Thursday, 1 October 2020

'विचार लेखन' : 'मेरा हिन्दी प्रेम'

 


हिन्दी महोत्सव 2020 के अंतर्गत मातृभाषा उन्नयन संस्थान के द्वारा आज 'मेरा हिन्दी प्रेम' आयोजित प्रतियोगिता के अंतर्गत, 'स्वयं के हिन्दी भाषा से प्रेम' के बारे में लिखना है.. कहीं 'छोटा मुँह बड़ी बात करना' या स्वयं को 'अहंकारी साबित करना' ना हो जाए .. फिर भी...



हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। “यू ट्यूब” और “गूगल” ने भी हिन्दी को काफी अहमियत दिया है। लगभग सभी सोशल मीडिया के प्लेटफ़ॉर्म पर हिन्दी का विकल्प अभी भी उपलब्ध है ।
'विश्व आर्थिक मंच' की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। वर्त्तमान समय में, अमेरिका में हिन्दी को द्वितीय भाषा बनायी जाए यह प्रयास किया जा रहा है। और दूसरी तरफ हिन्द में सरकारी दफ्तरों , विद्यालय-महाविद्यालयों, अनेकानेक संस्थाओं में ‘हिन्दी दिवस ‘और ‘हिन्दी दिवस पखवाड़ा’ बड़े धूम-धाम से मनाया जा है। मातृभूमि में साँस लेने वालों को राष्ट्रभाषा की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हम सब तो अपने-अपने क्षेत्रिय भाषा के लिए लड़ रहे हैं...। ... राज्यों को भाषा के आधार पर टुकड़े-टुकड़े करने के लिए तैयार हैं।
द्रष्टा और दृष्टि का विलयन होने वाले प्राचीन ग्रीकों ने चार तरह के प्यार को पहचाना है : रिश्तेदारी, दोस्ती, रोमानी इच्छा और दिव्य प्रेम। 'प्यार' ऐसा शब्द है जिसका नाम सुनकर ही सबको अच्छा-अच्छा का अनुभव होने लगता है,प्यार शब्द में वो एहसास है जिसे हम कभी नहीं खोना चाहते हैं।
मैं हिन्दी भाषी क्षेत्र बिहार में जन्म ली हूँ। तो हिन्दी बोलना, जानना व लिखना सीखना नहीं पड़ा और स्वयं का हिन्दी के प्रति प्रेम का पता तब चला जब अहिन्दी भाषी प्रदेशों में जाना हुआ। वहाँ के निवासियों को हिन्दी बोलने के नाम पर अपने चेहरे का इतिहास-भूगोल बदलते दिखा और सोशल मिडिया पर मेरा लेखन
–आप ये ब्लॉग पर फेसबुक टाइमलाइन पर कहाँ से चुन-चुन कर हिन्दी के तो नहीं लगते शब्दों को पोस्ट करती है.. समझना-समझाना कितना कठिन हो जाता है। ..
–आपकी लिखी रचनाओं को पढ़ने के लिए शब्दकोश लेकर बैठना पड़े तो पढ़ने का उत्साह चला जाता है।
–आप क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग ना करें आपकी रचना केवल शब्दों का जमावड़ा लगता है.... इत्यादि पद्म विभूषणों से जब सुशोभित होने लगा तो मुझे लगा कि अरे ! मुझे तो हिन्दी से दिव्यप्रेम है...। अजीब सा नशे के कैद में हूँ..।
देश-विदेश में हिन्दी साहित्य की जितनी संस्था (जो मुझे सदस्य बनाये रख सकती है ) मेरे जानकारी में सहभागिता करने का प्रयास करती हूँ।
हिन्दी के लिए कोई कार्यक्रम हो उसमें अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में ना तो जेठ की दोपहरी रोक पाती है ना भादो की बरसात। ना तीन-चार बजे रात में वर्चुअल साहित्यिक गोष्ठी में उपस्थिति दर्ज करने की बात...।
कई गोष्ठियों में युवाओं को शुद्ध हिन्दी में रचना पाठ करते देख बेहद हर्ष होता है।
समुन्द्र का जिस तरह ओर-छोर नहीं दिखलाई देता है उसी तरह हिन्दी साहित्य है...। उसमें पड़े हमारा लेखन का अस्तित्व एक बूँद ही है...।

Tuesday, 29 September 2020

'कुछ जग की बातें : कुछ मन की सौगातें'



बात कुछ यूँ हुई
साहित्यिक दो संस्थाओं ने
एक समय में अलग-अलग
दो अलग-अलग
कार्यक्रम आयोजित किया।

कथा पाठ और उस कथा की समीक्षा,
इंद्री समर्थ श्रोताओं की भी थी परीक्षा।

स्व रचित पद्य आधारित अंताक्षरी,
नई चुनौती थी शब्दों के अग्निहोत्री।

कौन करे त्राहिमाम कौन करें माला जपी!
दूसरे दिन अखबार में विज्ञप्ति यूँ छपी,

'महिला कवियों के वर्चुअल कथा पाठ'
उलझन टला आपस में, पड़ी न कोई गांठ।

 शिक्षा और शिक्षित का अच्छा नमूना
साहित्यकारों का अति संवेदनशील होना।

सिनेमा कुली का अवलोकन सम्पादक की थी मस्ती,
रविवार को अधिकतम व्यस्त होते हैं बड़े-बड़े हस्ती।

गढ़ दिए महिला को कवि हो जाने का अफ़साना।
आकस्मिक मिला सबको हँसने-हँसाने का बहाना।

'बेटी को बेटा कहने वालों' अब चेत जाने की आवश्यकता नहीं ...

Saturday, 26 September 2020

त्रिवेणी




सोच लो कुछ अनजान बातें समझना या
समझा पाना मुश्किल हो जाता है
01.
ख़ुद का नब्ज़ टटोला ख़ुदा मिला,
हाँ ना तेरे से ना मेरे से जुदा मिला।
खुशियाँ खिलखिला चली आती हैं..

02.
शरणार्थी कैम्प में जो आग लग गया,
शरण हेतु नभ तंबू ले आगे आ गया।
मरु में हरियाली नहीं ख़ूबसूरती होती है..

03.
तितलियों की बेड़ियाँ कब कटेगी
अंग से अंग चुरा लेना तब कटेगी।
थके मन नापना कठिन रवां आस की

04.
क्षमता सब में हर समाधान की,
आज़मा सको जीवन गतिमान की।
उड़ान पर अभिमान नासमझ कौन है..

05.
प्यार प्यार है,  इश्क इबादत है
जब जुनूनी नहीं तो पहला क्या आखिरी क्या..,
अक्षर में बताया या ग्रन्थ लिख डाला
कारूनी नहीं तो पहला क्या आखरी क्या..,
छौने ने छू लिया ज्यों आकाश , बीज से बिरवा बरगद बन फैला दिया प्रकाश..

