ति में
'मेरी माँ मरियम सी थी!'

–जानने को मिला
गाय-तेंदुआ की कथा पढ़!
माँ बस माँ होती है
मेरी माँ प्रत्येक माँ सी थी..

माँ क्या होती है?
होती है क्या माँ!
बिन माँ बने ,जान पाना
कहाँ आसान होता है...,
मैं माँ सी तो हूँ!
तो जानती हूँ
माँ मुझ सी ही होती है..

आपके कितने बच्चे हो गए होंगे?
माया का प्रश्न
बेहद कौतूहलवश था।
प्रीति, एकता, बुचिया, बिटिया,
शाइस्ता , प्रियंका,
मुनिया, चुनिया, बिट्टू,
अभिलाष, रवि, आदर्श, सन्दीप,
राहुल, संजय, रब्बान, आदर्श,
प्रभास , हिमांशु, विष्णु, उपेंद्र...,
"हा हा हा! बस! बस! रहने दें माँ...
बहू होने के पहले जान गई थी
मैं रानी बेटी बनते हुए...
एक के आगे शून्य बढ़ाते जाना है,
माँ का आँचल आकाश सा होना है।"

क्या इस कोरोना काल में
माँ का आँचल आकाश सा है।

जो होना शुद्ध होना..

 सिंधु तट पे
अपलक बैठी मैं–
बुद्ध पूर्णिमा ।

सीमांत तक आलोचना करना अच्छा लगता है।
अपना महत्त्व सूचीबद्ध हो जाना अच्छा लगता है।
हम विष्णु के दस अवतारों में से कोई तो होते,
हम महावीर बुद्ध ईशा सुकरात में से कोई होते,
उस समय होते तो ऐसा कर लेते वैसा कर लेते।
सुझाव-सलाह देने में तो विद्यावाचस्पति हैं।
कैसे रहते , क्यों कहते , क्या वो अध्वाति हैं।
जानने में रुचि नहीं है क्या करना है क्या कर रहे हैं।
वर्त्तमान परिवेश-परवरिश में आज हो क्या रहा है...
मानो डोर बोम्मलट्टम , गोम्बेयेट्टा अन्य अंगुल्यादेश
जानो डूब-उतरा रहे अंदेशा, आशंका और पसोपेश
चाँद होना चाहिए कि होना चाहिए चकोर
चाहे जो होना शुद्ध होना बचा रहे घघराघोर




Thursday, 7 May 2020

"बिन शॉर्टकट का श्रम"


   "ये क्या है शशांक! सब कुशल है न? तुम सारा खाना ज्यों का त्यों छोड़ दिये हो, मानों थाली के भोजन में हाथ डाले ही नहीं हो। ऐसा क्यों?" रात्रि भोजन के समय बिना खाना खत्म किये उठते हुए शशांक को देखकर उसकी माँ ने थोड़े चिंतित स्वर में पूछा।

"खाया नहीं गया, तुम जानती ही हो, थाली में भोजन छोड़ना मुझे बिलकुल पसंद नहीं।" शशांक ने कहा।

      "यही तो मैंने भी सवाल किया माँ! तो मुझे कहा कि भोजन बेस्वाद है। ना जाने आज क्या हो गया? इतने सालों में पहली बार खाना ठीक से नहीं खाया जबकि, अधकच्ची, जली जैसी भी बनाऊँ ये बिना शिकायत के भोजन कर लेते थे।" सदा उल्लासित रहने वाली शशांक की पत्नी का स्वर वेदनामय था।

      "हमारी शादी का और तुम्हारी नौकरी का साल एक है।प्रशिक्षण काल कितने वर्षों तक चलाया जा सकता...? विशिष्ट प्रशिक्षण के लिए तुम चयनित होकर भारत से लंदन गई। मैं विदेश आ गया था तुम मेरे साथ रहने के लिए अपनी कम्पनी में पद-त्याग करने गई तो तुम्हें मेरे साथ के लिएविदेश भेज दिया गया। हर स्तर पर तुम्हें हथेलियों पर रखा गया। उसके लिए चाम तो आधार नहीं न बना होगा?