Friday, 25 September 2020

'रहस्य'

 डायरी शैली में पुन: प्रयास

23-09-2020

”क्या बात है बिटिया आज तुम्हारे चेहरे पर यह उदासी की घनी घटा क्यों अपना प्रभुत्व जमाये हुए है?" सदा खुश रहने वाली अपनी बहू को आज बेहद उदास देखना मेरी सासू माँ से सहन नहीं हो रहा था तो उन्होंने पूछ लिया।

"हाँ माँ! आज कुछ बात ही ऐसी हो गई। मुझे आपसे साझा भी करना है, विस्तार से बताती हूँ।" मैंने कहा।

22-06-2011

चेन्नई कालीकंबल मंदिर में हो रही मेरी सहेली की शादी में मैं अपनी एक अन्य सहेली के साथ उपस्थित थी। सहभागिता करने आये सभी रिश्तेदार परिचित मित्र गण जोड़ी को देखकर अचंभित थे। वर सुदर्शन था धनाढ्य राजकुमार एनआरआई था तो वधू उन्नीस-बीस क्या कहें दस-बारह के तुलना में भी खड़ी नहीं हो पा रही थी।

बहुत खोजबीन के बाद पता चला कि वर यानी अपने घर का छोटा लड़का ही घर चल जाये का आधार है। उसके माता-पिता वृद्ध हो चुके हैं तथा वर के बड़े भाई का शरीर किसी दुर्घटना की वजह से कमजोर हो गया है। हल्का श्रम करता है जिससे कि उसे जीने में शर्म नहीं आये ,लेकिन इतनी आमदनी नहीं कि दिवसाद्यन्त जरूरतों की पूर्ति हो सके। इसी वजह से उसकी पत्नी उसे अंधेरा में कैद समझ कर अपनी ओर से बड़ा ताला जड़ दिया था।

वर से मेरे द्वारा पूछने पर कि,–"आपसे शादी हेतु सर्वांगीण रमणी मिल जाती जो आपके संवृद्धि में सहायक होती। फिर इनसे...?"

"आप तन की जोड़ी लगाना चाह रही हैं। मुझे मन से जुड़ी की चाहत थी। जो हमारे घर की धुरी हो सके।" मेरी सहेली के भाग्य के जंग लगने वाले ताला में वक्त ने बड़ी चतुराई से सही बड़ी वाली ही चाभी लगा दिया था।

12-04-2018

आज मेरी सहेली को पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई। मेरे लिए बेहद हर्ष का पल रहा। पिछले कुछ वर्षों से उसके ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन और असफल होने पर दोबारा ऑपरेशन। मौत को चकमा देकर यमराज के खाते को कुछ वर्षों के लिए लॉकर में रखवा ही दिया था।

23-09-2020

आज पता चला कि मेरी सहेली का पति साँसों के लिए मशीनों के सहारे आई.सी.यू. पड़ा हुआ है। चार महीनों से सारे चिकित्सकों की अक्ल की चाभी गुम हो गई है।

मेरी उदासी मेरी सासु माँ को बिलकुल अच्छी नहीं लगती है। लेकिन आज वे भी मेरी उदासी का कारण जानकर चिंतित दिखीं। शायद कल कोई बड़ी चाभी समय के गुच्छे से निकल सके।

04 अक्टूबर 2020

आज मेरी सहेली के द्वारा दिये व्हाट्सएप्प सन्देश से ही मेरी आँखें खुली..। कल रात उसके पति को मोक्ष मिल गया। एक नवम्बर को मेरी सहेली का जन्मदिन और चार नवम्बर को उसकी शादी की सालगिरह के यादों को संभाले वह अपनी दो साल की बच्ची के संग एक नयी जंग के लिए ना जाने क्या-क्या तैयारी करेगी।

Wednesday, 23 September 2020

'वर्तमान का हिन्दी साहित्य जगत' : 'एक व्यंग्य'

*☺️*
                              
        """ कोरोनाकाल में 
            हिन्दी का प्रयोग घटा है।

            *' दहशत '* की जगह 
            *' पैनिक '* शब्द आ डटा है।

            *वायरस* देखकर -
            हिन्दी शब्दों की ख़पत घटी है।

            अब हमारी बातचीत में ,
            *विटामिन-सी, जिंक,*
            *स्टीम और इम्यूनिटी है* 

            उधर *'सकारात्मक'* की जगह ,
            *'पॉजिटिव'* शब्द ने हथियाई है।

            इधर *'नेगेटिव'* होने पर भी ,
            *खुशी है ,बधाई  हैl*

            अब ज़िन्दगी में *'महत्वपूर्ण कार्य'* नहीं 
            *'इम्पोर्टेन्ट टास्क'*  हैं।
             हमारे नए आदर्श 
*अब हैंडवाश, सेनिटाइजर और मास्क हैंl*

             हिन्दी  के अनेक शब्द 
             *सेल्फ क्वारेन्टीन हैं।*
             *कुछ आइसोलेशन में हैं ,*
             *कुछ बेहद ग़मगीन हैं।*

             *मित्रों ,इस कोरोनकाल में ,*
             हमारे साथ ,
           हिन्दी की शब्दावली भी डगमगाई है।
             वो तो सिर्फ *" काढ़ा "* है ,
             जिसने हिन्दी की जान बचाई हैl


     –फेसबुक/सोशल मीडिया में हिन्दी रचना प्रस्तुत करने के दौर में अनेकानेक दौड़ में जुटे हुए हैं लेकिन उस प्रस्तुति की शुरुआत अंग्रेजी के सेन्टेंस से ही है... स्वरूचि में इतनी स्वतंत्रता तो होनी ही चाहिए..। आखिर सो कॉल्ड स्टेटस का सवाल है..।

       –टीशर्ट पर टाई लगाए या  शर्ट के साथ धोतीनुमा लोअर पहने कई पुरुष दिख जाएँगे। युवा सलवार-सूट पर स्पोर्ट्स शूज पहने नजर आ सकते हैं और जींस के साथ कोल्हापुरी चप्पलें..।
तो
   –महिलाओं के मामले में प्रयोग और भी बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। जींस और शॉर्ट टॉप के ऊपर रंग-बिरंगा दुपट्टा ओढ़ना, लहँगा-चोली के साथ लंबा सा ओवरकोटनुमा जैकेट पहन लेना, साड़ी के साथ पगड़ी बाँध लेना, सलवार को टीशर्ट के साथ मैच कर लेना, साड़ी के साथ हाथ में बिलकुल मर्दाना घड़ी पहन लेना, धोतीनुमा लोअर के साथ लंबा कुर्ता पहन लेना।

–शाबास! फ़्यूजन का काल है। अतः हिन्दी के साथ भी फ्यूजन हो के अनेकानेक समर्थक पाए जा रहे हैं.. कोई अचरज की बात नहीं लगती है।

   –अंग्रेज तो भारत छोड़कर चले गए लेकिन उनके छाप तो यहीं रह गए..
–भारत में युवा जगत GM, gn, hmmm, k, हर चार हिन्दी शब्द के बाद एक इंग्लिश/आंग्ल वर्ड का प्रयोग करने वाले बर्ड से उम्मीद किया जा रहा है हिन्दी साहित्य में पताका फहराने की।

  –मां, वहां, आंगन, आंचल इत्यादि प्रयोग होने वाले ज़माने में...
–वाम पंथ दक्षिण पंथ में बंटा समाज..
तथा
हिन्दू-मुस्लिम जो सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं जिन्हें धर्म मानना असत्य है ..रस्साकस्सी खेलने में व्यस्त हैं...