   "हथेली पर सरसों उगाना ही होता है । चाहे कामयाब पेशवर बनो या चाहे अन्नपूर्णा बनो।" शशांक की बातों के समर्थन में उसकी माँ का स्वर गुंजायमान था।

     समझ जाने की मुद्रा में गर्दन हिलाती शशांक की पत्नी प्रसन्नता प्रकट कर रही थी।

Tuesday, 5 May 2020

मिटेगा संताप काल..

01.
गोधूलि बेला–
रक्तिम लिपिस्टिक 
श्यामा होठ पे।
02.
वैश्विक युद्ध–
अनब्लॉक हो गये
वैद्य यांत्रिकी ।
03.
वैश्विक युद्ध–
वॉरियर्स पे हुए
पुष्प बौछार।


आज हाल कुछ अच्छा लगा तो बाहर टहलने निकले




चंपा फूल ने मुझे सदा सम्मोहित किया... बचपन से मुझे इससे इश्क है... हमारे घर में चंपा का पेड़ था। जब से होश संभला... 1973 तक इससे सारी बातें साझा करती रही... उसके बाद शहर बदल गया , इसका साथ छूट गया... परन्तु कहीं दिख जाता था तो कुछ देर के लिए ही सही मुझे ठमका ही लेता। 1994 के 29 अगस्त को हम पटना रहने आये। पटेल नगर पटना के जिस मकान में मैं रहती थी , वहाँ भी इस फूल का बड़ा पेड़ था.. एक बार सड़क चौड़ीकरण में उस पेड़ को जड़ समेत काट देना पड़ा.. जिस समय वह पेड़ कट रहा था , वहाँ मुझसे खड़ा नहीं रहा गया.. कटे पेड़ की टहनियाँ आग में जलती तो रौंगटे खड़े हो जाते.. मोटा तना सूख रहा था.. एक दिन यह भी जल जाएगा रोज मुझे रुंआसा करता। कुछ दिनों के बाद ,एक दिन अचानक उस सूखे तने में से पौधा निकल आया.. जिसे हम पुनः लगा सके। जलने के लिए आग में डाला जाता तो लुआठी होता...।


'बोधि वृक्ष' चौथी पीढ़ी का वृक्ष है। बिहार राज्य के गया जिले में बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल का वृक्ष। बोधि वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास-
पहली कोशिश
कहा जाता है कि बोधिवृक्ष को सम्राट अशोक की एक वैश्य रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे कटवा दिया था। यह बोधिवृक्ष को कटवाने का सबसे पहला प्रयास था।मान्यताओं के अनुसार रानी का यह प्रयास विफल साबित हुआ और बोधिवृक्ष नष्ट नहीं हुआ। कुछ ही सालों बाद बोधिवृक्ष की जड़ से एक नया वृक्ष उगकर आया, उसे दूसरी पीढ़ी का वृक्ष माना जाता है, जो तकरीबन 800 सालों तक रहा
दूसरी कोशिश
दूसरी बार इस पेड़ को बंगाल के राजा शशांक ने बोधिवृक्ष को जड़ से ही उखड़ने की ठानी। कहते हैं कि जब इसकी जड़ें नहीं निकली तो राजा शशांक ने बोधिवृक्ष को कटवा दिया और इसकी जड़ों में आग लगवा दी। लेकिन जड़ें पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाईं। कुछ सालों बाद इसी जड़ से तीसरी पीढ़ी का बोधिवृक्ष निकला, जो तकरीबन 1250 साल तक मौजूद रहा।
   बन्द आँखों से या खुली आँखों से कभी सपना नहीं देखा.. जब जैसी भी स्थिति रही, जिस
यूँ तो हमलोग शारीरिक स्थिति से ठीक हैं लेकिन चिंता तो बहुत है... जबसे होश संभाला कभी-कभी मुझे एक ही सपना आता था कि अथाह जल में फँसी हूँ... वैसी ही स्थिति है... बीच में खड़ी हूँ .. कई पटरियाँ हैं... किसी भी तरफ निकल भागने का रास्ता नहीं।  कैलिफोर्निया की स्थिति बहुत नाजुक रहा... मौत देखकर डॉक्टर की आत्महत्या हिला कर रख देता है...
परन्तु जीने की जिजीविषा ठूँठ में नए पल्लव देते हैं...

Thursday, 30 April 2020

हाँ तो..

lekhymanjoosha@gmail.com

अपना निर्णय लेख्य-मंजूषा आई डी पर भेजिए

https://contest.storymirror.com/hindi-competitions/past/antrraassttriiy-lghukthaa-prtiyogitaa/9fc489f9-fdcc-448c-9b5c-129045a310f1/winners

प्रतियोगिता में शामिल 1099 लघुकथाओं में से 50 लघुकथा चयनित हुई...

उन सभी लघुकथाओं को किनका-किनका पढ़ना हुआ ? 3 दिन में जिनका 50 पढ़ना और प्रथम चयन करना हो जाएगा उनके लिए ताज़्जुब (सरप्राइज) की बात..

Saturday, 25 April 2020

हाइकु

लघुकथा, कहानी , उपन्यास, समीक्षा, आलेख, इत्यादि गद्य विधा की शाखाएं हैं तो मुक्तक, ग़ज़ल, दोहा, रोला, कविता इत्यादि पद्य विधा की
गद्य-पद्य दोनों विधाओं में अनुभव के साथ कल्पना के विस्तार के लिए पूरी आजादी होती है।
कहने वाले हाइकु को भी कविता के श्रेणी में मानते हैं लेकिन जब कल्पना के लिए कोई स्थान ही नहीं तो हाइकु को कविता कहना कठिन है लेकिन

Ritu Kushwah जी बताती हैं हाइकु में तुकांत कैसे किया जा सकता है ताकि काव्य का आनंद मिले...


01.
 दर/पथ नक्काशी
मुख-शौच से मुक्त–
वैश्विक बन्दी ।

02.
गुलाबों धारा
फ्लेमिंगो किलोल से–

हिन्द में मंदी ।

03.
तेरे मेरे में
चमेली का फासला–
कोरोना कैदी।


नया दिन नए डर से सामना
कहीं थेथर ना हो जाये जमाना
धरा ढूँढेंगी साधन मनु को कैसे मनाना

 कोरोना से उपचार/बचाव/सुरक्षा/स्व संगरोध/निर्विषीकृत/स्वयं डीटॉक्स
अब यह उदास सा माहौल हमारे लिए वर्षों का हो गया।
अतः जितना जल्दी हो सके इसे स्वीकार कर हम उबर जाएं ,
उतना हमारे लिए और आस-पास के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार होगा ,
तथा हमारे हाथ में है कितना यह विचारणीय है।

Wednesday, 22 April 2020

माँ है मान भी जा


सूर्योदयास्त–
पहाड़ों की सड़कें
बेवा मांग सी।

तब नहीं जानती थी कि पृथ्वी इतनी नाराज होगी... सूर्योदय व सूर्यास्त को सूर्योदयास्त करने की कोशिश भर थी यह तो उदय का अस्त हो गया ... हर गली हर मोहल्ले की सड़कों को वीरान कर डाला।
स्वर्ग और नर्क धरा पर भोगना तय है यह तो सदा सुनने को मिलता था... आज अनुभव में भी है.. यह अलग बात है कि गेंहू के साथ घुन का पीसना चरितार्थ हो रहा