  –वर्तमान में हमने कुछ खोया है तो वह है- रिश्तों की बुनियाद। दरकते रिश्ते, कम होती स्निग्धता, प्रेम और आत्मीयता इतिहास की वस्तु बनते जा रहे हैं।

 मैले दर्पण में सूरज का प्रतिबिंब नहीं पड़ता... अतः अगर हालात जल्द वश में नहीं आये तो हिन्दी साहित्य जगत दरिद्रता की गर्त में धीरे–धीरे धंसता चला जायेगा।
और साहित्यकार पूर्वजों की आत्मा का ठगा सा रह जाना हम देख पायेंगे...।

Tuesday, 22 September 2020

नेकी की सीख


"वाहः! अद्धभुत जल की स्वच्छता–पारदर्शिता थी। समुंदर के सतह की चीजें स्पष्ट दिख रही थी।" मयूरी ने कहा।

"सूर्यास्त की छवि उस वजह से ही कुछ ज्यादा मनमोहक चुम्बकीय...," मयूर की बातें पूरी होने के पहले ही मानस द्वारा अचानक लिए गए ब्रेक से कार झटके से रुक गई।
"क्या हुआ?" मयूरी और मयूर एक साथ बोल पड़े।
"थोड़ा पीछे देखो, शायद उन्हें हमारी सहायता की आवश्यकता है।" मानस ने कहा।
आज कई महीनों के बाद मित्र मयूर के समझाने पर मानस मित्र के साथ अपनी पत्नी को लेकर बाहर निकला था । घर वापसी में रात हो गई थी। रास्ते में एक कार रुकी हुई थी और उसके पास ही चार-पाँच युवा खड़े थे।
"इस भयावह काल में कई खतरे हो सकते हैं मित्र," मयूर अपने मित्र को सावधान करने की कोशिश किया।
"घर पर माँ रात्रि-भोजन लेकर प्रतिक्षारत होगीं!" मयूरी पत्नी- बहू धर्म निभा , खतरा भांप रही थी।
"बिना सहायता किये घर गया तो माँ कई दिनों तक ठीक से भोजन नहीं कर पायेगी।" मानस अपनी दृढ़ता दिखलाते हुए रुकी हुई कार चालक के पास गया।
"हार्दिक धन्यवाद अनजाने फरिश्ते! दिलों में उज्ज्वलता फैलाने हेतु।" सभी युवा अपनी गाड़ी ठीक हो जाने के कारण अति प्रसन्न थे

Monday, 14 September 2020

"हिन्दी व शिक्षा!"

मम्मी बोलते-बोलते.. माँ पर क्यों आ गए..!


कैलीफोर्निया का १३ सितम्बर २०२०

सुबह *आठ बजे* चाय के मेज पर...

"कैसा रहा आपका कार्यक्रम ? कब सोईं आप? बेटे-बहू ने एक संग पूछा।

"सुबह पाँच बजे...," मेरे कुछ कहने के पहले मेरे पति शिकायत करने के अंदाज़ में कहा।
"आप सारी रात जगी रहीं .. ? हम स्तब्ध हैं और आपके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं..," बच्चों का स्वर ऊँचा हो रहा था...।
"यह कैसा नशा है तुम्हारा... भोर के साढ़े तीन बजे होने वाले कार्यक्रम में भागीदारी लेना..?" पति महोदय प्रज्जवलित हवन में घी डालने का कार्य कर रहे थे।

     ८ मार्च से अक्टूबर तक कैलीफोर्निया भारत से साढ़े बारह घंटे पीछे है समय के मामले में।
हिन्दी-दिवस के अवसर पर भारत की शाम चार बजे होने वाले दो दिवसीय अंतरराष्ट्रिय कवि सम्मेलन में शामिल होने के लिए मुझे कैलिफोर्निया की रात साढ़े तीन बजे जगना ही था।
अभी मेरा चुप रहना ही उचित था...। अमेरिका में बस रहे बच्चों का काम तो अंग्रेजी से ही चल रहा है या भारत में भी अंतरराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी करने से अंग्रेजी से काम चल जाता.. आपस में दोनों अंग्रेजी में ही गिटपिट कर लेते हैं... सुबह-सुबह हिन्दी में दिया ज्ञान उन्हें ज्यादा क्रोधित करता।

 सुबह *दस बजे* नाश्ते के मेज पर
"हिन्दी को राष्ट्रभाषा क्यों बनाई जाए.. ? तर्क से मुझे बताने की कोशिश करना ...।" मेरे पुत्र ने पूछा।
"क्यों नहीं बनाई जाए उसके पक्ष में एक तर्क तुम ही दो।" अब मैं विमर्श के लिए अपने को तैयार कर ली थी।
"तुम मम्मी बोलते-बोलते.. माँ बोलने पर क्यों आ गए..! क्या तुमलोगों को याद है एक बार निजी वाहन से अहमदाबाद से सोमनाथ जाते समय तेज भूख लग गई थी... वाहन चालक ने एक जगह गाड़ी रोकी और हमें खिचड़ी भोजन कर लेने का सुझाव दिया था। हमलोग राजगढ़ खिचड़ी खाये और उसका स्वाद हमलोगों की आत्मा में बस गया..।
मुझे या यों कहो हमारे परिवार में सभी को.. खिचड़ी बेहद पसंद है... चावल दाल वाली चलती है.. तहरी सब्जी वाली दौड़ती है... घी, दही, पापड़, चोखा, आचार के संग वाली... लेकिन खिचड़ी भाषा, धोखा वाली होकर नजरों में चुभती है...।. सभी क्षेत्रीय भाषा का सम्मान करती हूँ। लेकिन आजादी अंग्रेजों से ली गई..! हिन्दुस्तान व हिन्दी लेखन में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग उचित समझने वाले... अंग्रेजी लिखते समय यह दलील क्यों नहीं दे पाते हैं कि अंग्रेजी बोलने व लेखन में हिन्दी शब्दों का प्रयोग भी उचित है..?"