पचास साल पूरे हो गए धरा दिवस मनाते हुए,  जिनकी चेतना नहीं जगनी थी नहीं जगी.. जो जगे थे वे भी कट रहे हैं...
पतंगों सी जिंदगी हो गई है

वैश्विक युद्ध/कोरोना काल–
पतंगों की दूरियाँ
बित्तों से नापे।

लॉकडाउन–
शेफ बैरा का ठट्ठा
दादी के घर।


सभी तो माँ मानते हैं न तुझे,
चरण-रज लेते हैं।
हम भी अपने बच्चों की
गलतियों पर उन्हें
कुछ देर के लिए ही
एकांत की सजा देते हैं।
बच्चों की खुशियों के लिए
फिर माँ कितने जतन करती
देख जिन्हें नहीं चेतना
वे अब भी नहीं चेत रहे
और ना आगे चेतेंगे।

कोरोना का रोना-धोना
चाहे जितना हो ले
मनु के अलावे
सभी बहुत खुश हैं
देख आजतक
विभीषण का नाम 
नहीं रखा समाज ने...
रावण मिल जाएगा।


राजतंत्र को बस पढ़ा सुना ही है...
देखा लोकतंत्र है जिसमें
जनता को मालिक होना चाहिए और
चयनित नेता जनता के सेवक समझे जाते तो
शायद स्थिति भिन्न होने की उम्मीद होती