मध्याह्न "ढ़ाई बजे" भोजन के मेज पर
"साऊथ के चारों राज्यों में ऑटो-गाड़ी चलाने वालों ने हिन्दी सीख रहे बोल रहे। वहाँ जाने वाले अन्य राज्यों के लोग तमिल कन्नड़ इत्यादि क्यों नहीं सीख रहे ? मेरी बहू का सवाल था।
"जिन्हें जिस देशज भाषा की आवश्यकता पड़ती है वे उस भाषा को जरुर सीख लेते हैं। मैं बहुत सारे बिहारियों को जानती हूँ जो कन्नड़ तमिल उड़िया मराठी बांगला अच्छे से बोल-समझ लेते हैं...,"
विमर्श का रूप बहस में बदल रहा था.. । घर में तनाव बढ़ रहा था।

 "तुम मेरी बहू कन्नड़ हो, अगर तुम कोंकणी ही बोलने के जिद पर अड़ी रहती तो...?"

रात्री भोजन के बाद सोने जाने के पहले का पटाक्षेप करने वाला मेरा प्रश्न मेरी ओर से था... कैलीफोर्निया में १४ सितम्बर २०२०, रात के बारह बजकर पैतीस मिनट हो रहे थे..

हिन्दी सदैव जय हो.. हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई

Saturday, 12 September 2020

समानुपातिक

"उफ्फ!ये शनिवार कितना जल्दी आ जाता है..."

"सच में माँ! पलक झपकते दिन गुजर जा रहे हैं..। लेकिन आपको किस बात की चिंता है माँ?"

"ब्लॉग पर पोस्ट नहीं बना पायी हूँ और इस समय कोई शब्द सूझ नहीं रहा है.., बिना शीर्षक के शब्द चयन के लिंक्स चयन कैसे और क्या करूँ...,"

"ओ हाँ! 'अस्तित्व' लीजिये माँ!"

"ऑफिस में कुछ हुआ क्या माया?"

"म्ममाँआ! आप एक बात से दूसरे बात का जोड़ कैसे मिला लेती हैं? वो क्या कहते हैं दो जोड़ दो बराबर पाँच कैसे?"

"यानी कुछ हुआ है.. इसलिए तुम्हारे चेहरे पर तनाव के जंगल उभर आये हैं?"

"जब परिस्थिति इच्छानुसार न हो और हमें उसमें बने रहना मजबूरी हो तो क्या करना चाहिए?

"मजबूरी को तौलना पहले जरूरी होता है ... सिवाय पति के संग बने रहने के स्त्री के लिए कोई और मजबूरी नहीं हो सकती। स्त्री को छत छोड़ने का सलाह मैं कभी नहीं देती हूँ। एक का नकेल नहीं कस सकी तो पूरे जग से जंग नहीं लड़ सकती है।"

"जी माँ! और किसी का मन न दुखे हमारी वजह से यह सोचना कितना उचित और उसका क्या उपाय हो ?"

"अपना स्वाभिमान देखना पहले जरूरी है..., अपने ज़मीर की जबाबदारी, जबाबदेही जिम्मेदारी अपनी होती है... आँख उसी से मिलानी होती है..,"

"जी माँ! अतिशयता अत्यधिक अप्रिय लगता है और विरोध करने पर सुनवाई न हो तो...,"

"बाकी तो.. किसी को खुश करने चलो तो उसकी खुशी का दायरा बढ़ता जाता है। और कोई चीज इकतरफा नहीं चलता है।बस दुःखी होना छोड़ दो... बाकी कबीरा ने कहा ही है... 'भाँति-भाँति के लोग...,' जिंदगी यात्रा में यात्री तो मिलेंगे ही.. लोमड़ी से शातिराना, भेड़ियों से क्रूरता से सीख, शेर से चालाकी...,"

"हुर्रे, मार्ग मिल गया माँ..! मैं थोड़ी देर में मिलती हूँ।"

थोड़ी देर के बाद मिलने पर पुनः माँ बात करती है..

"नहीं जानती कि तुम्हें किस लिए मार्ग चाहिए था... मैंने वही बताया था, जो मेरे अनुभव में रहा..,"

"आपका अनुभव ही मेरा मार्गदर्शन है माँ। दुनियादारी मेरी अभी परिपक्व नहीं है। हमेशा बेवकूफ ही बन जाती हूँ। मुझे लोगों की चालाकियाँ समझ में नहीं आती है। हमेशा इमोशनल फूल बन जाते हैं और दुखी होते हैं..,"

"ऐसा नहीं है... समय से अनुभव आ जाता है... ज्ञान और शिक्षा में यही तो अंतर पता चलता है। वैसे अब बताओ हुआ क्या था..?"

"जी माँ! सहकर्मियों की एक मंडली है मुझे उस मंडली के प्रधान से कार्य विवरण की जानकारी लेनी रहती है...। प्रतिदिन मैं उससे पूछती थी कि कैसा चल रहा है वह बोलती सब अच्छा चल रहा है। आज जब मैं मंडली के अन्य सदस्यों से जानकारी ली तो वे सुस्ता रहे थे। प्रधान बोली कि केवल वो अपने कामों को पूरा करने में जुटी थी..। अभी मैं सभी को रात-दिन एक कर काम पूरा करने के लिए चेतावनी देकर आयी हूँ। वरना सबकी शिकायतें करूँगी...।"

"जब पतवार थामना हो , नौका के पाल पर नजर गड़ाये रखनी चाहिए।"


Monday, 7 September 2020

बदलती राहें

कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.  कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.
दादा जी प्रात:काल जैसे ही गाँव से अपने पोते सतेन्द्र के पास पहली बार लखनऊ पहुँचे तो आदर–सम्मान की औपचारिकताओं के पश्चात् उन्होंने स्नानादि करने की इच्छा व्यक्त की।
  सतेन्द्र इस बात से भलीभाँति अवगत था, अतः उसने अपनी पत्नी से कहा, "दादाजी पक्के कर्मकांडी ब्राह्मण हैं, और वो बिना नहाये–धोये, पूजा–पाठ किये जल तक ग्रहण नहीं करते, सो दादा हेतु उनके स्नान, ध्यान की पूरी व्यवस्था कर दो।" इतना कहकर उसने पुनः घर मे बनाये मंदिर की साफ–सफाई करने हेतु कहा और यह भी कहा, "वहाँ ताँबे के लोटे में गंगाजल मिश्रित जल भी रख दे।"
  व्यवस्था पूरी होते ही दादा जी स्नान गृह से राम-राम का उच्चारण करते हुए बाहर निकले और बोले,"बहू! मंदिर में पूजा–पाठ की व्यवस्था कर दी है न?"
 "हाँ दादाजी!"
      दादा जी मंदिर में अपनी पूजा–पाठ से निवृत होकर पोते द्वारा बताए गए कमरे में पहुँचकर नाश्ते की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही क्षणों में उनकी बहू नाश्ता लेकर दादाजी के सामने नष्ट रखकर बोली, "दादा जी! नाश्ता कर लीजिए और किसी चीज की जरूरत हो तो पुकार लीजिएगा।"
  अभी पहला कौर भी मुँह में नहीं जा सका था कि उनकी दृष्टि कमला बाई पर पड़ी... उन्होंने तुरंत बहू को आवाज दी। बहू के आते ही उन्होंने कहा, "ये औरत कौन है?"
    "बाई है।"
    "मतलब?"
    "घर का चौका–बर्तन करती है...।"
    "और तुम?"
   "बाकी काम मैं देख लेती हूँ... मुझे ऑफिस भी तो जाना होता है।"
यह सुनकर दादाजी का मुँह कसैला हो गया... फिर भी उन्होंने पूछा, "बेटा! यह किस जाति की है?"
   "दादा जी शहर में तो आजकल जाति–पाँति का कोई अर्थ नहीं रह गया है..., फिर भी जहाँ तक मैं जानती हूँ यह दुसाध जाति की है।"
  "सत्यानाश! तुम लोगों ने मेरा धर्म भी भ्रष्ट कर दिया...।"
  "वो कैसे...?"
   "नीच जाति से खाना बनवाकर...।"
        "दादा जी! आप बुरा न मानें तो यह बताएँ, मैं नौकरी छोड़ दूँ? क्योंकि बिना दूसरे के सहयोग से तो मुझ अकेली से यह संभव नहीं है। फिर शहर में अब यह सब नहीं चलता। सब लोग मिलजुल कर ऑफिस में साथ–साथ खाते–पीते हैं। चाय कौन बनाता है बाज़ार में... कोई नहीं जान पाता... फिर बहु आप कहें तो मैं नौकरी छोड़कर...।"
    दादा जी काफी देर चुप शांत विचार मगन हो गये... कुछ नहीं बोले और धीरे–धीरे नाश्ते के कौर अपने भीतर डालने लगे।
     दरवाजे की ओट से देखकर बहू ने चैन की साँस लिया और ऑफिस जाने की तैयारी करने लगी।



Friday, 28 August 2020

व्योम का बोनसाई

साहित्य संवेद की प्रतियोगिता

–शीर्षक : वह पद जो विषय का परिचय कराने के लिए रचना के शीर्ष पर उसके नाम के रूप में रहता है... । शीर्षक पर विमर्श होनी है तो जानना आवश्यक हो जाता है : शीर्षक है क्या ... !
#डॉ0 मिथिलेशकुमारी मिश्र :- तत्त्व ’ शब्द बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसका प्रयोग तंत्र विद्या में बहुत होता है। तांत्रिकों के अनुसार ये 'छत्तीस' होते हैं। संख्याओं के अनुसार इनकी संख्या 'पच्चीस' होती है। रसायनशास्त्र के अुनसार मूल पदार्थजिसे किसी भी रासायनिक विधि से सरलतर पदार्थों में विश्लेषित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा जाता है कि मानवशरीर की संरचना भी 'पाँच तत्त्वों' के मिलने से ही हुई है। वे पाँच तत्त्व  हैंआग,पानी,वायु,धरती और आकाश। इसी प्रकार कथा’ की संरचना कथानक,  वातावरण,  कथोपकथनचरित्रचित्रणभाषाशैली और उपसंहार : यह छह 'तत्त्व'  ही उपन्यासकहानी और लघुकथा की भी संरचना करते हैं। यानी इन छ तत्त्वों  से ही प्राय: सभी कथात्मक विधाओं की रचना संभव हो पाती है। यह बात अलग है कि कथानक यानी कथावस्तु (जिस रूप में भी हो) के अनुसार ही इन तत्त्वों  का प्रयोग होता ही है। किन्तु लघुकथा  में एक तत्त्व  और हैजो कि इसको सही स्वरूप में प्रस्तुत करने में सहायक होता हैवह है शीर्षक

#अब विचारणीय यह है कि लघुकथा में शीर्षक कैसा और कैसे चयन हो तो... 
–डॉ. सतीशराज पुष्करणा :- साहित्य की विधा लघुकथा एक लघुआकारीय एवं क्षिप्र विधा है, जिसमें नपे-तुले शब्दों में ही अपनी बात कहनी होती है अतः इस विधा में सांकेतिकता एवं प्रतीकात्मकता का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। लघुकथा में उसकी  संप्रेषणीयता हेतु वैसे ही सटीक शीर्षक से काम लिया जाता है। तात्पर्य यह है कि सारप्रज्ञ होना चाहिए। 
#श्याम सुन्दर अग्रवाल :- शीर्षक कथ्य अनुरूप हो— लघुकथा का शीर्षक रचना के कथ्य के अनुरूप ही होना चाहिए। शीर्षक कथ्य के अनुरूप न हो तो रचना अपने मूल भाव को पाठक तक ठीक से संप्रेषित नही कर पाती। शीर्षक से रचना के कथा-कहानी विधा से संबंधित होने का भी पता चलना चाहिए। शीर्षक पढ़कर पाठक को ऐसा न लगे कि यह किसी अन्य विधा से संबंधित रचना है। ‘विज्ञान के चमत्कार’, ‘परिवार नियोजन’, ‘आर्थिक असमानता’, ‘देश के निर्माता’ तथा ‘सक्षम महिला-एक पहल’ जैसे शीर्षक कथा-साहित्य के लिए उपयुक्त नहीं कहे जा सकते।
शीर्षक कथ्य को उजागर न करता हो— केवल वही लघुकथा पाठक को बाँध कर रख सकती है जो उसे साहित्यिक आनंद प्रदान करे। जो उसके मन में रचना को आगे पढ़ने के लिए उत्सुकता पैदा करे। प्रत्येक पंक्ति को पढ़ने के पश्चात–‘आगे क्या होगा?’ जानने की जिज्ञासा बनी रहनी चाहिए।
शीर्षक अस्पष्ट न हो— अकसर नए लेखक व कुछ सूझवान रचनाकार भी लघुकथा को शीर्षक देते समय बहुत सोच-विचार नहीं करते। वे अकसर रचना में बार-बार प्रयोग किए गए शब्द का ही शीर्षक के रूप में प्रयोग कर लेते हैं। या फिर रचना के अंतिम अवतरण अथवा वाक्य में प्रयुक्त कोई विशेष शब्द अथवा वाक्यांश को ही शीर्षक का रूप दे देते हैं। कई बार ऐसे शीर्षक बहुत ही अजब व अस्पष्ट बनकर रह जाते हैं।
#बलराम अग्रवाल— कथा-रचनाओं के शीर्षक सदैव ही व्यंजनापरक नहीं होते, कभी-कभी वे चरित्राधारित भी होते हैं। कुछ शीर्षक काव्यगुण-सम्पन्न भी होते हैं अर्थात् संकेतात्मक अथवा यमक या श्लेष ध्वन्यात्मक। नि:संदेह, कुछ शीर्षक लघुकथा के समूचे कथानक को ‘कनक्ल्यूड’ करने की कलात्मकता से पूरित होते हैं, लेकिन कुछ प्रारम्भ में ही समूचे कथानक की पोल खोल देने वाले होते हैं। कुछ शीर्षक रचना के अन्त अथवा उसके उद्देश्य की पोल खोलकर रचना के प्रति पाठक की जिज्ञासा को समाप्त कर बैठने का भी काम करते हैं। ऐसे किसी भी शीर्षक पर कैसे इतराया जा सकता है? शीर्षक को रचना के प्रति जिज्ञासा जगाने वाला होना चाहिए। परन्तु, अगर किसी लघुकथा का शीर्षक कथ्य को उसकी सम्पूर्णता में अभिव्यक्त करने में सक्षम सिद्ध होता है; या फिर, अगर पाठक को वह कही हुई कथा के नेपथ्य में जाने को बाध्य करने में शक्ति से सम्पन्न सिद्ध होता है तो बेशक उस पर इतराया भी जा सकता है।  

#रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’:-शीर्षक पूरी कथा के ताले को खोलने वाली चाबी जैसा होना चाहिए। सीधा–सपाट, बहुत लम्बा और कथ्य से पूर्णतया असम्पृक्त शीर्षक लघुकथा को कमजोर करता है। अच्छा शीर्षक वह है,जो लघुकथा के कथ्य में उद्घाटित करने में सहायक हो। शीर्षक–कथ्य–संवाद आदि में कहीं भी फालतू भाषायी चर्बी की जरूरत नहीं।

–उपर्युक्त विचारों के आधार पर , रामसेतु निर्माण में गिलहरी योगदान वाली सी मेरी कोशिश :-
■01.-इस प्रतियोगिता में आप अपनी एक ऐसी लघुकथा  जिसका शीर्षक आपको विचारों में कथा के लिए श्रेष्ठ है या फिर आपके विचारों में चयनित शीर्षक आपकी कथा के मर्म को स्पर्श कर रहा है।

'नया सवेरा'-विभा रानी श्रीवास्तव
रुग्न अवस्था में पड़ा पति अपनी पत्नी की ओर देखकर रोने लगा, “करमजली! तू करमजली नहीं.., करमजले वो सारे लोग हैं जो तुझे इस नाम से बुलाते है..।”
“आप भी तो इसी नाम से...,”
“पति फफक पड़ा.. हाँ! मैं भी.. मुझे क्षमा कर दो!”
“आप मेरे पति हैं.., मैं आपको क्षमा...? क्या अनर्थ करते हैं..,”
“नहीं! सौभाग्यवंती...!”
“मैं सौभाग्यवंती...?" पत्नी को बेहद आश्चर्य हुआ...!
“आज सोच रहा हूँ... जब मैं तुम्हें मारा-पीटा करता था, तो तुम्हें कैसा लगता रहा होगा...!” कहकर पति फिर रोने लगा।
समय इतना बदलता है...। पति की कलाई और उँगलियों पर दवाई मलती करमजली सोच रही थी। अब हमेशा दर्द और झुनझुनी से उसके पति बहुत परेशान रहते हैं। एक समय ऐसा था, जब उनके झापड़ से लोग डरते थे...। चटाक हुआ कि नीली-लाल हुई वो जगह...। अपने कान की टूटी की बाली व कान से बहते पानी और फूटती-फूटती बची आँखें कहाँ भूल पाई है, आज तक करमजली फिर भी बोली,- “आप चुप हो जाएँ...।”
“मुझे क्षमा कर दो...,” करबद्ध क्षमा मांगता हुआ पति ने कहा।पत्नी चुप रही वह कुछ बोल नहीं पाई।
“जानती हो... हमारे घर वाले ही हमारे रिश्ते के दुश्मन निकले...। लगाई-बुझाई करके तुझे पिटवाते रहे...। अब जब बीमार पड़ा हूँ तो सब किनारा कर गये। एक तू ही है जो मेरे साथ...,"
“मेरा आपका तो जन्म-जन्म का साथ है...!"
पति फिर रोने लगा, "मुझे क्षमा कर दो...,”
“देखिये जब आँख खुले तब ही सबेरा...। आप सारी बातें भूल जाइए...,”
“और तुम...?”
“मैं भी भूलने की कोशिश करूँगी...। भूल जाने में ही सारा सुख है...।”
पत्नी की ओर देख पति सोचने लगा कि अपनी समझदार पत्नी को अब तक मैं पहचान नहीं सका... आज आँख खुली... इतनी देर से...।￰

■01. –यह शीर्षक आपने क्यों चुना इस पर अपने विचार कथा के साथ प्रस्तुत करें।

–कथानक को शिल्प में ढ़ालने से, कई गुना अधिक श्रम और समय लग जाता है शीर्षक चयन करने में। अपने स्व लेखन को खुद तौलने लगते हैं तो सामने आईना होते हुए भी दंडी मार लेना फितरत हो जाता है। जब अन्य कोई तौल दे तो मुझे निजी तौर पर संतुष्टि और खरा होने का विश्वास होता है...। उपर्युक्त लघुकथा पुत्तर रवि यादव जी द्वारा पाठ के लिए चयनित रहा..। कथा के मर्म को स्पर्श कर रहा है 'शीर्षक:नया सवेरा'। कोई एक पक्ष धैर्य और घर बचाये रखने के प्रति समर्पित हो तो समय के साथ दूसरे पक्ष में बदलाव आ जाना स्वाभाविक हो जाता है। यह कोई जरूरी नहीं कि प्रयास केवल पत्नियों के हिस्से ही आये। समय के साथ बहुत बदलाव होते हुए और ना चाहते हुए आज भी ऐसे हालात हैं कि अधिकतर पत्नियों के हिस्से ही आता है नया सवेरा लाना।
श्रेष्ठ साहित्यकारों का कहना है, "साहित्य में वो लेखन करें जैसा समाज देखना चाहते हैं।" अतः प्रयास उसी राह पर जारी है।
■2-अपनी रचना के साथ अन्य लेखक द्वारा लिखी गई एक लघुकथा जिसका शीर्षक आपके विचार से सफल या असफल शीर्षक है । आप चाहे तो शीर्षक के कमजोर व मजबूत पक्ष को भी सामने रख सकते हैं।