Tuesday, 21 April 2020

हाइकु को विस्तार से जानें


रविवार- 16/02/2020
Ritu Kushwah :- अवकाश में कक्षा - विषय : कथन का भेद
जब भी हम हाइकु लिखते हैं सबसे पहला प्रश्न होता है कथन और दिखलाने में भेद करना
बिम्ब वास्तव में कल्पना रहित एक ऐसा दृश्य है। जिसे हम वर्ण क्रम में पूर्ण वाक्य में लिखते हैं।
Neh Sunita :- मुख्य समस्या बिम्बों को कथन से पृथक कर इस तरह रखना की वाह क्षण प्रस्तुत हो
Ritu Kushwa :- और कथन हम उन वाक्यों को कहते हैं, जिसमें हमने अपनी कल्पना या अनुभति समाहित की हो उदाहरण के लिए 'माता दुखी है' कथन है और 'माता के आंखों में आँसू' बिम्ब है। हमें यह समझना होगा कि बिम्ब भी हम कह कर ही बताते और कथन भी तो फिर बिम्ब दिखाना और कथन कहना कैसे हुआ... इसे अपनी एक रचना से समझाने का प्रयास करती हूँ।
घना कोहरा-
कुड़ेदान मे सोए
माँ संग बिल्ली। ऋतु कुशवाह 'लेखनी'
यह एक दृश्य है। जिसमें मैंने घने कोहरे में बिल्ली और उसका बच्चा कूड़ेदान में ठंड के कारण दुबक कर सो रहे है। अब इस दृश्य को मैंने दो बिम्बो में बाँट दिया। एक प्राकृतिक बिम्ब "घना कोहरा।" यह पूर्ण वाक्य है व्याकरण की दृष्टि से और वर्ण गणना में भी पूर्ण तथा कल्पना रहित है अतः यह वाक्य एक बिम्ब हुआ।
Neh Sunita :- क्या पंक्ति दो और पंक्ति तीन भी अपने आप में अलग-अलग पूर्ण वाक्य होने चाहिए?
Ritu Kushwah :- ऐसा आवश्यक नहीं  है। परंतु यदि हो तो सुंदरता आ जाती है। पर न हो तो कोई दोष नहीं है।
दूसरा बिम्ब :-
कूड़ेदान में सोये
माँ संग बिल्ली।
यदि इसकी जगह मैंने यहाँ यह लिखा होता कि ठंड में सोये या फिर दुबक कर सोये तो यह कथन होता। क्यों होता कथन?
क्योंकि इसमे मैने उस दृश्य को देखते समय में जो कल्पना आई थी वो भी समाहित कर दी बिल्ली को ठंड लग रही है ये मेरा अनुभव है और बिल्ली दुबक कर सोई है ये मेरी कल्पना तो कल्पना या अनुभव के साथ वाक्य कथन हो जाता है। वही यदि दृश्य जैसा दिखा वैसा ही कह दिया तो दिखाना हुआ। वही हम पहले वाले उदाहरण से देखते है। 'माता दुखी है' यह वाक्य कथन क्यों है? इसे इस प्रकार समझते हैं कि माता दुखी है यह कैसे पता चला? क्या देख कर पता चला ? या माता के आँखों में आँसू देख कर पता चला। तो वास्तव में दृश्य क्या था ? माता के आँखों में आँसू दृश्य था।तो फिर दुख क्या था वो मेरा उनके आंखों में आँसू देख कर अनुभव था। अतः माता दुखी है कथन हुआ और माता के आंखों में आँसू बिम्ब हुआ। करवा चौथ सेनेर्यु :-
पति व सौत
छलनी की ओट में-
तलाकशुदा। ऋतु कुशवाहा
 Kailash Kalla :- Ritu Kushwah जी ये शेनेर्यू क्यों ? करवा चौथ दर्शाता तो है?
Ritu Kushwah :- Kailash Kalla जी क्योंकि इसमें कोई भी प्राकृतिक बिम्ब नहीं है।
मनोरमा जैन 'पाखी' :- तलाकशुदा है तो व्रत क्यों ?
Neh Sunita :- Ritu Kushwah जी आदरणीय Kailash Kalla जी की बात उचित प्रतीत होती है मेरा ध्यान नही गया था उस दिन इस बिंदू पर ये हाइकु ही है क्योंकि इसमें एक विशेष माह के विशेष दिन का उल्लेख है शेष आदरणीय Tushar सर जी मार्गदर्शन करेंगे।
Tushar Gandhi :- नेह आप ठीक कह रही हैं। इसमें ऋतू बोधक तो है पर 12 वाले हिस्से में एक किस्म का कटाक्ष है यह दर्शाता है जो सेनर्यू का निर्देश करता है... यह रचना मिश्रित है...
Kailash Kalla :- मनोरमा जैन 'पाखी' जी,शायद, सौत शब्द का प्रयोग ये दर्शाता है, पति ने पत्नी की इच्छा के विरुद्ध तलाक लिया है, पत्नी ने पति को नही छोड़ा।
मनोरमा जैन 'पाखी' :- Kailash Kalla जी फिर तो आह क्षण है ।करवाचौथ प्राकृतिक है । फिर यह हाइकु ही तो हुआ ।शेनर्यू नहीं मेरे विचार से।

दिनांक- 08/03/2020 अवकाश में कक्षा Ritu Kushwah :- विषय : दोहराव

दोहराव शब्दों या अनुभूति का सबसे पहले ये समझे कि हाइकु में दोहराव दो प्रकार से होता है। एक शब्दों का और दूसरा अनुभव का... और शब्दों का दोहराव भी दो प्रकार से होता है।

पहला पर्यायवाची शब्दों का दोहराव व दूसरा संज्ञा एवं जातिवाचक संज्ञा का दोहराव

सबसे पहले शब्दों के दोहराव को समझते हैं। पर्यायवाची शब्द या समान शब्द तो हम सब देख कर ही समझ सकते हैं। उसे बताने की अनिवार्यता नहीं लग रही है मुझे उदाहरण के लिए आकाश अम्बर मेघ। अब आप कहेंगे कि आकाश और मेघ में अंतर होता है । मेघ बरसने वाले बादल होते हैं और आकाश सदैव स्थिर होता है। परंतु दोनो ही एक दूसरे के पूरक हैं और जब मेघ होते हैं तो आकाश नहीं दिखता उसके स्थान पर केवल मेघ दिखते हैं तात्पर्य एक ही स्थान पे दोनों होते और दोनों में से कोई एक ही एक समय पर दिख सकता है अतः एक रचना में दोनो का होना दोहराव है। पर्यायवाची शब्दों से भी हमें बचना है पुष्प फूल मिष्ठान मीठा इत्यादि...