“चूक”– डॉ. सतीशराज पुष्करणा, 

चिंतन बाबू पूरी रात सो नहीं सके। सुबह उठे तो मन-मिजाज थका-थका-सा लगा । कलवाली बात उन्हें रह-रहकर परेशान कर रही थी । उन्होंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उनका बेटा अभिनन्दन उनके सात इस बेहूदगी से पेश आएगा। वह सोचने लगे कि उन्होंने आखिर ऐसा क्या कहा कि उसने कह दिया, यदि वह उसे घर के मुख्य-द्वार के ठीक अन्दर में कमरे बनाने नहीं देंगे तो वह उन्हें जान से मार देगा।
क्या आदमी इस हद तक स्वार्थी हो सकता है, अभिनन्दन को उन्होंने पढाया-लिखाया नौकरी लगवा दी। अच्छे घर से शादी करा दी। रहने के लिए घर बनवा दिया। उससे कभी कोई अपेक्षा नहीं रखी। जो सम्भव हुआ किया और करते ही जा रहे हैं। फिर भी वह समझ नहीं पा रहे हैं कि जीवन में या अभिनन्दन के पालन-पोषण में उनसे कहाँ चूक हो गयी? समाज में उनकी इज्जत है, प्रतिष्ठा है, उन्होंने अपने तन-बदन तक को सँवारने में कभी ध्यान नहीं दिया। अभिनन्दन को कभी अभाव का अहसास तक नहीं होने दिया। उन्होंने बड़े शौक से घर बनवाया। बड़े-से मुख्य-द्वार पर ही कमरे बनवाएगा । उन्होंने लाख समझाया कि बेटा ! कमरे खाली पड़ी जगह पर बनवा ले, घर की शोभा नष्ट न कर... मैंने इतना ही तो कहा था न,-“यहाँ नहीं, वहाँ उधर बनवा लें...घर की शोभा बनी रहने दे।”
उत्तर में उसने कह दिया,-“आप सठिया गए हैं। अन्दर कहीं कोचिंग चलेगा? मेन गेट पर रहेगा तो छात्र-छात्राओं का ध्यान अधिक जाएगा।”
मैंने कहा था,-“बेटा ! पढाई अच्छी हो, तो छात्र-छात्राएँ सुदूर जंगलों में भी पढने चले जाते हैं। अपने में वो बात पैदा करो।”
उसने कितनी आसानी से कह दिया था,- “आप यदि मेरे रास्ते में आये तो मैं आपको जान से मार दूँगा।”
“आप नाहक परेशान बैठे हैं। परेशान न हों। बेटा है... आज का युवा है। क्रोध में कह गया है... वह आप पर हाथ नहीं उठा सकता... आपने आज तक उसकी हर बात पूरी की है.. यह भी मान लीजिए।” पत्नी ने समझाया।
बस, यहीं चूक हो गई... इकलौता होने के कारण उसकी हर बात मानता गया... जो माननी चाहिए थी वह भी... जो नहीं माननी चाहिए थी वह भी... तो फिर आज क्यों नहीं मान रहे हैं? वह हँस पड़े... उन्हें समझ में आ गया... उनसे चूक कहाँ हो गयी। उस चूक का खामियाजा तो भुगतना ही पडेगा। अभी वह ये सब सोच ही रहे थे कि पोते पर उसकी नज़र पड़ गई... उन्हें अभिनन्दन का भविष्य भी दिखाई देने लगा। पोता अपने पिता से जिद कर रहा था कि यदि आज मेरी साइकिल नहीं लाए, तो मैं आपसे बात भी नहीं करूँगा। उत्तर में अभिनन्दन ने कहा था,-‘नहीं बेटा ! ऐसे नहीं बोलते ... मैं आपके लिए साइकिल जरूर लेकर आऊँगा... आप तो मेरे राजा बेटे हैं न।” उन्हें अभिनन्दन का बचपन  और अपनी जवानी के दिन स्मरण हो आए।

लघुकथा के शीर्षक पर विचार  : विभा रानी श्रीवास्तव
अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के संस्थापक व अध्यक्ष, लेख्य-मंजूषा के गुरु-अभिभावक , लघुकथा पितामह डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी के बारे में कुछ बताना , सूरज को दीया दिखलाना है।
    वे गुरु हैं! ना! ना उन्हें गुरुकुल कहना अधिक सटीक होगा। अपने-आप में शब्दकोश हैं। साहित्य की अनेकानेक विधाओं में सृजन-कार्य करते हैं। अबतक वे लगभग साढ़े सोलह सौ लघुकथाओं का सृजन कर चुके हैं। उन लघुकथाओं में से 'चूक' शीर्षक की पिता पात्र पर केंद्रित लघुकथा के श्री का मेरा यह अति विनम्र प्रयास है।

 बिगड़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ती आबादी से देश की स्थिति चरमराने लगी तो देश में कानून बना व नारा बुलंद हुआ 'हम दो और हमारे दो'। इससे जनता में पर्याप्त जागृति आयी तो 'वन फैमली वन चाइल्ड' भी होने लगा। पहले संयुक्त परिवार की रूपरेखा एकल परिवार में परिवर्तित हो गयी , फिर  एकल में भी एक संतान होने लगी। जिसका दुष्प्रभाव इकलौती संतान पर पड़ने लगा। मैं यह तो नहीं कह सकती कि सभी इकलौती संतान बिगड़ी औलाद ही हुई या हो रही हैं। लेकिन मेरे सम्पर्क में जितने एकल बच्चे आये उनमें से अधिकाँश बच्चे जिद्दी व गलत आदतों के शिकार ही दिखे। इकलौती संतान पालने के दौर से मैं भी गुजरी हूँ।और हर पल चूक हो जाने से भयाक्रांत रही हूँ।
चूक के परिणाम स्वरूप सज़ा अभिभावकों को ही भुगतनी पड़ती है तो बच्चे भी भुगतते हैं । अतः डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी की लघुकथा का शीर्षक दंड/सज़ा होता तो मेरे विचार से अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त होता।
लघुकथा में पुत्र पात्र ने कितनी आसानी से कह दिया था,-“आप यदि मेरे रास्ते में आये तो मैं आपको जान से मार दूँगा।”
तनजा मुख से ऐसी कठोर अशोभनीय बातें, किसी भी पिता की आँखों से नींद और दिल-दिमाग से चैन चुराने में सफल हो जायेगी...। परिणाम की कल्पना ही भयावह है...।
 'स्पेयर द रॉड स्पॉइल द चाइल्ड' अंग्रेजों ने सभ्य होने के बाद 'स्पेयर द रॉड एंड स्पॉइल द चाइल्ड' जैसा सूत्र गढ़ा था। उस सूत्र के स्थान से सभी ने आगे बढ़ जाने की राह निकाली। मास्साब की छड़ी छीन ली गई। बच्चों के अधिकारों की रक्षा हेतु गठित आयोग ने विद्यालयों में बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा का संज्ञान लिया और उसे पूरी तरह से रोकने हेतु एक जोरदार पहल की। उसने शारीरिक दंड की परिभाषा का दायरा भी बड़ा किया। सिर्फ छड़ी मारना ही नहीं, अब क्लास से बाहर या बेंच पर खड़ा कराना या मुर्गा बनाना या मैदान का चक्कर लगवाना भी शारीरिक दंड की ही श्रेणी में शामिल किया। आयोग ने कहा है कि ऐसी किसी भी दंड या प्रताड़ना के खिलाफ अभिभावक तुरंत शिकायत दर्ज करवाएँ और थाने में एफ.आई.आर लिखवाएँ। क्योंकि विद्यालय में विद्यार्थियों को शारीरिक दंड मिलने की वजह से किसी बच्चे के हाथ-पाँव टूट गए, पीड़ित बेहोश हो गया । अथवा कोई-कोई तो मृत्यु तक को भी प्राप्त हो गया। 
ऐसे भी समाचार प्राप्त हुए, किसी-किसी बच्चे ने अध्यापक की प्रताड़ना से दु:खी होकर कोई गलत कदम उठा लिया। ऐसे में नैशनल कमिशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन्स राइट्स की सहृदयता थी  कि उसने अपनी ओर से ऐसी पहल की। लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कितना लाभ हुआ , यह विचारणीय है।  आदर्श की बातें सुनने में जरूर अच्छी लगती हैं, लेकिन उनका असली जिंदगी से तो भी तो कोई संबंध हो। विद्यालय शिक्षा का अर्थ सिर्फ परीक्षा में आने वाले नंबर हो गए , आयोग का कवच बच्चों की मासूमियत-निश्छलता की पूरी तरह से रक्षा नहीं कर सका।
'जे फूल से महादेव के सर..' घर में भी इकलौती संतान पर ज्यादा लाड-दुलार बढ़ जाने से बच्चों में उच्छृंखलता बढ़ गयी। रही-सही कसर पूरी करता पिता अगर कभी नाराज होकर डाँटना चाहते तो माता पुत्र-मोह में ढ़ाल बन जाती। पुत्र की गलतियों पर पिता का नाराज होना अकारण गुस्सा होना लगता है। ज्यादती लगता है। जो कि एकदम गलत है । पुत्र की गलतियों पर पिता गुस्सा हो रहे हों और माता को पिता का गुस्सा ज्यादा भी लग रहा हो तो पिता को समझाने की जगह पुत्र को समझाना ज्यादा आवश्यक बात लगनी चाहिए। अगर माता पुत्र को नहीं समझा चाहती तो कम-से-कम चुप ही रह जाये किसी को ना समझाए। नहीं तो वहीं से पुत्र के सुधरने की गुंजाइश मिटती चली जाती है।
लघुकथा 'चूक' में भी हमें प्रमाण मिलता है। पिता पात्र के आहत होकर परेशान होने पर “आप नाहक परेशान बैठे हैं। परेशान न हों। बेटा है... आज का युवा है। क्रोध में कह गया है... वह आप पर हाथ नहीं उठा सकता... आपने आज तक उसकी हर बात पूरी की है.. यह भी मान लीजिए।” पत्नी ने समझाया।
लघुकथा के पिता पात्र को एहसास होता है कि उससे पुत्र की परवरिश करने में चूक हो गयी।  मेरा मानना है कि प्यार करने का अर्थ यह नहीं कि बिना उचित-अनुचित का ध्यान रखे हुए हर मांग को पूरा कर देना। परवरिश में अनुशासन सिखलाना पिता का प्रमुख दायित्व होना चाहिए।
पुत्र को यह सिखलाना चाहिए कि किस सीमा में रहकर उसे अपनी बात पिता के सामने रखनी है। अन्यथा यदि वह उसे घर के मुख्य-द्वार के ठीक अन्दर में कमरे बनाने नहीं देंगे तो वह उन्हें जान से मार देगा।
‘इतिहास खुद को दोहराता है’, पहले एक त्रासदी की तरह, दुसरा एक मज़ाक की तरह। कार्ल मार्क्स का कथन पूर्णत: सत्य साबित करती लघुकथा में जब पिता पात्र दादा और पुत्र पात्र पिता की भूमिका में परिवर्तित हो जाते हैं। ‘पोता अपने पिता से जिद कर रहा था कि यदि आज मेरी साइकिल नहीं लाए, तो मैं आपसे बात भी नहीं करूँगा।’ 
बच्चे वही सीखते हैं जो अपने बड़ों को करते/अपनाते देखते हैं। हम जो संस्कार बच्चों में रोपना चाहते हैं, उसे पहले स्वयं में भी अपनाएं।
डॉ. सतीशराज पुष्करणा द्वारा सृजित लघुकथा ‘चूक’ अति आवश्यक अनेक बिंदुओं पर पिता व पाठक वर्ग का ध्यानाकर्षित करने में समर्थ और सफल है... ।
वर्षों से दिल-दिमाग के कोने में संजोए मुझे मेरे अनुभवों की अभिव्यक्ति का माध्यम-आधार भी बनी लघुकथा 'चूक'। साधुवाद देती हूँ सृजक को।

Monday, 24 August 2020

वक्त आजमा रहा है

कोई कसर नहीं रह जाये...


वन में आग–
श्वेत श्याम में दिखे
अलूचा बाग।

आलूबुखारा को अलूचा भी कहते हैं

मुख्यतः आलूबुखारा अमेरिका का फल है लेकिन भारत में भी होने लगा है..

इस समय यह पकता है..

और इस समय कैलिफोर्निया में आग फैली हुई है.. कई लाख एकड़ जल कर खत्म हो गए... पूरे शहर में धुएँ से सफेद और स्याह दिख रहा है।
वातावरण में धुँआ , राख और जलने का गंध फैला हुआ है... जो पहाड़ साफ-साफ दिखलाई पड़ता था वो नहीं दिख रहा है... । पेडों के डालों/लटकी टहनियों पर राख सफेद-काला दिखलाई दे रहा है..। कोई बॉलकोनी में बैठे तो पूरा राख जम जाए... । लोग भय में हैं कि ना जाने कब घर छोड़ कर हटना पड़े... प्रशासन से लगातार अलर्ट किया जा रहा है.. 'जगह छोड़कर निकल जाएं...।'

सन्ध्या का आलोक

दिन अपनी अन्तिम देहरी पर ठिठका खड़ा था। पार्क में पुराने नीम के नीचे बैठे लगभग पचहत्तर-सतहत्तर वर्षीय वृद्ध अपने घुटने सहला रहे थे। हर शाम उ...