अब बात करते हैं दूसरे प्रकार की जिसमें संज्ञा एवं जातिवाचक संज्ञा के मध्य दोहराव होता है, हम रचना में कमल/गुलाब चम्पा चमेली आदि किसी पुष्प का नाम लिखे और साथ में उसी रचना में फूल या पुष्प भी लिखे तो यह दोहराव है क्योंकि जिसका नाम लिखा है वो भी फूल है ऐसे ही गंगा नर्मदा यमुना आदि किसी माता (नदी) का नाम लिखे और साथ ही सरिता नदी जल भी लिखे तो यह भी दोहराव है। तात्पर्य यह है कि यदि हमने किसी का नाम लिखा है तो उसी का जातिवाचक नाम न लिखे। यह तो बहुत सरल है। कठिनता आती है अनुभूति के दोहराव पर...  आपके किन्हीं दो शब्दों से यदि पाठक या श्रोता को समान अनुभूति हो तो यह अनुभूति का दोहराव हुआ.. इसे उदाहरण से समझते हैं। मैं कई रचनाओं में ये पंक्ति पढ़ी हूँ... 'कोयल की कूक' ।
कोयल के अलावा कोई नही कुकता। कूक भी कोयल का ही अनुभव करवा रही है और कोयल तो स्वयं का अनुभव करवा ही रही है।... और देखें 'मछली जल में तैरे'।
मछली क्या आकाश में भी तैरती है? नहीं, तो फिर जल लिखने की अनिवार्यता नही है। बस, मछली तैरे लिखने से पाठक को वही अनुभव होगा जो आपके जल लिखने से होगा तो यह दोहराव हुए। 'वायुयान आकाश में उड़ रहा है' । क्या वो जमीन पर भी उड़ता है? नहीं, जमीन पर चलता है एवं आकाश में उड़ता है। तो ऐसे में अगर में सिर्फ वायुयान उड़ रहा है लिखूंगी तो भी पाठक वही देखेंगे।

Thursday, 16 April 2020

साझा नभ का कोना

आज माया बेहद खुश थी। चौकानें वाली खबर भी तो थी। लॉकडाउन के दौरान घर से काम करते हुए की तस्वीरें मंगवाई गयी थी उसके ऑफिस से। कुछ स्पेशल तस्वीर होने पर विजेता घोषित होना था।
 कई दिन उलझन में रही बार-बार कोशिश करती कभी कोई रेसिपी ट्राई करती कभी कोई बने भोजन में नया करने की कोशिश करती। कभी डांस कभी गाना। लेकिन खुद से संतुष्ट नहीं हो पा रही थी।
एक दिन मुझसे मंडला आर्ट पर विमर्श कर रही थी तो मैंने कहा ,-"बनाने की कोशिश करो।"
"कैसे बनाएं क्या आप मुझे बनाना सीखा देंगी?"
"गूगल में सर्च कर देख कर अभ्यास कर लो!"
"इतना समय अब कहाँ बचा कि गोल बनाने के लिए कुछ आधार खरीद कर लाया जाए?"
"आस-पास चौके से हर कमरे में नजर दौड़ाओं हर चीज का जुगाड़ घर में होता है।"
माया ने मंडला आर्ट बनाकर कला की बारीकियों को समझा और उसकी तस्वीर प्रतियोगिता में शामिल हुई। दस विजेताओं में से एक रही।








धर्म की सीमा

धर्म की सीमा : युवा प्रवर्तक ब्लॉग धर्म की सीमा : ब्लॉग बोधायन पत्रिका आरती की थाली मेज़ पर रखी थी। रोली की लालिमा अभी भाई के माथे पर ताज़ा ...